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Sunday, 24 November 2013
Tuesday, 15 October 2013
उपन्यास 'देवल देवी' लिखने की प्रेरणा 'रिंकल' के संघर्ष से मिली - सुधीर मौर्य
पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में २४ फ़रवरी २०१२ को एक ह्रदयविदारक घटना घटी। इकिसिवीं शताब्दी में जब सारा विश्व सभ्य होने का दंभ भर रहा था उस समय सिंध के मीरपुर मेथेलो से एक अल्पवयस्क और उक्त देश की अल्पसंख्यक लड़की का जबरन अपहरण करके उसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। उस लड़की को जबरन बलत्कृत करके उस देश के बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्ति से निकाह के लिए बाध्य किया गया। उस लड़की का नाम रिंकल है। वो लड़की और उसके अभिवावक छोटी अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायलय तक की गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज़ को जबरन दबा दिया गया। वो लड़की रिंकल कुमारी आज भी अपने अपहरणकरताओ की कैद में है और दासी सा जीवन जीने को बाध्य है। ऐसा भी नहीं कि उसकी रिहाई के लिए आवाज़ बुलंद नहीं हुई। बहुत से लोगो ने उसकी रिहाई के लिए संघर्ष किया। अमेरिका से सुनील दिक्षित, पकिस्तान की वेंगस और मारवी,भारत से राकेश लखानी और खुद मैने अपने लेखों और और अन्य गतविधियों से रिंकल कुमारी के जबरन अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर संघर्ष किया पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात रहा। पिछले कुछ दिनों में अकेले पाकिस्तान में ही जबरन धर्म परिवर्तन के कई केस सामने आये हैं। फिर सारे विश्व में ऐसे कितनी घटनाएं होती होंगी जो प्रकाश में नाइ आ पाती। ऐसी घटनाओ से हमारा देश भारत भी अछुता नहीं है। जब आधुनिक सभ्य्काल में योनि शोषण के लिए लड़कियों का अपहरण किया जा रहा है और हम शोसल नेटवर्किंग साईट से लेस होकर भी रोक नहीं पा रहें हैं तो सोचिये मध्यकाल में कितनी लड़कियों को जबरन सेक्स स्लेव बनया गया होगा। युद्ध में जीती गई संभ्रांत परिवार की लड़कियों के साथ और कठोर व्यवहार किया गया। देवलदेवी भी इसका शिकार हुई पर भाग्य से उसने अपना प्रतिशोध ले लिया। पर उन हजारो - हजार का क्या जो योनि दासी बनकर सारी उमर रोती - सिसकती रही।
रिंकल कुमारी के आपह्रण और न्याय के लिए दिखाए गए उनके अदम्य साहस ने मुझे उपन्यास 'देवल देवी, लिखने की प्रेरणा दी। मेरी ये कृति समर्पित है बहादुर लड़की 'रिंकल कुमारी' को। --सुधीर मौर्य
रिंकल कुमारी के आपह्रण और न्याय के लिए दिखाए गए उनके अदम्य साहस ने मुझे उपन्यास 'देवल देवी, लिखने की प्रेरणा दी। मेरी ये कृति समर्पित है बहादुर लड़की 'रिंकल कुमारी' को। --सुधीर मौर्य
Wednesday, 11 September 2013
मुज़फ्फरनगर से उठते धुंवे के सवाल - सुधीर मौर्य
मुज़फ्फरनगर के दंगो की आंच की आंच में सवाल मुह बायं खड़े हैं। ऐसे सवाल जिनके जवाब हमें अब हर कीमत पे तलाशने होंगे। ऐसे सवाल जो रूहों को भी बेचैन कर रहे हैं, ऐसे सवाल जो हर वक़्त अंतर्मन को कचोटते रहते हैं।
क्या अपनी मां - बहनों की अस्मत की रक्षा करना गुनाह है? अगर गुनाह है तो क्यों है। क्या सिर्फ इसलिए हमारे पास हमारी माँ - बहनों की अस्मत बचाने का हक नहीं है क्योंकि हम हिन्दू हैं। अगर अपनी माँ - बहनों की अस्मत बचाना गुनाह है तो फिर राणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान व्यक्ति भी गुनाहगार हुए। खैर हमारे वामपंथी लेखक तो उनके बारे में वैसे ही अच्छी धारणा नहीं रखते। उन्हें तो कामुक अकबर में ही नायक के सरे गुण नज़र आतें हैं। मुज़फ्फरनगर के दो वीर बलिदानी भाइयों ने को शत शत नमन जिन्होंने अपनी बहन के साथ हुई छेड़छाड़ के लिए आवाज़ बुलंद की। अपनी बहन की शीलरक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों का उतसर्ग कर दिया, उन्होंने दिखा दिया अभी भी हिन्दू युवाओं का रक्त लाल है और वह अस्मत के लुटेरों की नाक में नकेल कसने की सामर्थ्य रखतें है। उन दो वीर युवाओं का में शत - शत वंदन करता हूँ और उनके प्राणों की रक्षा न कर पाने वाली उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार की निंदा करता हूँ। सरकारी ज़मीन पर जब अवेध मस्जिद की हो रही तामीर को एक ईमानदार अफसर ने रोकना चाहा तो तत्परता दिखाते हुए उसे अखिलेश सरकार ने तुरंत बर्खास्त कर दिया। पर दुर्गाशक्ति नागपाल का कसूर क्या था? बस यही की उसने हो रहे अवेध निर्माण को रोक दिया। या फिर ये की उसने एक "मस्जिद" का निर्माण रोका जो की अवेध थी। एक अवेध मस्जिद के हो रहे निर्माण को रोकना अगर अखिलेश सरकार की नज़र में गुनाह है तो अखिलेश हा सरकार ही सबसे बड़ी गुनाहगार है न की दुर्गाशक्ति नागपाल। कवँल भारती का दोष क्या था? सिर्फ इतना की उन्होंने दुर्गा के साथ हुए अन्याय की विरुद्ध आवाज़ उठाई थी और अखिलेश सरकार की तत्परता देखिये अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वाले साहित्यकार को उसने तुरंत हिरासत में ले लिया। काश अखिलेश सरकार इतनी का प्रदर्शन ज़रायमपेशा लोगो के विरुद्ध करती। अयोध्या को छावनी में सिर्फ इसलिए तब्दील कर दिया गया क्योंकि वहां कुछ भक्त अपनी धार्मिक यात्रा करने वाले थे पर उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया। यह घटना ये साबित करती है की उत्तर प्रदेश के हिन्दू अब भी मध्यकालीन भारत में जी रहें हैं जहाँ उनसे उनके धार्मिक अनुष्ठान के लिए ज़जिया वसुला जाता था। सवाल ये उठता है ऐसे मोकों पर सजग और तत्पर दिखने वाली अखिलेश सरकार दंगे के वक़्त सोती क्यों रह जाती है कहीं ये वो जानबूझकर तो नहीं करती? अगर ये जानबूझकर होता है तो किन्हें खुश करने के लिए? खैर अखिलेश सरकार के इन कृत्यों के लिए उन्हें वक़्त और जनता सबक सिखायगी। हम तो उन दो वीर भाइयों को श्रधांजली अर्पित करते हैं जिन्होंने अपनी बहन की शीलरक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। --सुधीर मौर्य
क्या अपनी मां - बहनों की अस्मत की रक्षा करना गुनाह है? अगर गुनाह है तो क्यों है। क्या सिर्फ इसलिए हमारे पास हमारी माँ - बहनों की अस्मत बचाने का हक नहीं है क्योंकि हम हिन्दू हैं। अगर अपनी माँ - बहनों की अस्मत बचाना गुनाह है तो फिर राणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान व्यक्ति भी गुनाहगार हुए। खैर हमारे वामपंथी लेखक तो उनके बारे में वैसे ही अच्छी धारणा नहीं रखते। उन्हें तो कामुक अकबर में ही नायक के सरे गुण नज़र आतें हैं। मुज़फ्फरनगर के दो वीर बलिदानी भाइयों ने को शत शत नमन जिन्होंने अपनी बहन के साथ हुई छेड़छाड़ के लिए आवाज़ बुलंद की। अपनी बहन की शीलरक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों का उतसर्ग कर दिया, उन्होंने दिखा दिया अभी भी हिन्दू युवाओं का रक्त लाल है और वह अस्मत के लुटेरों की नाक में नकेल कसने की सामर्थ्य रखतें है। उन दो वीर युवाओं का में शत - शत वंदन करता हूँ और उनके प्राणों की रक्षा न कर पाने वाली उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार की निंदा करता हूँ। सरकारी ज़मीन पर जब अवेध मस्जिद की हो रही तामीर को एक ईमानदार अफसर ने रोकना चाहा तो तत्परता दिखाते हुए उसे अखिलेश सरकार ने तुरंत बर्खास्त कर दिया। पर दुर्गाशक्ति नागपाल का कसूर क्या था? बस यही की उसने हो रहे अवेध निर्माण को रोक दिया। या फिर ये की उसने एक "मस्जिद" का निर्माण रोका जो की अवेध थी। एक अवेध मस्जिद के हो रहे निर्माण को रोकना अगर अखिलेश सरकार की नज़र में गुनाह है तो अखिलेश हा सरकार ही सबसे बड़ी गुनाहगार है न की दुर्गाशक्ति नागपाल। कवँल भारती का दोष क्या था? सिर्फ इतना की उन्होंने दुर्गा के साथ हुए अन्याय की विरुद्ध आवाज़ उठाई थी और अखिलेश सरकार की तत्परता देखिये अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वाले साहित्यकार को उसने तुरंत हिरासत में ले लिया। काश अखिलेश सरकार इतनी का प्रदर्शन ज़रायमपेशा लोगो के विरुद्ध करती। अयोध्या को छावनी में सिर्फ इसलिए तब्दील कर दिया गया क्योंकि वहां कुछ भक्त अपनी धार्मिक यात्रा करने वाले थे पर उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया। यह घटना ये साबित करती है की उत्तर प्रदेश के हिन्दू अब भी मध्यकालीन भारत में जी रहें हैं जहाँ उनसे उनके धार्मिक अनुष्ठान के लिए ज़जिया वसुला जाता था। सवाल ये उठता है ऐसे मोकों पर सजग और तत्पर दिखने वाली अखिलेश सरकार दंगे के वक़्त सोती क्यों रह जाती है कहीं ये वो जानबूझकर तो नहीं करती? अगर ये जानबूझकर होता है तो किन्हें खुश करने के लिए? खैर अखिलेश सरकार के इन कृत्यों के लिए उन्हें वक़्त और जनता सबक सिखायगी। हम तो उन दो वीर भाइयों को श्रधांजली अर्पित करते हैं जिन्होंने अपनी बहन की शीलरक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। --सुधीर मौर्य
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