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Thursday, 30 January 2014

जब नारदजी सम्मानित हुए - सुधीर मौर्य

युग पे युग बदल गए पर अपने नारद भाई जस के तस। रत्ती - मासा भी बदलाव नहीं हाथ में तानपूरा होठों पे नारायन - नारायन और वही खबरनवीसी का काम। जाने कहाँ से टहलते- घूमते आपके चरन भारत मैया की धरती पर आ टिके। तनिक देर में ही नारायनी शक्ति के बल पर आपने खबरनवीसी के हायटेक टेक्नोलोजी की महत्ता समझ ली। इस टेक्नोलोजी की महत्ता से घबराकर बेचारे पतली गली ढूंढ ही रहे थे कि एक उपकरणों से लैस पत्रकार के हाथो धरे गये। देखते ही पत्रकार मुस्कराकर बोला क्या हल है तानपुरा मास्टर? बेचारे नारद जी पत्रकार की स्टाइल से सिटपिटा गए। सम्हल के बोले! अरे बोलने की गरिमा रखो। गरिमा को बांधो कंधे पे पड़े अंगोछे में मिस्टर जानते नहीं हमारे सर पे किसका हाथ है। अब तो नारद और सिटपिटाये, सोचा कहीं इसने भोले की भक्ति करके कोई वरदान - सरदान का मालिक न बन बैठा हो। डरते - सहमते पूछा किसका हाथ है आपके सर पे ? २मिमी के मूछ के बाल को सहलाते हुए बोला पत्रकार दिल्ली की नई नवेली सरकार का। दिल्ली का नाम सुनकर नारद जी की बची - खुची हवा भी निकल गई। भागने की जुगत में बोले अच्छा चलता हूँ। पर पत्रकार तो अपने नशे में था, इसी नशे में डोलता बोला अरे यहाँ आये हो तो कुछ मांग लो। बेचारे नारद जी पिंड छुड़ाने की गरज़ से बोले अब क्या मांगू साहब आप तो महाज्ञानी है जो उचित समझे दे दे। नारद की बात सुनकर वो तनिक सोचकर बोला! कुछ भी, तुमने खबरनवीसी का काम किया सो आप हमारी बिरादरी के ठहरे इसलिए हम आपको पत्रकारिता का आशुतोष सम्मान प्रदान करते है।                                                                                                                                                                           शाल , प्रशस्ति पत्र और नोटों का लिफाफा लेकर नारद जी अभी खिसके ही थे कि पीछे से फिर आवाज़ आई, अरे सुनते जाव| बेचारे नारद जी ठिठक के पलटे और मुह खोल के सवालिया अंदाज़ में खड़े हो गये। अरे भाई हम आपकी तरह और लोगो को सम्मानित करना चाहते हैं जिनकी अब तक किसी ने खबर नहीं ली। कौन है वो खुशनसीब नारद जी नोटों का लिफाफा कमर में खोंसते हुए बोले। अरे भई अपने हरिश्चंद्र महाराज को ईमानदारी का अरविन्द पुरस्कार, कालिदास को  विश्वास सम्मान और… पत्रकार और भी कई नाम गिना रहा था और अपने नारद मुनि सर पर पैर रखकर भाग रहे थे। 

सुधीर मौर्य

गंज जलालाबाद ,

उन्नाव (यू पी ) 209869


Friday, 19 April 2013

संकटा प्रसाद के किस्से (लघु व्यंग्य उपन्यास) - सुधीर मौर्य


इधर संकटा के बाल उस्तरा से छीले जा रहे थे थे उधर वो मन ही मन सोच रहे थे की कुँए से भुत अब निकला की तब निकला। सरे बाल छिलते ही संकट के चाचा ने कुंए की मेडार पर रख के जो गोला दगाया तो मनो संकटा पर बिजली टूट पड़ी बेचारे संकटा झटके से उठ गए पर उतनी रफ़्तार से बेचारा नाई अपना उस्तरा संभाल न सका और उसकी धार में मानो भुत आ गया परिणामस्वरूप संकट की नई नवेली घुटी चाँद से खून बह चला।

मांडवी प्रकाशन से  प्रकाशित मेरे व्यंग्य उपन्यास 'संकट प्रसाद के किस्से' से
 
--सुधीर मौर्य