Showing posts with label लघुकथा. Show all posts
Showing posts with label लघुकथा. Show all posts

Saturday, 7 July 2018

संजू (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

उस समय मैं अपने लिखे जा रहे उपन्यास के किसी पात्र के ध्यान में मग्न था और मेरे होठों से हाँ निकल गया था जब उस लड़की ने मुझसे पूछा 'क्या तीन सौ से ज्यादा लड़कियों के साथ सेक्स संबंध रखने वाले संजय दत्त को तुम अच्छा समझते हो ?'
'मेरे जवाब पर जब उसने आँखे तरेर कर पूछा कैसे ?' तो बेध्यानी में दिए गए अपने जवाब के जवाब में मैने कहा 'ठीक वैसे ही जैसे अपने हरम मे पांच हजार स्त्रियों को जबरन रखने वाले अकबर को हम महान कहते हैं।'
मेरे जवाब के बाद से उस लड़की की तरेरी हुई आँखों में मुझे मरोड़ देने वाले भाव उभरे थे।

--सुधीर मौर्य 

Friday, 6 July 2018

अड्डेबाज़ी (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

'मेरे ग्रुप को ज्वाइन करोगी ?' लड़के ने पूछा।
'नो मैं ग्रुपबाजी नहीं करती।' लड़की बेपरवाही से बोली।
'फिर क्या करती हैं ?' लड़के ने साहस बटोर कर पूछा लिया।
'अड्डेबाज़ी।' लड़की का स्वर पहले से भी ज्यादा बेपरवाह हो चला था।
--सुधीर मौर्य  

Thursday, 22 June 2017

सपने,नाम और महत्वकांक्षा (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

मेरी एक दोस्त है। बड़े बड़े ख्वाब देखने वाली और उन ख्वाबो को पूरा करने के लिए पूरा जोर लगाने वाली। 
अचानक मुझसे मिली और कहा की न्यूज़ पेपर में इश्तिहार देकर और कोर्ट से हलफनामा बनवाकर वो अपना  नैम चेंज करवाना चाहती है। 
'क्यों वाणी ऐसा क्या हुआ जो तुम अपना नाम बदलना चाहती हो ? कितना अच्छा तो हे तुम्हारा नाम।'
मेरे सवाल में वो तुनक के बोली बस यही चिंता मुझे खाये जाती है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरा नाम वाणी होने की वजह से कहीं मेरे सपने अधूरे न रह जाएँ।'
'अरे नहीं नहीं नाम से सपनो का न पूरे होने का क्या सम्बन्ध ?' मैने उसे फिर समझाया। 
'नो मैं कोई रिस्क नहीं ले सकती मुझे तो लगता है आडवाणी जी के नाम में वाणी होने से उनके सपने पूरे नहीं हुए। इसलिए मैं अपना नैम ही चेंज कर दूंगी।'
अब उसकी इस बात का मैं क्या जवाब देता बस हँस के हाँ में सर हिला दिया। 
सुधीर    

Sunday, 29 January 2017

अभिव्यक्ति की आज़ादी (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

एक ठो वामपंथी स्त्री हैं, मेरी किसी पोस्ट को पढ़कर मुझ पे ज्ञान बघारते हुए बोली 'ये पद्मिनी काल्पनिक पात्र हैं फिर अगर कोई उन पर अपने हिसाब से कहानी लिखे या फिल्म बनाये तो तुम्हे क्या तकलीफ और फिर अभिव्यक्ति की आजादी पे कोई रोक नहीं लगा सकता।'
उनकी बात सुनकर मैने जवाब दिया 'हां अभिव्यक्ति की आजादी भी कोई चीज है।'
फिर कुछ देर रूक कर मै बोला ' तो मै भी अनोखे लाल और तुम्हारी प्रेमकहानी लिख सकता हूँ।'
' अरे कौन अनोखे लाल, मै तो इसे जानती तक नही और उससे मेरी प्रेमकहानी, क्या बकते हो. ' वो गुस्सा होते बोली।
मैने सहजता से कहा ' जी अनोखे लाल काल्पनिक पात्र है इसलिए उसकी प्रेमकहानी किसी के साथ लिख सकता हूँ, इसमे तुम्हे क्या तकलीफ आखिर अभिव्यक्ति की आजादी भी कोई चीज है।'
मेरी बात सुन के  वो मुझे खा जाने वाली नज़रो से घूर के बिना कहे कुछ चली गई।
--सुधीर मौर्य 

Thursday, 13 October 2016

भावनाये (लघुकथा) - सुधीर मौर्य


हल्के - हल्के शिप लेकर शराब पीती वो लड़की मुझे न जाने क्यों अच्छी नहीं लग रही थी।
लड़खड़ाते कदमो से वो पार्टी हाल से बाहर निकलते हुए वो बोली 'मैं पार्टी में आई थी, बीफ पार्टी में नहीं धिक्कार है तुम सब पे जो लोगो की भावनाये नहीं समझते।' 

वो लड़की न जाने क्यों मुझे अच्छी लगने लगी थी। 
--सुधीर मौर्य 

Saturday, 30 January 2016

प्यार और जाति - सुधीर मौर्य



लडके ने डरते - डरते कह दिया 'तुमसे प्यार करते है.' 
'कौन जाति हो? ' लडकी बोली. 

' चमार.'

जलती नजरो से देखकर लडकी बोली 'मनु से मोदी तक तुम लोगो को समझाने का एक ही तरीका है. मालुम है या पता करवाऊं.' 
लडका जानता था लडकी का पिता बडा सेक्युलर और लड़की भी कालेज की सेक्युलर युवा नेता नेता है सो उसके पास चुप हो जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. 
--
सुधीर मौर्य

Saturday, 26 December 2015

अबूझ किताब - सुधीर मौर्य

उसने कहा था एक दिन खुली किताब हूँ मैं। पढ़के जान लो मुझे। एक सर्द शाम में, मैं ये जान पाया था। उस किताब की भाषा मेरे लिए अबूझ थी। और उसी शाम मुझे अनपढ़ कह कर उसने वो किताब किसी पढ़े हुए की सेल्फ में रख दी थी।
और कुछ बरसों बाद उस पढ़े हुए इंसान ने उस सेल्फ को बेच दिया था कबाड़ खाने में उस किताब के साथ।
आज गर्द से सनी वो किताब मेरे सामने है पर आज भी उस किताब की भाषा मेरे लिए अबूझ ही है।
--सुधीर मौर्य

Saturday, 25 July 2015

हूर बनने का खौफ - सुधीर मौर्य

आज तुम्हे क्या हो गया है तहज़ीब। अपने सीने से चिपटी एक गोरी, छरहरी, कमसिन लड़की को अपने सीने से अलग करके अपने से पर लगभग धक्का देते हुए वो बोला।
ज़मीन पर पड़े कुछ लम्हे वो सिसकती रही और फिर तड़प कर उसके सीने से लगते हुए बोली - आफ़ताब आज मैं एक लड़की होकर तुम्हारी इल्तिज़ा कर रही हूँ मेरी दोशीज़गी को चूर चूर कर दो। हाँ आफ़ताब आज मेरा कुंवारापन तोहफे में ले लो। इतना कह कर तहज़ीब, आफ़ताब के सीने में अपना चेहरा गड़ाये हुए फफक - फफक कर रो पड़ी।
कुछ देर उसे आंसू बहा लेने के बाद, उसके बाल सहलाते हुए आफ़ताब बोला - तहज़ीब निकाह से पहले जिस्मानी तालुकात नायजायज़ हैं। और फिर तुम्ही तो कहा करती थी 'ये सब शादी के बाद' .
--हाँ आफ़ताब कोई भी लड़की अपना जिस्म सिर्फ शादी के बाद ही मर्द को सौपना चाहती है।
तहज़ीब , आफ़ताब का चेहरा देखते हुए कहे जा रही थी - पर जानते हो वो कबायली दहशतगर्द गांव से कुछ ही दूर हैं जयादा से जयादा वो कल यहाँ आ धमकेंगे। वो हिन्दू - मुस्लमान का फ़र्क़ किये बिना हम लड़कियों का बेदर्दी से बलात्कार करेंगे। आफ़ताब मै बलात्कार होने से पहले मर जाना चाहती हूँ। और जानते हो मरने से पहले मैं अपना कुंवारापन इसलिए क़ुर्बान करना चाहती हूँ ताकि बेरहम दहशतगर्दो को मै जन्नत मे हूर की शक्ल में तोहफे में न मिळू।
तहज़ीब की बात सुनकर आफ़ताब ने तड़पकर उसका चेहरा देखा तो वहां उसे पहली बार किसी लड़की के चेहरे पर हूर बनने का खौफ नज़र आया।
-- सुधीर मौर्य

Monday, 26 January 2015

नपुंसक (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

'देखो तुम्हारे अतीत को जानते हुए भी मैने तुमसे शादी की।पति सुहागरात को पहले लैंगिक संसर्ग के बाद से बोला।
पत्नी
पत्नी ने पति की बात सुनकर अपनी झुंकी आँखे और झुंकी दी।
'कहो अब कौन महान है मैं या वो तुम्हारा प्रेमी ?' पति वापस तनिक घमंड से बोला।
पत्नी अब भी वैसे ही बैठी रही। मूक और नत मुख।
'कहीं वो नपुंसक तो नहीं था?' पति, पत्नी के मन में उसके प्रेमी के लिए घृणा का भाव पैदा करने की गर्ज़ से बोला।

पति की बात सुनकर पत्नी को वो दिन याद गए जब वो अपने प्रेमी के साथ प्रेम गीत गाती थी।  

उसका प्रेमी उसे बेहद प्रेम करता था  कई बार वो उसके साथ एक ही चादर में लेटा था पर कभी चुम्बन आदि से आगे बढ़ा। और फिर एक रात जब उसने  खुद काम के वश    में होकर अपने प्रेमी से कहा 'उसकी इच्छा पूरी करो' तभी उसने उसके साथ दैहिक सम्बन्ध बनाया।
पत्नी को चुप देख पति वापस बोला - 'क्या वो वाक़ई नपुंसक था। '
पत्नी का मन किया वो कह दे अपने पति से - नपुंसक वो नहीं था जो प्रेम की पवित्रता निभाता रहा, जो हर राह में मेरे साथ में खड़ा रहा। मेरी पढ़ाई का खर्च उठता रहा। मेरे एक बार कहने पर चुपचाप मेरी ज़िन्दगी से दूर हो गया। और तुम्हारे मांगे के दहेज़ की राशि उसने दी अपने सिद्धांतो के विरुद्ध जाके।  अरे नपुंसक तो तुम हो जो अच्छी खासी नौकरी करते हुए भी बिना दहेज़ के शादी को तयार नहीं हुए।
पत्नी अभी सोच ही रही थी कि पति ने खींच कर वापस उससे लैंगिक संसर्ग करने लगा और पत्नी चुपचाप एक 'नपुंसक' के सीने से चिपट गई।

--सुधीर मौर्य

Thursday, 10 July 2014

लायक (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

प्रस्तुत संग्रह से प्रकाशित मेरी एक लघुकथा।
दबंग नेता के दबंग लड़के की बात जब बहुत दिनों तक लड़की ने मानी तो वो उसे जबरन अपने फार्म हाउस पर उठा लाया।
तमाम चिरौरी, एवम लड़की के लाख हाथ पैर जोड़ने के बाद भी दबंग लड़के ने उसका बेरहमी से रैप करते हुए कहा - यही सब मै प्यार से मांग रहा था पर तू मानी।अब आज के बाद तू किसी के लायक नहीं रहेगी।
बलात्कार के बाद दबंग लड़का चैन से सो गया वो अब तक नग्न था। कराहते हुए लड़की उठी पास में ही टेबल पर फल की टोकरी और छुरी थी।
लड़की ने पूरी ताकत से छुरी का वार दबंग लड़के के गुप्तांग पर किया, मांस का एक लोथड़ा छिटक कर दूर जा गिर। लड़का दर्द से तड़प का उठ बैठा।
लड़की मुस्कराते हुए बोली, मै तो फिर भी किसी के साथ सो सकती हूँ पर तू किसी के साथ सोने के ''लायक'' नहीं रहा।
--सुधीर मौर्य


Friday, 28 March 2014

जल्दी करो (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

जल्दबाजी में इकरा बचते-बचाते गैर मजहब इलाके में गयी। धार्मिक नारे लगते लोग उसकी तरफ बढे,  इकरा सूखे पत्ते की तरह कांपने लगी। किसी तरह आरती उसे उन्मादियों से बचा कर अपने घर लायी और कुछ दिन अपने मजहब की तरह कपडे पहनने को कहा।
दुसरे मजहब के लोग अल्लाह हो अकबर के नारे लगाते  मोहल्ले में बदला लेने की गरज से घुसे, जो मर्द सामने काट डाला और लड़कियों की अस्मत लूटने लगे।
इकरा भी उनके हत्थे चढ़ी, बेचारी रो-रो कर अल्लाह की दुहाई देती रही कि वो उनके मजहब की है। पर वो ये कहते हुए, साली बचने के लिए बहाना करती है, उस पर टूट पड़े।
इकरा का भाई लूट-पाट करता उसी घर में घुसा और बहन को अपने ही मजहबियों से लूटते देख अवाक रह गया।

भाई को देख कर कराहती हुई इकरा के होठो पर एक फीकी मुस्कान उभरी। फिर वो अपने ऊपर लेटे बलात्कारी से बोली ''जल्दी  करो'' आपका एक साथी और गया है।                  -----सुधीर मौर्य