Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts

Wednesday, 2 April 2014

बेसबब तूं आसरा देखे - सुधीर मौर्य


मै पथ्थर हो चूका हूँ, बेसबब तूं आसरा देखे 
तेरी हसरत अधूरी है मुझे तूं टूटता देखे 

किसी की ज़िन्दगी उनसे अधिक खुशहाल कैसे है 
बहुत से लोग हमने इसलिए भी गमजदा देखे 

मुझे साहिल मिला तो वो बहुत मायूस रहता है 
वही जिस सख्स की ख्वाहिस थी मुझे डूबता देखे 

Tuesday, 18 June 2013

जरूर मेरे ग़मों से वो आगाह होगी - सुधीर मौर्य



बसंत से मेरी भी रस्मों राह होगी 
कभी तो ये जीस्त खुश्निगाह होगी 

तेरी आँखे झुक झुक के उठती होंगी 
ये वो राज है रात जो स्याह होगी 

सुना है वो भी रात भर सो  पाया 
की छुप छुप के उसने पढ़ी 'आहहोगी 

मेरी कब्र पे रौशन जो उसने शमा की 
जरूर मेरे ग़मों से वो आगाह होगी 

--  सुधीर मौर्य  

Monday, 18 February 2013

रकीब संग मुस्करा रहा था..



Sudheer Maurya 
================

वो दिल पे नश्तर चला रहा था 
रकीब संग मुस्करा रहा था 

गिरा के आँचल बदन से अपने 
वो हमसे दामन बचा रहा था 

पहन के जोड़ा सितारों वाला 
अहद वफा का भुला रहा था 

जफा निभाता रहा जो हरदम 
वफा का किस्सा सुना रहा था 

जो कम हुई रौशनी शमा की 
'सुधीर' के खत जला रहा था 


सोच विचार से प्रकाशित 
सुधीर मौर्य 'सुधीर' 


Tuesday, 18 September 2012

शायद शहर में बेवफा आ गयी है...




ज़माने में जो मिली न किसी को
मेरी जिंदगी में सजा आ गयी है

चारों तरफ हैं बहारों के मेले
मेरे घर में बस खिज़ां आ गयी है

सुबह से ही क्यों फूल मुरझा चले हैं
शायद शहर में बेवफा आ गयी है

अंधेरो से मेरे क्यों घबरा रहे हो
तेरी ज़ीस्त में तो शमा आ गयी है

ग़ज़ल संग्रह 'आह' से... 
    

Wednesday, 20 June 2012

माँ की ऊँगली थामे...



फिर मुझे देने को उलझन आ गया
कौन यह रस्ते में रहजन आ गया

क्यों अचानक फूल मुरझाने लगे
लूटने शायद वो गुलशन आ गया

आज मेरे ख्वाब फिर खतरे में हैं
दोस्त बन कर मेरा दुश्मन आ गया

माँ की ऊँगली थामे बच्चा देखकर
याद मुझ को मेरा बचपन आ गया

वांकाई बारिश हुई है  ऐ 'सुधीर'
या मेरी आँखों में सावन आ गया..