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Thursday, 1 September 2016

ऐंजल ज़िया (कहानी संग्रह) - सुधीर मौर्य


कसबे में एक हरे रंग के बाशिंदे में साथ उसकी उठक - बैठक थी।  कहते है जब दिल में डर हो तो उसकी लकीरे चेहरे पर नुमाया हो जाती है।  उसकी भी हुई।  और उन डर की लकीरों पर उस हरे रंग के बाशिंदे अब्दुल की भी नज़र पड़ी।
उस दिन अब्दुल जब उसके साथ बैठा चाय पी रहा था उसके चेहरे पे उभरी डर की लकीरों पे नज़र चुभाते हुए अब्दुल बोला - 'क्यों बे विजय तेरे चेहरे पे हर वक़्त हवाइयां क्यों उड़ती रहती है। '
अब अब्दुल ने विजय को 'बे' कोई प्यार - मुहब्बत में तो नहीं बोला था।  सच तो ये था कसबे में हरे रंग वाले बहुसंख्यक थे।  सो अल्पसंख्यक गेरुए रंग वालो को  'अबे - तबे' सुनने की आदत हो गई थी।  कभी - कभी इससे भी ज्यादा।   भौंस  .... , मादर  .... , आदि - आदि।
अब विजय का अब्दुल के साथ उठना - बैठने था सो अब्दुल उसे अबे - तबे से ज्यादा नहीं बोलता था।  इतना लिहाज़ तो लाज़िमी था।  हाँ विजय, अब्दुल को अबे - तबे बोले ऐसा कोई हक़ उसे हांसिल नहीं था।  
विजय, अब्दुल के अबे - तबे के सम्बोधन पर न पहले कभी उलझा था न आज उलझा।  बस चाय सुड़कते हुए अपने डर का पर्दा सरकाता रहा।
पूरा पर्दा सरकने के बाद अब्दुल ने अपने दाये हाथ की तर्जनी से अपनी दाढ़ी खुजाई, फिर अचानक हो हो करके हंस पड़ा। वो  हँस रहा  था और विजय उसे यूँ हँसता देख खुद को अहमक समझ रहा था।  अब्दुल को वो अहमक समझे ऐसा हक़ भी उसे हांसिल नहीं था।  वो  गेरुए रंग का जो था। गेरुया रंग कसबे में अल्पसंख्यक जो था।  
अचानक अपनी हँसी रोक कर अब्दुल ने एक चपत विजय के जांघ पर मारी और फिर बोला 'ये क्या मनघडंत बवाल पाल रखा है मिया तुमने अपने दिल में।  ये लव सव जिहाद कुछ नहीं होता है।  अरे तुम्हारी लड़की को प्यार - स्यार हुआ है, उस लड़के से।  और तुम तो जानते हो मियां जब प्यार होता है तो लड़कियों का रंग निखरता है।  सो खुश रहो मियां और वक़्त पे बाँध दो अपनी लड़की को उस अफ़रोज़ के साथ निकाह के फंदे में।'
--कहानी संग्रह 'ऐंजल ज़िया' में संग्रहीत कहानी 'लव ज़िहाद और आईने का सच' का अंश।
--ये कहानी संग्रह अमेज़ॉन पे सिर्फ 125 रूपये में उपलब्ध है।  
http://www.amazon.in/Enjal-Ziya-Sudheer-Maurya/dp/938602716X/ref=sr_1_3?s=books&ie=UTF8&qid=1472739763&sr=1-3

Thursday, 18 June 2015

डॉ अर्चना प्रकाश का कहानी संग्रह 'दुष्यंती फेरे' - सुधीर मौर्य

अतीत और वर्तमान की कड़ियों को मिलाकर एक सशक्त कथानक के निर्माण करने में  कथाकार डाक्टर अर्चना प्रकाश को महारत हासिल है।  लेखिका का प्रस्तुत कहानी संग्रह दुष्यंती फेरे इसका ज्वलंत उदहारण है।  संग्रह की मुख्य कहानी दुष्यंती फेरे लेखिका की सर्वश्रेष्ठ रचना है।  इस कहानी में लेखिका ने नायक सिद्धांत और नायिका संजना को लेकर जिस ताने बाने को लेकर कथानक का सृजन किया है वो अभूतपूर्व है। लेखिका ने अपने संग्रह में उन तमाम सामाजिक मुद्दो को सजीवता से उठाया है जो समाज के लिए नासूर बनते जा रहे है। कहानी वापसी में अर्चना प्रकाश जी ने  जिस तरह से लव जिहाद के मुद्दे को सजीव किया उसके लिए वे धन्यवाद की पात्र है। इसके अतरिक्त कहानी उसके बाद में, उन्होंने  सामूहिक बलात्कार की झकझोर देने कथानक का चित्रण किया है। समाज के अन्य मुद्दे जैसे - ढोंगी साधुओं पे भी जम कर प्रहार किया गया है। लेखिका की कहानी सिद्धिप्रभा स्त्री विमर्श के नए आयाम स्थापित करेगी।
कुल जमा अगर कहे दुष्यंती फेरे ऐसा कहानी संग्रह है जिसके पैन पलटते ही आप वर्तमान में अतीत  को भी जिन्दा होते पायगे।  मैने ऐसा ही किया और ये सचमुच अनोखा अनुभव है।  अब आपकी बारी है।
शुभकामनाये।
सुधीर मौर्य

अम्बरनाथ, मुंबई     

Sunday, 24 May 2015

भाग्य (कहानी) - सुधीर मौर्य


ओह बहुत बुरा हुआ। सारिका अपनी माँ के पास बैठते हुए बोली। पर इसमें कोई क्या कर सकता है। ये भाग्य तो उनका खुद का चुना   हुआ है। अगर पार्टिशन के वक़्त ट्विंकल के ग्रैंड फादर इंडिया आ जाते तो ऐसा कुछ भी न होता। ये तो पकिस्तान की रोज़ की न्यूज़ हो गयी है कि हिन्दू  लड़की का अपहरण करके उसे  जबरन मुस्लिम लड़के के साथ व्याहा गया। बेचारी ट्विंकल भी इसी का शिकार हुई। हम पकिस्तान में कुछ नहीं कर सकते अब ट्विंकल का यही भाग्य है।
           इतना कह कर सारिका उठ कर घर के बाहर चल दी। माँ के टोकने पर बोली शाम तक वापस आयेगी। माँ उसे जाते हुए देख कर सोचती रही अच्छा हुआ जो हम बटवारे के वक़्त इंडिया आ गए।
           सारिका और ट्विंकल दोनों ही लगभग हम उम्र। उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ तिफ्ली और जवानी गले मिला करती है। दोनों ही सहेलिया, पत्रों के द्वारा। कभी-कभी फ़ोन पर भी बाते हुई। रूबरू मुलाकात कभी नहीं। हाँ दोनों एक-दुसरे की सूरत तस्वीरों से पहचानती है।
            भारत-पकिस्तान बटवारे से पहले सारिका के दादा और ट्विंकल के दादा सिंध के एक गाँव मीरपुर में एक ही मोहल्ले में रहते थे बटवारे की आग ने सारिका के दादा को हिला  दिया और उन्होंने भारत आने का फैसला कर लिया। पर ट्विंकल के दादा ने यह कह कर मीरपुर छोड़ने से इनकार कर दिया की उनकी यंही जड़े जमी है और फिर ये उन्मादी दंगे है देर सवेर थम जायेंगे और यहाँ भी अमन बहाली हो जाएगी।
              सारिका के दादा भारत में आकर महाराष्ट्र के उल्ल्हासनगर में बस गए, यंही शादी की और व्यापार जमाया। जबकि ट्विंकल के दादा कभी अभाव में तो कभी सामान्य तरीके से पकिस्तान के मीरपुर में रहते रहे। पर दोनों ही खतो से जुड़े रहे, उनके बच्चे और उनके बच्चो के बच्चे भी।
               कुछ दिन पहले टिवंकल का मीरपुर स्थित उसके घर से अपहरण हो गया और उसकी शादी महमूद शाह नाम के लड़के से  ट्विंकल के बिना रजामंदी के कर दी गयी।
               सिंध के तमाम संगठनो और पत्रकारों के दखल से मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया पर ट्विंकल को आजाद न कराया जा सका। फ़ोन पर इन सब बातों की खबर ट्विंकल के पिता नंदलाल ने सारिका के पिता रणवीर को रो-रो कर बताई। और उन्ही बातों को जानकर सारिका ने ट्विंकल के भाग्य के लिए ट्विंकल के दादा को दोषी ठहराया।


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शाम को गार्डन में टहलते हुए जब अफरोज सारिका को एक झुरुमुट के पीछे ले गया तो वो चिहुँकते हुए बोली प्लीज अफरोज ये सब शादी के बाद।
- शादी भी कर लेंगे डियर, हुजुर बालिग़ तो हो जांए।
अफरोज सारिका के सीने से चिपकते हुए बोलता है।
- अच्छा तोबालिग़ होने से पहले, जनाब ये सब कर सकते है, सारिका तनिक शोखी से बोली।
- हाँ, जानेमन अब रहा नहीं जाता, अफ्रोज्ज़ सारिका के चेहरे पर गर्म सांसे छोड़ता हुआ कहता है।
- ओह अफरोज ! पर यहाँ नहीं किसी सेफ जगह। 
- ओह वो सेफ जगह सारिका बेबी की नज़र में कहाँ है।
अफरोज अपने होठ सारिका के होठ से सटाते हुए कहता है।
- सारिका भी अफरोज के होठों से अपने होठ जोड़ने से पहले कहती है- सेफ जगह ढूँढना तुम्हारा काम है हनी।
         
   फिर दोनों अलिंग्बंध हो आधुनिक लिप किस में मशगूल हो जाते है।
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 टीवी सीरियल बनाने वाली कम्पनी के दफ्तर के बाहर सारिका खड़ी है। अभी-अभी उसने टीवी सीरियल में बतौर नायिका काम करने के लिए ओडीएशन दिया है। उसकी सबसे बड़ी तम्मना है की वो रुपहले परदे पर चमके। उसका औटोग्राफ लेने वालो की भीड़ उसके आगे-पीछे घुमे।
            सारिका बार-बार घडी देखती है, आखिर ये अफरोज आया क्यूँ नहीं, उसे झुन्झुलाह्त होती है। वो अभी गुस्से से अपना पांव ज़मीन पर  पटकती है, तभी एक, एक व्हाइट स्कोडा उसके पास आ कर रूकती है। सारिका इस गाड़ी को पहचानती है, ये अफरोज की है।  विंडो खोल कर अफरोज बोलता है- इस तरह पैर मत पटको, शादी से पहले अगर लंगड़ी हो गयी तो फिर मुझे सोचना पड़ेगा।
- व्हाट डू यू मीन लंगड़ी हो गयी - सारिका बनावटी गुस्से के साथ बोली।
- ओके अब गाड़ी में तशरीफ़ ले भी आइये मैडम अफरोज दुसरे तरफ का डोर ओपन करते हुए बोला। 
            बाय द वे आप यहाँ क्यूँ आई थी, क्या बन्दा ये जान सकता है। अफरोज गाड़ी गियर में डालते हुए बोला।
            हाँ-हाँ क्यूँ नहीं, सारिका तनिक और शोखी बढ़ाते हुए बोली। दरसल मै यहाँ सीरियल में एक्ट करने के लिए ओडीएशन देने आई थी।
             ओह कौन से स्टूडियो में, अफरोज स्कोडा की स्पीड बढ़ाते हुए बोला।
- 'देवांग फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड' सारिका मुंह में चुइगम डालते हुए बोली।
-ओह उसका मालिक देवांग तो मेरा दोस्त है कहो तो सैटिंग कर दूँ अफरोज ने सारिका को  आँख मारते हुए कहा।
- ओह सच। सारिका के चेहरे पर जहान भर की खुशियाँ खिल उठी।
            फिर देवांग से बात करके, सीरियल में सारिका का रोल फिक्स करने के बाद अफरोज अपना बांया हाथ सारिका की जांघ पर रखते हुए बोल- 'अब तो पार्टी बनती है यार।'  
हाँ-हाँ जब कहो सारिका भी अपना हाथ अफरोज के हाथ पर रख के बोलती है।
            फिर चलते है मेरे घर, वह आज एकदम  खाली है बिलकुल सेफ। अफरोज अब सारिका की जांघ दबा कर बोलता है।
सारिका- शादी से पहले? 
अफरोज- वो भी हो जाएगी यार।
             अफरोज, सारिका के साथ अपने घर पहुँचता है। और सारिका इस वादे के साथ की बहुत जल्द अफरोज उससे शादी करेगा, बिस्तर पर उसे समर्पित हो जाती है।
             मम्मी-पापा के लाख समझाने और विरोध के बावजूद सारिका अपनी अट्ठारवी सालगिरा पर अफरोज से कोर्ट मैरिज कर लेती है। आखिर अफरोज अपना वादा निभा रहा है। और तो और आज अफरोज की वजह से ही उसकी गिनती पब्लिक फिगर में होती है। टीवी की जानी-मानी कलाकार सारिका कपूर। और अब तो उसका ख्वाब फ़िल्मी पर्दे पर चमकने का है।

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तीन साल और तीन बच्चों की माँ। सारिका ने जब भी विरोध किया, अफरोज बोला एक बार फॅमिली पूरी हो गयी तो फिर तुम आराम से अपने प्रोफेशन में फिट हो सकती हो।
             प्रोफेशन, वो तो कब का छूट गया। हमेशा प्रेग्नेंट रहने वाली लड़की को कौन काम देगा ? अफरोज का रवैया भी काफी बदल गया। गाली-गलौज और बात-बात में मार पीट। सिने तारिका  बनने का सपना तो अतीत हो गया। एक अच्छी गृहणी की तरह रहना भी दुश्वार हो गया।
             अफरोज का मन भी सारिका से भर गया। वो उसे जी भर कर भोग चूका था। अब उसे एक नयी  कली की तलाश थी जिसे वो फूल बना सके। और उसे वो  कली कोमल के रूप में मिल गयी। सिने जगत की उभरती हुई तारिका।  

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वो अफरोज का ही ख़त था। कांपते हाथों और धडकते दिल के साथ सारिका ने पढ़ा-
             सारिका !  तुम जानती हो अब हम साथ नहीं रह सकते। तुम्हे अपने प्रोफेशन के लिए मै आज़ाद करता हूँ। वैसे भी शरियत के एकोर्डिंग हमारी शादी जायज नहीं है, क्यूँ की तुम  ने इस्लाम कबूल नहीं किया है। फिर भी कोर्ट में हमारी शादी हुई थी, सो तुम तलाक ले सकती हूँ।
 अलविदा .
- अफरोज 
           न जाने कब तक सारिका रोती  रही। इस्लाम कबूल नहीं किया। बच्चो के नाम आसिफ,वसीम और सबा है। अफरोज नाम के आदमी के साथ तीन साल से हमबिस्तरी कर रही हूँ। और इस्लाम कबूल नहीं किया।
           रोते-रोते सारिका को ट्विंकल की याद आ जाती है। और ट्विंकल रैप जेहाद का शिकार हुई तो वो खुद लव जेहाद का शिकार है। पार्टीशन के बाद उसके दादा इंडिया आये, फिर भी उसका भाग्य न बदल सका। और उसकी वही दुर्गति हुई जो पकिस्तान में ट्विंकल की हुई।
            सच भाग्य तो भाग्य उसमें किसी का दोष नहीं सिवाए अपने कर्मों के। सारिका अब अपने कर्मों को लेकर पछता रही है। क्यूँ की उसके भाग्य का सम्बन्ध उसके कर्मो से ही है।

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कहानी संग्रह 'क़र्ज़ और अन्य कहानियां' में प्रकाशित।

सुधीर  मौर्य
ग्राम और पोस्ट - गंज जलालाबाद
जनपद - उन्नाव
२०९८६९