Showing posts with label खुशरो. Show all posts
Showing posts with label खुशरो. Show all posts

Friday, 12 June 2015

परिवर्तन, किसमे कितना ? - सुधीर मौर्य

अभी कुछ दिन पहले अपने किसी सम्बोधन में अशोक सिंघल जी ने राजा सुहेलदेव की प्रशंशा की।  कौन सुहेलदेव ? प्रश्न बहुत लोगो के दिमाग में आयेगा।  सुहेलदेव के बारे में लोगो को को जानकारी होना लाज़िमी भी है। क्योंकि सुहेलदेव की वीरता की चर्चा कभी भी सम्पूर्ण ढंग से हुई ही नहीं।  तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार सुहेलदेव की तारीफ़ क्योंकर करते जबकि सुहेलदेव ने आतताई सालार मसूद को बहराइच में मार गिराया था।  वही सलरमसुद जो भारत में सतरह हमले करने वाले महमूद ग़ज़नवी का भांजा था और और जो महमूद ग़ज़नवी की ही तरह भारत में विध्वंस करना चाहता था।  ऐसे नराधम को मारकर राजा सुहेलदेव ने भारत और भारत के आमजनमानस का कल्याण किया था। सालार मसूद के कुकृत्यो को विफल करने वाले का गुणगान मुस्लिम इतिहास कारो के फ़र्ज़ के दायरे से  बाहर था। और आधुनिक वामपंथी इतिहासकार अपनी छद्द्म सेकुलरता के चलते वीर सुहेलदेव की वीरता के बखान  की जगह सालार मसूद को पीर के रूप में महिमा मंडित करने में सहायक बनते रहे।     

सुहेलदेव भर / राजभर / पासी  कुल से थे, जिनका गौरवमयी इतिहास रहा है। ख़ैर आज मैने सुहेलदेव की चर्चा किसी अन्य कारणों से की है।   अशोक सिंघल जी ने सुहेलदेव के वीरोचित कार्य का गुणगान करके भारत के इस वीर सपूत के कार्यों को अमर करने का प्रयास किया।  पर अशोक सिंघल जी के इस पवित्र कार्य को भी कई तथाकथित दलित और मुस्लिम बुद्धजीवियों ने गलत ढंग से लिया और फेसबुक जैसी सोशल साइट इसका जी भर के कुप्रचार किया।  कमेंटों और पोस्टो के जरिये अशोक सिंघल जी को विदूषक तक कह डाला।  अपनी बात रखने और उसे सही साबित करने के लिए उन्होंने विभिन्न कुतर्को का सहारा लिया।  वही बाते जैसे - बीती कई सदियों में कैसे उच्च जातियों ने निम्न जातियों में अत्याचार किये।   मैं उनकी इन बातो से सहमत भी हूँ।  अवश्य ही दलितों के ऊपर श्रृंखलाबद्ध अत्याचार हुए है।  उन्हें भाति भांति से प्रताड़ित किया गया।  और तो और उन्हें करने के लिए तमाम घटिया नियम बनाये गये और स्मृतियों के रूप में लिपिबद्ध किया गया।  घटिया और नीच कार्य की जितनी आलोचना और भर्तसना की जाए वो कम होगी।  पर तथाकथित दलित विचारको से  मैं पूरी तरह असहमत हो जाता हूँ जब वो मुस्लिमो के द्वारा किया गए अत्याचार पे मूक बन जाते है या फिर जब परोक्ष - अपरोक्ष रूप से मुस्लिमो के द्वारा इस्लाम के नाम पे किये गए अत्याचार का समर्थन करते है।

मैं ये मानने को हरगिज़ तयार नहीं कि जब तलवार के ज़ोर पे इस्लाम फैलाया जा रहा था तो इस्लामिक हमलावरों के कहर से दलित समुदाय बचा रहा होगा।  सोशल साइट्स पे कई तथाकथित मुस्लिम बुधजिवी इस तरह से बाते करते हुए पाये जाते है मानो जिस दिन से इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया उस दिन से ही उन्होंने भारत के दलित समुदाय को अपना भाई बना लिया।  उन्हें गले लगा लिया।  उनके दुःख दर्द में शरीक हुए और उनके हमदर्द रहे।  दलित समुदाय जिसे में दलित हरगिज़ नहीं मानता बल्कि उन्हें  भारत की गौरवमयी  सभ्यता का हिस्सा मानता हूँ , वो दलित समुदाय अब भी मुस्लिम इतिहासकारो / बुद्धजीवियों की इन चिकनी चुपड़ी बातो में बड़ी आसानी से जाते है, कि दलितों पे अत्याचार सिर्फ तब तक हुए जब तक मुस्लिम लोगो ने भारत में प्रवेश नहीं किया था।  और भारत में मुस्लिमो के शासक बनते ही उनपे अत्यचार बंद हो गए और मुस्लिमो के समकक्ष बना दिए गए।   मुस्लिम किस तरह अपने शासन में हर गैर मुस्लिम को काफिर मानकर उनपर किस तरह बर्बरता से अत्याचार करते है उसके लिए तनिक सी मेहनत करके पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू  दलितों का हाल जानकर, जाना जा सकता है।  किस तरह वहां दलित और सवर्ण का भेद किये बिना हर हिन्दू लड़की का अपहरण करके उसका जबरन सामूहिक बलात्कार किया जा रहा है ये किसी से अब छुपा नहीं है।  पर गंधारी और ध्रितराष्ट्र की आँखों से ये दिखाई नहीं देगा। 

पिछले दशको में प्राचीनकाल से सवर्ण कहलाते रहे लोगो के एक धड़े ने अपने और अपने विचारो ने परिवर्तन किया है।  उन्होंने दलितों को अपना ही हिस्सा स्वीकार करके उन्हें छुआछूत के दायरे से निकालने के लिए प्रयास भी किया है। सावरकर जी ऐसे ही हिन्दू  बुद्धजीवी  थे जिन्होंने दलितों के गौरवमयी गाथा का वर्र्ण किया।  अत्याचारी ख़िलजी वंश का विध्वंश करने वाले वीर खुसरो जो एक दलित से जबरन मुस्लिम बनाया गया था उसके वीरोचित कार्य का बखान करके उसकी मान - प्रतिष्ठा सावरकर जी ने ही की।  ऐसे ही कई उज्जवल नक्षत्र, मुस्लिम और वामपंथ का चश्मा पहने इतिहासकारो ने जानबूझ कर विलुप्त हो जाने दिए।  अब जब राष्ट्रिय स्वयंसेवक  संघ ने  ऐसे विलुप्त नक्षत्रो को खोज कर उनकी मान प्रतिष्ठा का पवित्र कार्य का वीणा उठाया तो उनकी सरहना की जगह अपनी गपोड़बाज़ी से वामपंथी इतिहासकार / बुद्धजीवी समाज  और देश में अलगाव का ज़हर ही फैला रहे है और कुछ नहीं।

कहने का तातपर्य बस इतना है कि हर किसी को समाज और देश को जोड़ने का दायित्व लेना पड़ेगा।  गुज़रे दिनों के फेर में पड़कर वर्तमान और भविष्य को ख़राब करना बिलकुल बुद्धिमानी का काम नहीं है।  हर किसी को राष्ट्र की एकता के लिए अपनी सोच और विचारो में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।  अब जब संघ की पहल पर दलितों को साथ में जोड़ने का शुभारम्भ हो रहा है तो दलितों का भी दायित्व है कि बीती बाते भूलकर समाज में अपना बराबर का सहयोग देने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाये।  और राष्ट्र के उत्थान का मख्य स्तम्भ बने। 

--सुधीर मौर्य
गंज जलालाबाद , उन्नाव
उत्तर प्रदेश

२०९८६९      

Saturday, 19 October 2013

देवल देवी: एक संघर्षगाथा (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारी, चाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल रानी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्म, संस्कृति, कला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्म, संस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को न भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को न पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और न अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्ति- खुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यत: मुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछा, पापी, नरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दर, दृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलत: एक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसन" रख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाह" की उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही था) को मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुन: दक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तों, राजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास न किया। वस्तुत: खुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयास, तलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया।
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी - दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 ई. की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलत: मैं हिन्दू का पुत्र हूं, मेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त है, इसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्ताना" कहलाने वाली देवल देवी जो मूलत: एक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती है, अब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, क्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया, परन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुत: इस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं में, जो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थे, स्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागा, जो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 ई. में) विजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ।

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
 प्रकाशक - साहित्य संचय     B-1050, Gali No. 14/15, Pahla Pusta,
Soniya Vihar, New Delhi- 110 094
Contact No: 9871418244, 9136175560
email: sahityasanchay@gmail.com

Sunday, 6 January 2013

हिन्दू सामग्री देवल देवी...



Sudheer Maurya 'Sudheer'
**************************
सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारीचाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल देवी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरिवारंगलद्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्मसंस्कृतिकला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्मसंस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को  भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को  पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और  अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्तिखुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यतमुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछापापीनरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दरदृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलतएक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसनरख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाहकी उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही थाको मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुनदक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तोंराजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास  किया। वस्तुतखुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयासतलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलतमैं हिन्दू का पुत्र हूंमेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त हैइसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्तानाकहलाने वाली देवल देवी जो मूलतएक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती हैअब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहाक्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गयापरन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुतइस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं मेंजो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थेस्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागाजो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 मेंविजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ। 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९