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Saturday, 8 September 2012

सोलहवां साल ये तेरा...



रुक जाव कुछ लम्हे अभी अरमान अधुरा है
गुजरने वाला वो हद से अभी तूफ़ान अधुरा है

कली से फूल बन्ने का लो आया है हसीं मौसम
मुहब्बत में ह्या का अब नहीं कुछ कम है हमदम
बिन तेरे चाँद से चहरे के, दिल का आसमान अधुरा है  

तेरे रसभरे होठ, छलकती मय से ये आँखें
लगाए दिल में आग मेरे, तेरी गर्म ये सांसे
बिन रुखसार के बोसे, ये तेरा मेहमान अधुरा है

तेरी ये मरमरी बाहें, तेरे ये चाँद से पावं
की अब्र से भी बढकर है तेरी ज़ुल्फ़ की छावं 
बिन पाजेब के तेरे संगीत का सामान अधुरा है

हवाओं में उड़े आँचल की हाय हाल ये तेरा
बड़ा ही दिलकश है जाना सोलहवां साल ये तेरा
एक तेरे बिना यारा,मेरा जहां अधुरा है.

कविता संग्रह 'हो न हो' से...   
  

Thursday, 31 May 2012

ख्वाब की किरचें..


वक़्त ने

मेरी बाहं थाम कर

मेरी हथेली पर

अश्क के
दो कतरे बिखेर दिए

मेरे सवाल पर
बोला
ये अश्क नहीं
बिखरे ख्वाब की किरचे हे

सभांल कर रखो
तुम्हे ये याद दिलायंगे
की मुफलिस
आँखों में ख्वाब
सजाया नहीं करते..



By-Sudheer Maurya 'sudheer'