Monday, 12 March 2012

तेरा अक्स

तनहइयो ने कब
मेरे हाथ में
जाम दे दिया
कुछ इसका पता नहीं
हर शाम-हर रात
हर सुबह 
बस में और
मेरा जाम
मुझे लगा
अब जिन्दगी
चैन से कट जायगी
ग़लतफ़हमी थी मेरी
अब तो हाथ में
जाम लेने से भी
डर लगता हे

न जाने क्यों
तेरा अक्स
मुझे अब
उसमे नज़र आता हे.

'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
09699787634 
  

Sunday, 4 March 2012

LAGHUKATHA



हड़ताल का अर्थ 

मालिक के केबिन से निकलकर नंदन जब बाहर निकला तो उसकी छाती घमंड से चोडी थी.

आज कंपनी के मालिक ने उसकी चिरौरी की थी हड़ताल ख़त्म करने के लिए पर वो तस से मास नहीं हुआ था. उसे डबल बोनस है हाल में चाहिए था, अगर नहीं तो हड़ताल जारी.

केबिन  से बाहर निकलते ही उसके पास श्याम भागते हुए था, लगभग गिडगिडाते हुए बोला था. नंदन बाबू कुछ बीच का रास्ता निकल के हड़ताल बंद कर दो घर पर बच्चे भूख से बिलबिला रहे हे.

नंदन हेकड़ी से बोलते हुए - कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता हे, वहां से निकल गया था.

घर पर उसकी बीवी इन्तजार कर रही थी, बेटे को ज्वर १०२ दिघरी पहुच गया हे. नंदन के आते ही उसे बताती हे.

नंदन आनन् फानन उसे ऑटो में लेकर हस्पताल भागता हे.

रिस्प्सन काउंटर पर नर्स बोलती हे बच्चा एडमिट नहीं हो सकता .

नंदन पूछता हे क्यों .

नर्स बोलती हे हास्पिटल में हड़ताल हे, कोई डाक्टर नहीं हे.

नंदन को हड़ताल का अर्थ समझ में आने लगता हे.     

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज jalalabad , unnao
२४१५०२
०९६९९७८७६३४

Saturday, 25 February 2012

तेरा शहर तेरा गाँव


ये तेरा शहर
ये तेरा गाँव
मुबारक हो तुझे

मेरा क्या हे
में तो बस मेहमान हूँ
दो पल के लिए
महकता ही रहे
चहकता ही रहे
ये तेरा घर
ये आँगन तेरा
क्या हुआ
जोन न  रहा कोई फूल
मेरी ग़ज़ल के लिए

तूं सवरती ही रहे
तूं निखरती ही रहे
अपने साजन के लिए
भूल जा दिल से मुझे

तूं अपने कल के लिए

'सुधीर' के दामन में
ड़ाल दो
सब कांटे अपने
हर फूल हर सितारा
रख ले तूं
अपने आचल के लिए.   

'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२४१५०२
०९६९९७८७६३४  

Saturday, 11 February 2012

प्रेम की नाव

उसकी बातो में
लगने लगा हे
बहुत कुछ
बनाव इन दिनों.

किसी और की
गली से
गुजरने लगे हे
उसके पावं इन दिनों.

मागने लगा हे
कोई और
उसके जुल्फों की
छाव इन दिनों.

हाँ चर्चे हे
उसके एक और
अफएर   के
गाँव में
इन दिनों.

हो न हो
वो सवार हे
प्रेम की
दो नाव में इन दिनों.

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
209869
०९६९९७८७६३४/09619483963

Wednesday, 8 February 2012

Unki kitaab me

फूल पाने की कोशिश में कांटे चुभे देखे
तेरे इश्क में हमने महीनो रतजगे देखे

ये केसा प्यार था तेरा, ये केसी दोस्ती तेरी
हजारो ज़ख़्म मैंने अपने दिल पर लगे देखे

उस दिन से मेरी दुनिया वीरान हो गई
जिस दिन तेरे दस्त हिना से सजे देखे

अँधेरे दूर करने की ये कोशिश नाकाम हो गई
रोशन चिराग करते ही हवाऔ से बुझे देखे

फ़साना दुश्मनों का मेरे केसे मुक़म्मल हो पाता
अपनी आस्तीनों में मैंने अपने सगे देखे

उस दिन से हिरासा हु जिस दिन से 'सुधीर'
उनकी किताब में ख़त रखे गैर के देखे

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव-२४१५०२
०९६९९७८७६३४

Saturday, 4 February 2012

Aankh ki nadiya sukh gai he

सुन्दर गोरी और
जवान
ऊपर से ऊँची
जात की वो.
अपने घर के
नोकर से ही
बाज़ी हार गई
जज्बात की वो.



कुछ आँखों ने था
देख लिया
छुप-छुप कर
मिलते बागो में
वो तीन दिनों से
गायब हे
जो रहता था
उसकी आँखों में.



कल शाम नहर के बांध में
उसकी ही
लाश पाई गई
वो रो न सकी
कुछ कह न सकी
उसकी आँखों की नदिया
हो न हो
शायद सूख गई.





सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
पिन- २४१५०२
09699787634 
 

Wednesday, 1 February 2012

वो अधरों के स्वर





नीले अम्बर के 

मंडप तले 

वो नीले नेनो का 
जादू मुझे बेकल कर गया



कली गुलाबो के से

वो अधरों के स्वर

मेरे लफ्जों को
देखो ग़ज़ल कर गया



काली घटाओ के से

उन जुल्फों का उड़ना

उनके कदमो का लम्स
मेरी झोपडी को महल कर गया



अपने गमो को

आखिर भुला ही बेठे

मेरी आँखों को हाय
फ़साना दर्द का उनका सजल कर गया




'लम्स' से

सुधीर मौर्या 'सुधीर'

०९६९९७८७६३४