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Sunday, 1 January 2017

अधूरे पंख - सुधीर मौर्य

कितना भोलापन था उस दिन तुम्हारे चेहरे पर, मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्ति के आगे जब तुम हाथ जोड़कर खड़ी थी। मैं कभी तुम्हें और कभी मूर्ति को निहार रहा था। मंदिर से बाहर आकर गार्डन में टहलते हुए जब मैंने तुमसे पूछा, मुझसे शादी करोगी उस समय तुम्हारा चेहरा लाज से लाल हो गया था।
तुम मुँह से कुछ न बोली थी बस सर को हाँ के इशारे में हिलाकर आँखें नीची करके घास को देखने लगी थी। सच उस दिन मुझे अपरिमित खुशी मिली थी, पर मैं भी अपने होठों से कुछ बोल न सका था।
हम मंदिर परिसर से बाहर आ गये थे। तुम कालेज जाना चाहती थी। एक रिक्शा रोक कर हम उसमें बैठ गये थे। जीवन में सम्भवतः पहली बार मैंने किसी लड़की का हाथ पकड़ा था, तुमने सर उठाकर मेरी तरफ देखा था, सच तुम्हारी आँखों में बहुत गहराई थी जहाँ पर मैंने अपने लिए प्रेम देखा था। हमारे बीच बहुत कम बातें हुई थी, तुम्हारा कालेज आ गया था, मेरे हाथों से तुम अपना हाथ छुड़ाते हुए रिक्शे से उतरकर खड़ी हो गई थी। मैंने भी रिक्शे से उतरकर भाड़ा चुका दिया था। हम दोनों आमने-सामने खड़े थे-शांत-काफी देर में ये शांति तुमने ही तोड़ी थी, ये कहकर मैं जाँऊ मेरे होठों से बस इतना निकला था-हाँ। तुम चली गई थी हां कालेज के गेट पर पहुँचकर तुमने पलट कर मुझे देखा था। तुम्हारे कालेज जाने के बाद मैं कितनी देर वहाँ पर खड़ा रहा था।
आज हम मोतीझील में मिले थे, तुम्हारे साथ तुम्हारी फ्रेन्ड रेखा भी थी। आज तुमने गुलाबी सूट पहन रखा था, पर उससे भी ज्यादा तुम्हारा चेहरा गुलाबी लग रहा था और उससे भी ज्यादा गुलाबी थे तुम्हारे होठ।
रेखा ने ठिठोली करते हुए जब मुझसे पूछा था मैं आपको जीजा कहूँ या अस्मिता को भाभी। मैं तपाक से बोला था अस्मिता को भाभी, मेरी बात पर तुम शर्मा गई थी और नज़रें नीची करके घास के तिनके तोड़ने लगी थी। मैंने पहली बार किसी लड़की के बालों को छुआ था। मैं बहुत देर तक तुम्हारे बाल सहलाता रहा था और तुम यूंही सर झुकाये घास के तिनके तोड़ती रही थी। आज मैंने तुम्हें गुरूदेव पैलेस पर छोड़ा था जहाँ से तुम्हें अपने घर जाना था, तुम चली गई थी अपने घर और मैं लखनऊ।
तुम्हारा पत्र आया था मेरे मित्र के पते पर उसने कालेज में मुझे दिया था, तुमने बहुत बड़ा पत्र लिखा था पर उसकी दो बातें मेरे दिल के रास्ते मेरी आत्मा में उतर गई थी। तुम कह रही थी राजीव जब से तुम मिले हो मुझे लगता है मैं आसमान में उड़ रही हूं पंख लगाकर, यह पढ़ कर मुझे ऐसा लगा था जैसे मेरे भी पँख उग आये हो और मैं भी तुम्हारे साथ उड़ चला हूँ आकाश में अनन्त सफर पर। दूसरी बात जो तुमने लिखी, राजीव कुछ भी गलत काम करने से पहले तुम एक बार मुझको याद कर लेना। सच इस बात ने भी मेरी आत्मा पर दस्तक की थी। सच पूछो तो आज भी जब कोई गलत काम मुझसे होने लगता है तो तुम मुझे याद आ जाती हो और फिर मैं सब भूलकर तुम्हारे ख्यालों में खो जाता हूँ।
हर वीकेन्ड उस समय हमारी मुलाकात का गवाह था, हर शनिवार में अपने काॅलेज के हाफ टाईम के बाद के पीरियड अटैन्ड नहीं करता था, चारबाग से बस पकड़कर (हाँ उस समय रोडवेज का अंतर्राज्यीय बस अड्डा चारबाग में ही था। मैं कानपुर के लिये रवाना हो जाता था, तुम संडे को अपने रूम पर अकेली रहती थी, हाँ कभी-कभी तुम्हारे छोटे भाई-बहन होते थे पर उनसे हमारी मुलाकात में कभी अड़चन न आई थी। तुम मेरे सर को अपनी गोद में लेकर बैठी रहती और हाथों की अंगुलियों से मेरे बालों को सहलाती रहती, भावनाओं के आवेश में मैं जब कभी अपने गर्म हांठ तुम्हारे गुलाबी अधरों पर रख देता तो तुम खिसक कर मुझे अपने पहलू में ओर जगह देती और मैं न जाने कितनी देर तुम्हारी रोमहीन टाँगे सहलाया करता। मादकता के क्षणों में मेरे होठों से जब कभी तुम्हारा नाम निकलता-अस्मिता तो तुम्हारा आलंगिन ओर सख्त से जाता।
हाँ उस दिन वर्ष का पहला दिन था, तुमने मुझे पत्र लिखकर बुलाया था, उस दिन मैं सुबह सात बजे चारबाग से बस पकड़ सका था इसलिए तुम्हारे बताये साढ़े नौ के टाईम पर पहुँच न सका, पूरे एक घण्टे लेट पहुंचा था। मैं, उस दिन पहली बार मैंने तुमको अपने ऊपर नाराज पाया था, सच उस दिन तुम रूठी हुई बहुत भली लगी थी।
उस दिन हम बहुत घूमे थे चिडि़या घर में, और हाँ वो जगह जहाँ रात्रिचर प्राणी रखे जाते है उस जगह जब तुम मुझे ले गई थी तो अँधेरा देखते ही मैंने शरारत से तुम्हें अपने गले लगा लिया था और तुमने भी मेरे चेहरे पर अपने होठों के कितने निशान छोड़ दिये थे।
उसी दिन हमने गुरूदेव पैलेस में तीन से छः का परदेस फिल्म का शो देखा था और फिर हर बार की तरह हम जुदा हो गये थे, तुम अपने घर और मैं लखनऊ।
तब शायद मैं जानता नहीं था कि ये जुदाई, ये बिछड़ना ये सब नियति ने मेरे भाग्य में लिख ही रखा है, हाँ उस समय इसका बिल्कुल एहसास न हुआ था।
न जाने क्यों कभी-कभी मुझे तुम्हारी छोटी बहन श्वेता की आँखों में अजीब सी हलचल दिखाई देती, मुझे ऐसा लगता जैसे वो मुझे ननीदी नजरों से देख रही है, मैं इसे वहम समझकर झटक देता या कभी सोचता उसने मुझे तुम्हारे साथ आंलिगन बद्ध देख लिया होगा। श्वेता की उम्र पन्द्रह साल होती तुमसे दो वर्ष छोटी पर शरीर में वो तुमसे उन्नीस कतई न थी।
उस दिन जब तुमको तुम्हारी फ्रेन्ड रेखा के साथ बाहर जाना पड़ गया तो मैं भी थका होने के कारण तुम्हारे रूम पर सो गया था, फरवरी की हल्की ठण्ड ने मुझे कम्बल ओढ़ने पर विवश कर दिया था।
अचानक मुझे लगा कि किसी ने अपने होठों को मेरे होठों पर रख दिया है, मुझे लगा कि मैं स्वपन लोक में हूँ, पर मेरी तन्हाई टूट गई थी मैंने आँखे खोल के देखा तो मुझे सिर्फ तुम्हारे बाल दिखाई पड़े मुझे लगा तुम मार्केट से वापस आ गई हो और मैंने तुम्हें कम्बल के अन्दर खींच लिया था, मैंने दुबारा आंखें खोलने की कोशिश न की थी।
और जब आँखें खुली तो खुली की खुली रह गई वो तुम न थी वो तो श्वेता थी। मेरे आँख खुलने का कारण उसकी चीख थी जो उसके प्रथम मिलन की पीड़ा के कारण निकल गई थी पर आँख खुलने के बाद भी मैं रूक न सका था आखिर था तो पुरूष ही, मंजिल पर पहुंच कर ही मेरे कदम रूके थे, और उसने भी कदम से कदम मिला कर हाँफती सांसों के साथ मेरा साथ दिया था।
वक्त गुजर चुका था, मैं ग्लानि से डूबा जा रहा था पर श्वेता के चेहरे पर असीम तृप्ति के भाव थे।
तुम जब मार्केट से आई थी कितनी खुश थी मेरे लिए हाफ स्वेटर लाई थी तुम्हारी जिद पर मुझे पहनना पड़ा था, आज न जाने क्यों मैं तुमसे आँखें चुरा रहा था।
मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी, नौकरी के लिए मैं तुम्हारे शहर कानपुर आ गया था, मुझे रूम भी तो तुमने ही दिलवाया था। जब तुम श्वेता के साथ मुझसे मिलने आती तो मैं आत्मग्लानी से दब जाता, मैं प्रेम तो सिर्फ तुमसे करता था, पर श्वेता मुझ पर तुम्हारा इतना ही या यूँ कहें तुमसे ज्यादा मुझ पर अपना हक समझती थी।
न जाने कब श्वेता ने मेरे और तुम्हारे आंलिगन वाले फोटो निकाल लिये थे और उनके बूते वो मेरी शय्या सहचरी बनने लगी थी। इतनी कम उम्र में इतने दाँव मैं सोच कर दंग रह जाता, पुरूष होकर भी मैं विवश था और नारी होकर भी वो………..। कभी मन करता कि तुम्हें सब बता दूँ पर तुम्हारा ख्याल ही मुझे रोक लेता। बहन ही बहन की अप्रत्यक्ष दुश्मन बन चुकी थी। हाँ एक बात सच थी वो अभिसार में तुमसे कई ज्यादा पारंगत थी पर तुम इन सब बातों से अनजान थी।
वक्त खिसक रहा था तुम कानपुर विद्यामंदिर से निकल कर पी0पी0एन0 पहुंच गई। श्वेता को मना लिया था या शायद उसने अपनी गलती मान ली थी उसने मेरे और तुम्हारे बीच से हटने का फैसला कर लिया था, उस दिन वो मेरे काँधे पर सर रखकर सिसकते हुए बोली थी- तुम सच कहते हो राजीव तुम सिर्फ अस्मिता को प्यार करते हो मुझे नहीं, मुझे माफ कर दो राजीव आज से हम सिर्फ फ्रेन्ड बन कर रहेंगे, पर तुम इस बारे में अस्मिता को कुछ न बताना, फिर वो भाग कर गई और वो सारे फोटो निकाल लाई थी, गैस को लाइटर से जलाते हुए उसने सारे फोटो उस पर रख दिये थे जो उसने मेरे और तुम्हारे आलिंगनबद्ध खींचे थे।
मैंने देखा वो रो रही थी मैंने आगे बढ़कर उसके आँसू पोछ दिये थे और उसके होठों को अपने होठों के गिरफ्त में ले लिया था, उसने मुझे परे ढ़केलने की कोशिश की थी, पर मैं अपने बाजुओं के घेरे को सख्त करते हुए बोला था बस श्वेता आज अन्तिम बार, मेरे इतना कहते ही उसने अपने फूल से शरीर को मेरे बाहों में ढीला छोड़ दिया था।
आज मैंने पहली बार पहल की थी और शायद आज ही उसे पूर्ण तृप्ति मिली थी, न जाने कितनी देर वो मेरे पांवों को चूम कर अपनी गलती की क्षमा माँगती रही थी।
बिगड़ी हुई लड़की इतनी जल्दी इस कदर सुधर सकती है मुझे अचरज होता था। श्वेता जैसे बिगड़ी थी वैसे ही सुधर गई थी, हाँ उस दिन के बाद वो आज तक मुझसे एक अच्छे फ्रेन्ड की तरह ही पेश आई थी।
तुम्हारे पापा घर पर थे, आज जब मैं तुमसे मिलने आया था, खाना खा रहे थे, मुझे आफर किया, तो मैंने सादगी से मना कर दिया था क्योंकि मैं नानवेज नहीं खाता, तुम्हारे पापा ने दुबारा नहीं पूछा था। तुमने नीला सूट पहन रखा था, बाल कंधे पर बिखरे हुए थे तुम आज कुछ ज्यादा ही सुंदर लग रही थी। आज तुम मुझसे कुछ न बोली थी और न ही मैं। तुम्हारे पापा खाना खा कर बाहर चले गये, श्वेता से ये बोल कर कि वो मेरे लिए चाय बना दे, वो एक नजर मुझ पे डाल कर किचन की तरफ चली गई थी, मैंने देखा उसने जाते हुए एक नजर तुम पर भी डाली थी। हम कमरे में अकेले रह गये थे, मैंने तुम्हारे नर्म हाथ को अपने हाथ में ले लिया था, तुमने विरोध न किया था, न जाने तुम्हें क्या हुआ था तुमने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया था और एक हाथ से मेरे सर को सहलाते हुये बोली थी ये अस्मिता सिर्फ तुम्हारी है राजीव इसे कभी भी अपने से दूर मत करना बदले में मैंने तुम्हारा हाथ जोर से दबा दिया था जो अब तक मेरे हाथों में था।
किसी के आने की आहट हुई थी, मैंने तुम्हें हटाना चाहा था पर तुमने यह कहते हुए कि श्वेता होगी नहीं हटी थी, तुम्हारा चेहरा मेरे कंधे पर था इसलिए तुम देख न सकी थी पर मैंने देखा था वो श्वेता नहीं तुम्हारे पापा थे, आज चोरी पकड़ ली गई थी, पर वह कुछ बोले न थे बस तुरन्त मुड़ कर चले गये थे। उनके जाने के बाद मैंने तुम्हारा गाल सहलाते हुये बताया था तो तुमने भींच कर मुझे गले लगा लिया था और सिसकते हुये बोली थी कुछ भी हो राजीव मैं तुम्हारे बिना रहने को सोच भी नहीं सकती-पापा चाहे कुछ भी बोले पर प्लीज मेरे देवता तुम मुझे अपने चरणों से हरगिज दूर न करना। अब तक मैंने सिर्फ कथा कहानियों में पढ़ा था कि प्रेम कुछ भी नहीं देखता सिर्फ अपने प्रियतम पर मर मिटना जानता है, आज इसे प्रत्यक्ष देख रहा था।
श्वेता अभी तक चाय लेकर न आई थी या शायद उसने बनाई ही न थी, तुम चाय लेने के लिये गई थी और मैं प्रियतम पर मर मिटने वाली जाती हुई अपनी प्रियतमा को देखता रहा था।
तुम्हारे पापा जिनसे मैं मन ही मन डर गया था मैं प्रतीक्षा कर रहा कि वो कब मुझसे तुम्हारे बारे में बात करते हैं, मैं उनकी दबंगई प्रवृत्ति से वाकिफ था ऊपर से वो गाँव के प्रधान भी थे।
तुम्हारे पापा ने तो अब तक कोई बात न की थी, पर हमारी गर्मियों की छुट्टियाँ गाँव में मजे से गुजर रही थी। उस दिन हम गाँव के बाहर शंकर भगवान के मंदिर पर मिले थे तुम्हारे साथ तुम्हारी फ्रेन्ड निधि थी, तुम मुझसे पहले मंदिर पहुँच गई थी, तुमने मौली मंदिर के छज्जे के छल्ले से बाँध दी थी। मैं जब पहँुचा था तो तुम और निधि मंदिर के टाईल्स से बने हुए फर्श पर आमने-सामने बैठी थी। मैंने तुमसे पूछा था प्रसाद चढ़ाया तो तुमने कहा था, अपने देवता के दर्शन बिना प्रसाद कैसे चढ़ा सकती हूँ, बदले में बस मैं मुस्करा दिया था।
हम न जाने कितनी देर मंदिर परिसर में टहल रहे थे, तुम कितनी खुश थी मंदिर के सरोवर में मछलियों को लईया खिलाते हुए। सरोवर में खिले कमल के फूलों को तुम प्यार से निहारती रहीं थी। तुम जानती थी मुझे तैरना नहीं आता इसलिए तुमने उन्हें लेने की बात नहीं कही थी।
आज जब मैंने तुम्हें फोन किया तो तुम उदास लग रही थी, मैंने पूछा तो बताया था कि पापा ने एल नेट कम्प्यूटर्स में एडमिशन के लिए होने वाले एग्जाम में बैठने से मना कर दिया है। मैंने तुमसे इस बारे में ज्यादा बात न की थी, उस दिन के प्रकरण से मैं पहले से शंकित था, तुम्हारे पापा अगर मुझसे बात नहीं करते हैं तो जरूर तुम पर कुछ न कुछ प्रतिबन्ध लगायेंगे, शायद मैं इसी का परिणाम था, मैंने इधर-उधर की बात करके फोन रख दिया था।
कुछ देर बेचैनी से मैं टहलता रहा था न जाने क्यों मैं अपने आपको दोषी समझने लगा था, शायद मेरे कारण ही तुम्हारे पापा ने तुम पर प्रतिबन्ध लगाया था। न जाने मुझे क्या सूझी थी मैंने तुम्हारे पापा से बात करने को मन बना लिया था। मैंने टेलीफोन का रिसीवर उठा लिया था डायल किया तो उधर तुम भी हाय हैलो करके मैंने तुम्हारे पापा को फोन देने को बोला था तुमने भी बिना कुछ पूछे पापा को बुला के रिसीवर उनके हाथ में पकड़ा दिया था।
हैलो कहते हुये मेरे होठों ने मेरा साथ नहीं दिया था, तुम तो शायद पापा के हाथ में रिसीवर देकर कमरे से चली गई थी। हाँ बोलो राजीव-तुम्हारे पापा ने पूछा था, मैंने कोई भूमिका नहीं बनाई थी, सीधे ही बोला था अंकल जी आप अस्मिता को एग्जाम देने के लिए भेज दीजिए, उन्होंने कहा था ठीक है और इतना कहते ही रिसीवर रख दिया था।
शाम को तुम्हारा फोन आया था, तुम कानपुर जा रही थी एग्जाम के लिए| तुमने कहा था मैं भी आऊँ, सो अगले दिन मैं भी आ गया था। मेरे कहने पर तुम्हारे पापा ने तुम्हें एग्जाम के लिये भेजा था। इसका अर्थ तुमने भी लगाया था। एग्जाम देने के बाद तुम बाजार से सिन्दूर लेकर आ गई थी, तुम्हारे कहने पर मैंने तुम्हारी मांग सिन्दूर से सजा दी थी, सच वो रात आज तक मेरे मन और जेहन में महकती रहती है, सच सुहागरात का अर्थ उस रात को स्पष्ट हो गया था, तुम तमाम रात कुछ न कुछ करती रही थी कभी मेरे पाँव दबाती कभी सर सहलाती कभी सीने के बालों को अपने होठों से दुलार करती, सच तुम्हारा वो रूप भूलता ही नहीं, चेहरे पर चुम्बन करती अस्मिता, आलिंगनबद्ध अस्मिता, मेरे सीने में अपने यौवन शिखरों को छुपाती अस्मिता, मेरे पैर पर सर रखती अस्मिता, और संभोग के लिए समर्पित अस्मिता।
उस रात तुम और मैं सिर्फ मर्द और औरत थे। यकीनन वो रात तुमने अपने यौवन की हरारत, अपने मन की शीतलता अपने अधरों की नर्मी और अपनी सांसों की मादकता से सम्पूर्ण एवं सार्थक कर दी थी। इससे पहले भी मैंने तुम्हें कई बार पाया था पर इस रात को तुम मुझे मेरी पत्नी की तरह समर्पित थी।
हमारे प्रेम को तुम्हारे पापा की मौन स्वीकृति मिल चुकी थी और तुमने वापस एक दिन वही वाक्य दोहराया था जो तुम अक्सर बोलती थी।
-राजीव, मुझे ऐसा लगा मैं आसमान में उड़ रही हूं पंख लगाकर-
मैं सहलाने लगा था तुम्हारे कांधे और पीठ तुम इठलाते हुए बोली थी राजीव क्या कर रहे हो-मैंने कहा था-पंख ढूंढ रहा हूं मेरी बात सुनते ही तुम पलट कर मेरे गले से लग गई थी। सच बड़ी ही कशिश थी अस्मिता, तुम्हारे यौवन में मैंने ही एक वर हार चुका तुम्हारे ऊपर।
………….हर बात तुम्हीं ने सिखाई, हर बात तुम्हीं ने बनाई, मेरे राजीव मैं बारह अगस्त को सुबह दस बजे मोती-झील के फस्र्ट गेट पर तुम्हारा इन्तजार करूंगी, मेरा देवता आना जरूर मैं इन्तजार करूंगी, अन्त में चरण स्पर्श।
आपकी
अस्मिता कटियार
हां यही पत्र मिला था मुझको तुम्हारा लखनऊ में न जाने कितनी खुशी होती थी अस्मिता जब मुझे ऐसे पत्र मिलते थे तुम्हारे, मैं तुम्हारे हर बुलावे पर, हर काम छोड़कर भाग कर तुम्हारे पास कानपुर आ जाता था।
एक दिन जब हम चिडि़या घर में मिले तो तुमने अपने दुप्पटे को अगुंली पर लपेटते हुए बोली जानते हो राजीव अपने लड़के का हम नाम रखेंगे ‘निष्कर्ष’ मैंने तुम्हारे चेहरे को देखा तो दया से गुलाबी हो रहा था, मैंने कहा अस्मिता अगर लड़की हुई-तुम बोली अदिति-मैंने कहा था, सोचो अगर अपने दो लड़के, एक लड़की होती है तो-
तुम थोड़ा और ज्यादा शर्मा गई थी, शर्माते हुए बोली थी-निष्कर्ष, आदिती और उद्देश्य यही होंगे हमारे बच्चों के नाम।
सच अस्मिता तुम वास्तव में पँख लगाकर उड़ रही थी, वक्त कितना खुशवार था।
पर वो दिन-
हाँ वो दिन-
हाँ पहली बार तुम वायदा करके मिलने न आई थी। मैं जाने कितनी देर रावतपुर क्रासिंग पर इन्तजार करता रहा था, तुम न आई थी, मैं अपने काम पर चला गया था।
मैं भाग कर हास्पिटल पहुँचा था, तुम्हारे भाई, चाचा और ताऊँ सभी थे। तुम दिखाई नहीं दी थी, तुम्हारे पापा इमरजेन्सी वार्ड में एडमिट थे, सर पे काफी चोट थी, गले की नस काट कर वहाँ से कृतिम श्वांस दी जा रही थी। मैं देखकर बाहर निकला, डाक्टर से बात की उन्होंने काफी सीरियस बताया, गांव से काफी लोग आये थे, कोई एक्सीडेन्ट तो कोई अटैम्पट आफ मर्डर की बात कर रहा था।
तुम आई थी, पापा को देखकर बाहर निकली, कारीडोर में आकर बेहोश हो गई थी मैं चाह कर भी सहारा व संतावना न दे सका था।
जिंदगी-मौत का संघर्ष समाप्त हो गया था रात्रि में तुम्हारे पापा ने अंतिम श्वांस ली थी, विजयी मौत तुम्हारे पापा को लेकर अनन्त यात्रा पर निकल गई थी। तुम्हारे रिश्तेदार, पोस्टमार्टम और अन्य खर्चे से मुंह चुरा रहे थे, मैंने अपना फर्ज निभाया था।
तुम्हारे घर कई बार गया था, पर बाहर से वापस आ गया था, मैं सोचता था तुम सामने आओगी तो क्या बोलूंगा, पूरे दस दिन बाद मिले थे कानपुर में, शायद छब्बीस जनवरी थी।
हमारे बलिदान का फैसला हमारा था, तुम्हारे घर की बिगड़ी हालत, तुम्हारे छोटे भाई-बहनों का भविष्य, मेरे त्याग की पराकष्ठा न थी, वो प्रियतमा जिसकी कभी मांग सजाई थी मैंने उसे अन्यत्र विवाह की सहमति दे चुका था।
लग्न मंडप हां तुम्हारा ही तो था बस मेरी जगह किसी ओर ने ले ली थी तुम्हारे विवाह में मात्र दर्शक था यही तो है भाग्य चक्र, तुमने वरमाला पहना दी थी तुम्हारी बहन से स्टेज पर तुम्हें बधाई भेजी थी मैंने।
जयमाला कार्यक्रम के बाद तुम आ गई थी-बोली खाना खा कर जाना हां या न मैं कुछ बोल न सका था।
मेरा दोस्त बोला था राजीव सुना है शादी वाले दिन लोगों के पंख लग जाते हैं और वो आसमान में उड़ते हैं-
मैंने तुम्हारा चेहरा देखा था कुछ पढ़ न सका तुम बोली थी-हां पंख लग जाते हैं, पर मैं उड़ नहीं सकती-
क्यों अस्मिता? मैंने पूछा-
राजीव अधूरे पंख के साथ क्या कोई आज तक उड़ सका है।
–सुधीर मौर्य

Sunday, 6 January 2013

अधूरे पंख - सुधीर मौर्य का कहानी संग्रह

Sudheer Maurya 'Sudheer'





मेरी १३ कहानियो का संग्रह..

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९


Sunday, 30 September 2012

कर्ज..


मैं सुबह-सुबह फ्रेश होकर मनोज के घर पहुंच गया था, मनोज जो मेरे बचपन का मित्र था, मुझे देखते ही खुश हो गया। मेरे गले लगकर वो न जाने कितने मुझे उलाहने देने लगा, फोन क्यों नहीं किया और न जाने क्या-क्या, वो तो शायद गिले-शिकवे करता ही रहता अगर बीच में उसकी मम्मी न आ जाती।
आंटी, यानी मनोज की मम्मी ने मुझे प्यार से बैठाया और मनोज से बोली-तू बोलता ही जा रहा है देखता नहीं इतनी ठण्ड में कैसे बेचारा सुबह-सुबह तुमसे मिलने आ गया है। आंटी मेरे सर पर प्यार से हाथ फिरा कर ये बोल कर चली गई-तुम दोनों दोस्त बैठकर बातों करो तब तक मैं तुम दोनों के लिए चाय और नाश्ता लेकर आती हूं। यद्यपि मैं घर से नाश्ता करके आया था फिर भी उन्हें मना न कर सका बचपन से ऐसा ही था न जाने क्यों मैं उन्हें किसी भी बात के लिए मना नहीं कर पाता था, इसका कारण शायद यह था कि बचपन से ही आंटी का मुझ पर पुत्रवत स्नेह था।
मनोज, अपनी मम्मी के जाते ही फिर मुझसे चिपट कर बैठ गया और बोला- बता रवि कैसा चल रहा है मुम्बई में, जॉब कैसा है, किसी लड़की से दोस्ती हुई या अभी तक ऐसा ही है, उसने फिर ढ़ेर सारे प्रश्न मेरे तरफ उछाल दिये थे। मैं बोला थोड़ा शांत हो जा तू मैं सब बताता हूं तुझको-एक तो मेरा जॉब बिल्कुल ठीक चल रहा है, दूसरी बात जो ज्यादा महत्व की है वो यह है कि एक बेहद खुबसूरत लड़की से मेरी दोस्ती भी हो गई है।
मेरी यह बात सुनकर मनोज को काफी खुशी हुई थी। वह बोला नाम तो बता भाभी का-
मैं बोला-संजोत
हाय कितना प्यारा नाम है वह चहकते हुए बोला कोई फोटो-वोटो लाया है उसका-
मैं मुस्कराते हुए, जेब से पर्स निकाल कर उसमें से संजोत का फोटो निकाल कर मनोज की तरफ बढ़ा दिया और उसने मेरे हाथ से फोटो छीन लिया-कुछ सेकेंड फोटो देखने के उपरांत वह बोला क्यों बे-इतनी सुंदर लड़की ने तेरे साथ दोस्ती कैसे कर ली।
मैंने कहा तू सच बोलता है मनोज वास्तव में संजोत बहुत ही सुंदर है। हम अभी हाथ में फोटो लेकर बात कर ही रहे थे इतने में हाथ में नाश्ते की ट्रे लेकर आंटी आ गई।
मनोज के हाथ में तस्वीर देख कर ट्रे को मेज पर रखते हुए बोली किसकी तस्वीर है, मैंने बहाना बनाने की कोशिश की और बोला कुछ नहीं आंटी बस ऐसे ही पर आंटी ने मनोज से वो तस्वीर ले ली-कुछ देर वो अपलक उसे निहारती रही फिर बहुत प्यार भरी नजरों से मुझे देखकर बोली-बहुत ही प्यारी बच्ची है-तूने घर पर बात की-
मैंने इन्कार में सर हिलाया-तो वो बोली-ठीक है वह खुद मेरे घर जाके मेरी मम्मी से बात करेंगी।
मैंने अबकी बार सहमति मंे सर हिलाया और बदले में वो मुस्कराकर वापस अंदर चली गई।
मैं मनोज की तरफ देखकर बोला फिर क्या प्रोग्राम है आज का-
प्रोग्राम क्या है घूमेंगे, सैर करेंगे, मूवी देखेंगे पर सबसे पहले नाश्ता करेंगे, मनोज की इस बात पर मैं हंसे बिना न रह सका-
खैर हमने नाश्ता किया, नाश्ते में आलू का परोठा था जो मेरे मनपसन्द व्यंजन में से एक है चाय पी और मनोज की मम्मी से आज्ञा लेकर हम बाहर घूमने के लिए निकले।
हम लोग लान पार करके ज्योंहि मेनगेट पर पहुँचे, वैसे ही स्कूटी से पारूल आ गई। पारूल जो मनोज की बहन है, बचपन से वो मुझे भी हर रक्षाबंधन से पहले डाक या कुरियर द्वारा मिल ही जाती थी। मेरी कोई बहन नहीं थी पर पारूल ने कभी इसकी कमी मुझे महसूस नहीं होने दी।
मुझे देखकर वह स्कूटी खड़ी करके दौड़ कर सीधे मेरे पास आ गई कब आये भैय्या, और आते ही कहां जा रहे हो, मुझसे मिले भी नहीं मेरे बारे में पूछा भी नहीं होगा। वह मासूमियत से ढ़ेर सारे प्रश्न पूछे जा रही थी। मैंने प्यार से उसके गाल को थपथपाया और बोला ऐसा हो सकता है क्या, कि मैं तुझसे न मिलू तेरे बारे में न पूछू-मैं तो बस थोड़ा बाहर घूमकर वापस आ रहा था।
वह इठलाते हुए बोली मैं अच्छी तरह जानती हूं आप लोगों का थोड़ा घूमना-सुबह जो निकले तो शाम से पहले आने से रहे। फिर वह मेरा हाथ पकड़ कर बोली अच्छा यह बताओ मेरे लिए क्या लाये हो?
मैं उसके सर को सहलाते हुए प्यार से बोला बहुत कुछ लाया तेरे लिए, शाम को घर पे आके ले जा-फिर मैंने उससे पूछा पढ़ाई कर रही है या ऐसे ही दिन भर घूमती रहती है-
वह बोली आपको क्या लगता है?
मैंने कहा-मैं जानता हूं तेरा अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान होगा-मनोज जो अब तक मूक़ दर्शक बना खडा़ था-बीच में बोला पारूल तू शाम को रवि से जी भर के बातें कर पर अभी हम लोगों को जाने दे।
पारूल मेरी तरफ देखकर बोली ठीक है रवि भैय्या आज आपको छोड़ती हूं, पर कल का दिन मेरे नाम, मैं कल सवेरे सवेरे आपके घर पे आती हूं-मैंने कहा ठीक है जैसा तेरा हुक्म पर अभी क्या मैं जाऊं उसने हां में सर हिलाया और फिर अन्दर की तरफ कोई गीत गुनगुनाती हुई चली गई।
मनोज, गैरेज की तरफ बढ़ा तो मैं उसे रोक कर बोला-मैं गाड़ी लाया हूं बाहर खड़ी है उसी में चलते हैं।
खैर पूरे दिन मैं और मनोज घूमते रहे, पुराने दोस्तों से मिले, लंच किया मूवी देखी-
बातों ही बातों में मैंने अपने पुश्तेनी घर जाने की बात की मनोज भी तैयार हो गया-मेरा पुश्तेनी घर लखनऊ से कोई अस्सी किलोमीटर दूर हरदोई रोड़ पर था, मैं बचपन से ही मम्मी, पापा व भाई-बहन के साथ लखनऊ में ही रहा था, कभी-कबार ही मैं अपने दादा के पास गांव जाता था हमारी पुश्तेनी हवेली अभी भी मौजूद थी, हमारे सबसे छोटे चाचा अपने परिवार के साथ उसमें रहते थे।
अगले दिन मम्मी से इजाजत लेकर हम दोनों दोस्त अपने गांव के लिए निकले, मारूती जेन गाड़ी को उमपद ड्राइव कर रहा था और मनोज मेरे बगल वाली सीट पर बैठा हुआ था। मौसम खुशनुमा था, हल्का संगीत स्टीरियो पर चल रहा था मैं और मनोज गुजरे दिनों की बाते में मशगूल थे।
सफर कब कटा मालूम ही नहीं चला, हम अपने गांव के करीब पहुंच चुके थे, मैंने कार को मेन रोड से उतारकर गांव जाने वाली रोड पर डाल दिया था यह रोड, हाईवे जैसी अच्छी नहीं थी पर कोलतार की बनी हुई थी, पहले यहां पर खडन्जा लगा हुआ था, हाईवे से मेरे घर की दूरी करीब दस मील थी।
हाईवे से गांव को जोड़ने वाली सड़क बेहद खराब थी, कई जगह तो वो पूरी तरह गहरे में तब्दील हो चुकी थी, इसलिए मैंने जेन की रफ्तार काफी कम कर दी थी, मैं और मनोज विभिन्न मुद्दों पर बात करते रहे थे।
मैं अब गाड़ी ड्राइव करने के साथ-साथ खिड़की से बाहर दृश्यों का भी आनन्द लेने लगा था, हालांकि मैंने खिड़की पर शीशे चढ़ा रखे थे, ऐसा मैंने इसलिए किया था ताकि मैं बाहर की ठण्ड से बच सकूं। मनोज ने भी ऐसा ही किया था, वैसे भी दिसम्बर के अन्त में भारत के इस भाग में ठण्ड कुछ ज्यादा ही पड़ती है।
अभी गाड़ी इस खस्ताहाल सड़क पर कुछ देर ही चली थी कि थोड़ी दूर पर एक मैदान में कुछ लड़के क्रिकेट खेलते हुए दिखाई दिये।
ये खेल कितना लोकप्रिय हो गया है मैंने मनोज से बोला, मनोज बदले में सिर्फ मुस्करा दिया-
मैं फिर उससे बोला क्या बोलते हो-कुछ देर लुत्फ लेते हैं इसका
वो फिर मुस्कराकर बोेला-ऐसी छोटी-छोटी इच्छाओं का दमन तो कभी भी नहीं करना चाहिए-उसकी सहमति पाते ही मैंने मैदान के नजदीक गाड़ी के बोनेट के सहारे खड़े हो गये-मैंने अपना पसंदीदा ब्रांड गोल्ड फ्लक;सिंाद्ध की सिगरेट सुलगा कर होठों से लगा ली थी, हां मनोज को ऐसा कोई ऐब न था पर मैं सिगरेट के साथ-साथ कभी-कभी बियर भी पी लिया करता था।
हम दोनांे बच्चों को खेलते हुए देखने लगे अभी हमें दस-बारह मिनट ही हुए होंगे कि मैं एक तरफ चल दिया-पीछे से मनोज ने पुकारा कहां चले रवि-बदले में मैंने एक अंगुली उठा कर उसे संकेत से बताया कि मैं लघुशंका के लिए जा रहा हूं।
मैं अभी एक पेड़ के नीचे खड़े होकर पेंट का जिप खोल रहा था कि मेरी नजर जमीन पर रखे कुछ सिक्कों पर पड़ी-पांच-पांच के सिक्के एक के ऊपर एक रखे हुए मैंने बिना लघुशंका किये बैठ गया उन सिक्कों के करीब-उन सिक्कों के नीचे की मिट्टी काफी निकल गई थी ऐसा शायद बारिश की वजह से हुआ था। शायद तीन चार मौसम की बारिश, मैंने आहिस्ता से सिक्के उठाये पांच-पांच के छः सिक्के यानी तीस रूपये। मैंने जेब से रूमाल निकाल कर सिक्के साफ करने चालू किए-और इसी के साथ मेरे दिमाग पर जमी हुई मिट्टी भी साफ होने लगी-मेरे दिमाग में अंघड़ चलने लगा, गुजरी तस्वीरे एक-एक करके आंखों से गुजरने लगी।
हां वो मई की तपती दोपहर थी, गर्म हवाऐं अपने पूरे शबाब पर थी, लूक के थेपेड़े चेहरे को झुलसा रहे थे, मैं चाचा के मना करने के बावजूद भी इस भरी दोपहर मैं जीप से लखनऊ के लिए चल पड़ा था घर से निकल कर मैंने पानी के लिए तड़प कर जीप एक पेड़ के नीचे रोक दी छाव में उसको खड़ा करके पेड़ की जड़ पर बैठ गया। पसीना, आंधी-तूफान शरीर से बाहर उछल रहा था। जेब से रूमाल निकाल कर मैं उसको पसीने से गीला करने लगा, प्यास की वजह से मुंह सूख रहा था मैं अपनी बेवकूफी पर पछता रहा था, कि इतनी धूप में क्यों बाहर निकला और अगर निकला भी तो एक पानी की बोतल भी साथ में नहीं ली। पानी की तलाश में मैंने इधर-उधर देखना चालू किया पर मुझे दूर-दूर तक इन्सान तो क्या कोई परिन्दा भी नजर नहीं आ रहा था।
मेरी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी, तभी मुझे दूर से एक बैलगाड़ी आती हुई दिखाई पड़ी, मुझे कुछ उम्मीद हुई थी शायद मेरी प्यास बूझने का सबब उस बैल गाड़ी में मौजूद हो, मैंने ध्यान से देखा वो बैलगाड़ी मेरी तरफ ही आ रही थी, मैंने पेड़ के तने से पीठ लगाकर आंखे बन्द कर ली और बैल गाड़ी के आने का इन्तजार करने लगा।
बैलगाड़ी बहुत धीमी रफ्तार से मेरे करीब आ रही थी पर मैं क्या करता तभी ख्याल आया कि जीप को स्टार्ट करके बैलगाड़ी तक पहुंच जाऊं पर मेरे से उठने को नहीं हुई दूसरे जीप के इंजन के गर्मी भी नाकाबिले बर्दाश्त थी। खैर मैं बैठकर बैलगाड़ी के आने का इन्तजार करने लगा।
पेड़ की छाँव ने मेरे शरीर को थोड़ी राहत बख्शी थी, मैंने अपनी आंखें वापस बन्द कर ली थी। थकान की वजह से थोड़ी सी सुस्ती भी सवार हो रही थी। जब कानों में बैलों के घुंघरू बजने की आवाज पड़ी तो मैंने आंखे खोेली पर तभी मुझे किसी के कराहने की आवाज सुनाई बैलगाड़ी से ही आ रही थी, कराहने की आवाज यकीनन जनाना थी।
मैं खड़ा हो गया, अब तक बैलगाड़ी काफी नजदीक आ चुकी थी, उसे कोई चौदह-पन्द्रह साल का लड़का हांक रहा था और बैलगाड़ी में एक लड़की लेटी हुई थी, कराहने की आवाज उसी लड़की की थी, बैलगाड़ी भी उसी पेड़ के नीचे आ खड़ी हो गई थी जिसकी छांव में मैंने पनाह ले रखी थी।
मैं उठकर बैलगाड़ी के पास जा पाता उससे पहले ही बैलगाड़ी हांकने वाला लड़का गाड़ी से उतरकर भाग कर मेरे पास आ गया-मैं उठकर खड़ा हो गया था-लड़का मेरे पैरों से लिपट गया था-वो लगभग चीखते हुए बोला-हमारी आपा को बचाया;इंबींलमद्ध ले।
मैं लड़के के अपने पांव पर गिरने से परेशान हो गया था। उसे उठाकर खड़ा किया और मैं बैलगाड़ी की तरफ लपका करीब पहुंचकर देखा तो बैलगाड़ी में एक जूट की बोरिया बिछी हुई थी और उस पर बेहद खुबसूरत सोलह-सतरह साल की लड़की लेटी हुई थी। लड़के के घबराने के अन्दाज से मुझे लगा था कि लड़की बहुत गम्भीर रोग से ग्रसित होगी पर अब मैं संयत हो गया था क्योंकि लड़की की कराहने की वजह और कुछ नहीं प्रेग्नेन्सी की पीड़ी;चमकंद्ध थी।
लड़की की नजर मुझ पर पड़ी तो उसके चेहरे पर थोड़ी सी हया आ गई, दर्द को जब्त करते हुए उसने अपने पेट पर टुप्पट्टे को सही किया था।
तपता सूरज सीधे उसके ऊपर था और बेदर्दी से उसके हसीन चेहरे;बीमीतंद्ध कुम्हला रहा था-उसके होंठ सूख रहे थे वो दर्द जब्त करने की कोशिश में अपने निचले होठांे को बार-बार दांतों के बीच दबा रही थी। मैंने लड़के की तरफ देखा उसे पास बुलाया और पूछा यह कौन है तुम्हारी दीदी?
वह बोला-हां-
कहां लेके जा रहे हो-
कासिम पुर अस्पताल-
वो तो अभी काफी दूर हैं-
बाबूजी आप अपनी जीप से पहुंचाये देव-उस लड़के ने फिर हाथ जोड़े-
मैं बोला-पहले अपनी दीदी को पानी पिलाओ-
वह भाग कर गया और बैलगाड़ी के पीछे, नीचे की तरफ बंधी हुई बाल्टी खोल लाया-मैंने बाल्टी को देखा तो लड़के के अहमक पानी पे गुस्सा आ गया-रास्ते के गढ्ढे और बैलगाड़ी की चाली मेहरबानी थी कि बाल्टी में मुश्किल से 200 ग्राम पानी बचा था-खैर मुझे लड़के पर भरोसा नहीं था इसलिए मैंने बाल्टी खुद ले ली और लड़के से बोला जरा अपनी दीदी को उठाओ और इस तरह मैंने उस लड़की को पानी पिलाया। मुझे अफसोस था कि बाल्टी में मेरी प्यास बुझाने को पानी नहीं बचा था-पर पता नहीं क्यों अब मुझे वैसी प्यास नहीं सता रही थी जैसी कुछ देर पहले सता रही थी-खैर मैंने लड़के की तरफ देखा-मैंने देखा कि उसकी आंखे याचना कर रही हैं-मैंने पूछा तुम्हारा नाम?
वसीम-छोटा सा जवाब।
मैंने अन्दर ही अन्दर फैसला किया और बैलगाड़ी से लड़की को अपनी बाजुओं में उठा लिया और अपनी कमांडर जीप के बीच वाली सीट पर लिटा दिया-लड़के से बोला-तुम्हारी आपा को मैं अस्पताल पहुंचाये देता हूं-तू क्या करेगा-
वह बोला-घर लौट जइये-
कहां है घर-
गुलहरिया गांव-
खैर मुझे लगा कि व्यर्थ की देर करना बेकार है
इसलिए मैंने एक नजर लड़की पर डाली और ड्राइविंग सीट पर बैठकर स्टार्ट कर दी और उसे रोड़ पर लाकर रफ्तार दे दी-लड़की अभी भी कराह रही थी-उसकी प्रेग्नैन्सी का ख्याल आते ही मैंने गाड़ी की रफ्तार थोड़ी कम कर दी क्योंकि हाईवे की तुलना में रोड़ ज्यादा अच्छा नहीं था। मैं बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता जाता था लड़की ने सीट में लगी हुई बेल्ट को पकड़ लिया था, मैं उसको सात्वना देने के उद्देश्य से बोला बस थोड़ी ही दूर है अस्पताल-मेरी बात पर वो इतनी पीड़ा के बावजूद मुस्करा दी-मैंने हल्की सी रफ्तार ओर बढ़ा दी थी।
कोई पन्द्रह मिनट पर मैं अस्पताल के सामने पहुँच गया था गाड़ी को अहाते में लगा कर मैं उतरा और लड़की से बिना कुछ बोले मैं भागते हुए अस्पताल के अंदर चला गया-अंदर जाकर मुझे बेहद अफसोस हुआ पूरे अस्पताल में एक वार्डब्वाय के अलावा और कोई न था-वह वार्डब्वाय मुझे डॉक्टर और नर्स के अबसेन्ट होने की तफसील समझाने लगा तो मैं उस पर भड़क कर अस्पताल से बाहर आ गया-
लड़की को देखकर बोला-नाम क्या है तुम्हारा-
वह बोली-परवीन-तुम्हें यह दर्द थोड़ा और जब्त करना होगा-क्योंकि यह अस्पताल, डॉक्टर और मरीज दोनों से खाली है।-
वो बोली-फिर
मैं बोला-फिर क्या-लखनऊ चलते है-
उसने सहमति में सर हिलाया था-और मैंने जीप को अस्पताल से निकाल कर लखनऊ जाने वाले हाईवे पर डाल दिया-मेरी जीप इस समय चिकने हाइवे पर हवा से बातें कर रही थी और मुझे परवीन न जाने क्यों अपने भाई की तुलना में बड़ी जहीन लग रही थी।
खैर अगले एक घंटे में ही मैं लखनऊ के चौक इलाके में पहुंच गया था जहां पर मेरे दोस्त आदित्य के बड़े भाई का नर्सिंग होम था जहां पर आदित्य के भाई व भाभी दोनों ही बैठते थे और भाभी तो जच्चा-बच्चा विशेषज्ञ थी, उनका मुझ पर भी काफी स्नेह था।
मैं परवीन को एक बार फिर अपनी बांहो में उठाकर नर्सिंग होम के अन्दर आ गया, मुझे सामने ही नम्रता भाभी दिखायी पड़ गयी, मैं परवीन को स्टेचर पर लिटा कर लपक कर उनके पास पहुँच गया-
वह हैरत से कभी मुझे और कभी परवीन को देख रही थी।
वह मेरी खिंचाई चालू करती-उससे पहले ही मैंने उन्हें पूरी तफसील समझा दी-
बदले में भाभी ने बड़े प्यार से मेरे सर पर हाथ फिराया था-
मैंने परवीन को उनके हवाले कर दिया था-और कोई आंधे घंटे में उसने खूबसूरत और स्वस्थ लड़के को जन्म दिया था-
मैं उसे खिड़की से देखकर घर की तरफ जाने के लिए चल पड़ा-हां मैंने भाभी से यह जरूर बोला था कि उसके डिस्चार्ज के समय मुझे इन्फार्म कर दे साथ ही यह भी रिक्वेस्ट की वह उससे कोई पैसा न ले।
अगले दिन शाम को भाभी का फोन आया कि कल सुबह परवीन घर जा सकती है और अगले दिन सुबह मैं नर्सिग होम पहुँच गया था-भाभी ने उससे कोई पैसा नहीं मांगा था बल्कि उसे इस बारे में यह बोल कर मुतमईन कर दिया था कि ऐसे काम के लिए उन्हें एक संस्था से बाकायदा हर महीना पैसा मिलता है। मैंने जब भाभी को पैसे देने चाहे तो उन्होंने मुझे बहुत प्यार से डांट दिया था और मैं चुप रह गया था।
परवीन इस समय जीप में मेरे बगल में बैठी थी और मैं उसे धीरे-धीरे ड्राइव कर रहा था-उसको मैंने ध्यान से देखा यकीनन वह बहुत खुबसूरत थी उतना ही खुबसूरत था उसके गोद में बच्चा।
रेस्टोरेन्ट में मैंने उसे नाश्ता कराया जिसके लिए वह बहुत मुश्किल से तैयार हुई थी। वहीं पर मुझको उसकी तफसील उसी की जबानी मालूम हुई।
वह बहुत गरीब परिवार से थी-उसका शौहर अहमद रोजगार के सिलसिले में दिल्ली में था-उसकी मां और सास दोनों ही बेहद बूढ़ी थी और चलने-फिरने से लाचार थी। ले-दे कर एक भाई घर पर था। वह जब भी मुझे देखती बहुत ही कृतज्ञ नजरों से देखती। वह दसवीं तक पढ़ी थी और उसमें हर चीज का काफी सलीका था।
मेरे बहुत इसरार पर भी उसने बहुत कम खाया था। हां उस दिन जल्दबाजी में उसके पैसे वसीम के पास ही रह गये थे। इसलिए उसने बहुत लज्जा के साथ केवल बीस रूपये मांगे थे, लखनऊ से उसके घर तक जाने का बस का किराया।
मैंने उसे कैंसरबाग बस अड्डे पर उसके गांव की तरफ जाने वाले बस में बैठा कर उसे टिकट ले कर दिया था जो बीस रूपये का था। मैंने उसे राह खर्च के कुछ रूपये देने चाहे तो उसने सख्ती से मना कर दिया था फिर न जाने क्यों शायद अपने बच्चे के बारे में सोचकर उसने केवल दस रूपये मुझसे लिए थे।
मैं उसके बच्चे का माथा सहला कर बस से उतरने लगा रवि एक मिनट रूको-
मैंने पलट कर उसको देखा तो वह बोली तुम्हारे इस एहसान को क्या नाम दूं-
मैं बोला-कुछ एहसान कुछ रिश्ते किसी नाम के मोहताज नहीं होते परवीन-न जाने क्यों मेरे जवाब से उसकी आंखे मुतमुईन हो गई थी। वो फिर बोली पर मैं यह तुम्हारे तीस रूपये वापस कर दूंगी-यह रूपये कर्ज हैं मुझ पर।
मैं मजाक के अंदाज में बोला-लेकिन कहां?
वह बोली वहीं उस पेड़ के नीचे जहां आप फरिश्तों के तरह आप मेरे लिए आए थे-
मैं मुस्करा कर बस से उतर पड़ा और बस चल दी मैं धूल उड़ाती जा रही बस को देखता रहा हां वह भी खिड़की से सर बाहर निकाल कर मुझी को देख रही थी।
और फिर बस मेरी आंखों से ओझल हो गई।
किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखे तो मैं चौक कर पलटा वह मनोज था। उसने पूछा क्या हुआ? हां मैंने उसे उन सिक्कों के बात कुछ नहीं बताया था। वह सिक्के मेरे लिए अनमोल थे मैं उन सिक्कों के बारे में कोई भी मजाक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। मैंने उसे टाल दिया था।
मैं गांव जाकर अगले दिन ही वापस लखनऊ लौट आया और मां की गोद में सर रख कर उनको पूरी बात बताई उन्होंने उस दिन बहुत प्यार से मेरे सर को सहलाया था।
वह सिक्के अब तलक मेरे पास हैं, मैं जब उन्हें देखता हूं तो परवीन मुझे याद आती है। हां उसने अपना कर्ज उतार दिया था। मेरे दिल से दुआ निकली है वह जहां भी हो अपने बच्चे और शौहर के साथ खुश रहे।

From 'Adhure Pankh'
By- Sudheer Maurya Books

Wednesday, 12 September 2012

पीड़ा...

वो बिस्तर पर बार-बार करवटें लेती है, सोने का प्रयत्न करती है किन्तु असफल होती है। उसकी आंखों में नींद नहीं है, नींद की जगह तो उसके चेहरे ने ले ली है, खुली आंखों से वो उसके ख्वाब देख रही है, आंखे बन्द करती है तो लगता है बिस्तर पे वो अकेली नहीं साथ में वो भी लेटा है, उसके बदन को सहलाते हुए और वो उसकी बाहों में पिघलती जा रही है। वो झट से आंखे खोल देती है, इधर-उधर नीम अंधेरे में नजर गड़ाती है, वो दिखाई नहीं देता है।

उसी का सहपाठी है, विदेश एम.ए. हिन्दी साहित्य, दोनों के सेम सबजेक्ट, सेम सेक्शन। पूरी यूनिवर्सटी में उसकी शायरी और कविता के चर्चे हैं, तमाम लड़कियां उस पर मरती है।
पर वो उस पर मरता है। हां वो दोनों दोस्त है, पर वो उससे दोस्ती से कुछ ज्यादा मांगता है।
आज उसकी किताब में, एक पर्ची मिली थी, कुछ पक्तियां लिखी थी शायद कविता थी-
सीमा जी-
सेक्सी तू सेक्सी
सरापा तू सेक्सी.....

पढ़कर रोम-रोम सिहर जाता है सीमा का, जरूर विरेश ने रखा होगा उसके बाद सीमा का मन यूनिवर्सटी में नहीं लगता है।
बेचैन होकर वो उठती है किताब खोलकर वो पेज निकालती है, वापस पढ़ती है-
सेक्सी तू सेक्सी
सरापा तू सेक्सी

उसकी आंखे अपने आप बंद हों जाती है, अजब सी गुदगुदी वो महसूस करती है।
विरेश को बचपन से जानती है सीमा, बचपन न सही टीनऐज से तो जानती है। नाइन्थ से दोनों साथ पढ़ रहे है, विरेश को बचपन से शौक है कविताएँ लिखने का पढ़ने का।
उस पर आरोप है, वो बल्गर कविताएँ लिखता है। सीमा के पिता भी कवि है, प्रतिष्ठित कवि और वो विरेश को कवि नहीं मानते।
सीमा वापस किताब खोलती है बेड पर आकर अधलेटी स्थिति में वो कविता की आगे की लाइने पढ़ती है।

तेरी आंखे है कजरारी
तेरी बाते प्यारी-प्यारी
लगती आग का है गोला
तू जब बांधती है साड़ी

सीमा की वापस आंखे बन्द हो जाती है। वो याद करती है, यूनिवर्सटी के पिछले साल का वार्षिक समारोह उसने बी0ए0 फाइनल में टॉप किया था और विरेश किसी तरह से पास हुआ था। उस दिन सीमा ने साड़ी बांधी थी फिरोजी रंग और उसी रंग का स्लीवलेस ब्लाउज। उसने मैंचिग के सैंडल पाव में और हांथो में बैंगल पहने थे।

उस दिन विरेश उसे बार-बार देख रहा था, करीब आ रहा था और बगल से निकलने के बहाने उसके शरीर से अपने शरीर को टच कर रहा था।
उस दिन विरेश भी कविता पाठ करता है-

स्नेह तुम्ही से मेरी प्रिया
तुम मन को मेरे देखो तुम

फंक्शन के दौरान जब सीमा चाय पी रही थी तो उसे अकेला देखकर विरेश उसके पास आ गया था, और उसे ये बोलते हुए कि वो साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही हो, बेहिचक अपने प्यार का इजहार कर दिया था।
-कुछ देर सीमा चुप रह गई थी, तो विरेश ने उसके गाल पर आई एक जुल्फ की लट संवार दी थी।
-सीमा फिर भी चुप रही थी, तभी वहां उसकी कुछ सहेलियां आ गई थी वो विरेश इधर-उधर की बातें करने लगा था।
सीमा को विरेश की ये डेयरिंग थोड़ी-थोड़ी अच्छी लगी थी, पर वो थोड़ा सा डर भी गई थी।
सीमा, विरेश के हाथ का स्पर्श अपने गाल पर याद करके सिहर जाती है, वो एक तकियो को सीने से लगा कर और एक तकिये को अपनी मांसल जांघो के बीच रख कर सोने की कोशिश करती है।
उसे महसूस होता है मानो, उसके सीने से विरेश चिपका हुआ और उसने अपनी टांगो को उसकी जांघो के बीच फंसा रखी है।
ये महसूस करते ही उसके होंठांे पर मादक हंसी तैर जाती है, और मुस्कराते हुये दोहराती है-

सेक्सी तू सेक्सी
सरापा तू सेक्सी

आज सीमा को यूनिवर्सटी जाने की देर हो गई है, सुबह देर से आंख खुली थी। रात देर से जोे सोई थी वो। आदमकद आईने के आगे खड़े होकर बाल बनाते हैं वो, हल्के घुंघराले काले बाल कांधे तक बिखरे हुए।
बाल बनाते हुए वो गुन गुनाती है-

सेक्सी तू सेक्सी
सरापा तू सेक्सी

-मां उसे आवाज देती है-सीमा आ बेटे नाश्ता तैयार है।
-सीमा शायद सुन नहीं पाती है या सुन कर अनसुना कर देती है। वैसे ही वो कविता की लाइने गुनगुनाती रहती है। कोई पीछे से आकर उसके कांधे हिला देता है, वो चौक कर पलटती है। सामने मां है, पूछती है-क्योंरी सीमा आजकल तेरा ध्यान किधर रहता है, वे पलट कर वापस आईना देखते हुए बोलती है, कुछ नहीं मां तू चल मैं आती हूं।

आज उसे विरेश कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है, वैसे तो वो उसे यूनिवर्सटी आते ही दिखाई दे जाता है मानो वो उसका ही इन्तजार करता रहता है, वो यूनिवर्सटी के हॉस्टल में रहता है सो कभी लेट नहीं होता।
वो चारों तरफ निगाहों से ढूंढती हुई क्लास तक आती है। उसकी नजर ग्रीन बोर्ड पर जाती है। जहां सफेद चाक से लिखा था।
-दिल ने किया हमनवा एक बिरहमने बुत को-
पढ़कर कर सीमा थोड़ा लजाती है, क्लास में ओर भी स्टूडेन्टस बैठे हैं। सीमा अपने होंठों में अपना दंउ लेती है-सीमा मिश्रा, वो दो तीन बार दोहराती है-सीमा मिश्रा। हां वो भी तो ब्राह्मण है तो क्या विरेश ने उसके लिए लिखा है। हां सीमा पहचानती है विरेश की राइटिंग को, क्या सुन्दर लिखता है वो।
विरेश, क्लासरूम में आता है। हाफ बांह का कुर्ता और पायजामा पहना है उसने, हां आज दिखने में कवि लगता है। वो क्लास में पीछे बैठता है और सीमा आगे।
अपनी सीट की तरफ जाने से पहले वो सीमा के पास रूकता है। उसकी किताब पर हाथ रखते हुए बोला, कविता पढ़ी थी सीमा।
सीमा के हृदय में गुदगदी होती है पर वो चुप रहती है। विरेश गुनगुनाता है-
सेक्सी तू सेक्सी
सरापा तू सेक्सी

-विरेश जाकर अपनी सीट पर बैठ जाता है तो सीमा की धड़कन थोड़ी नियन्त्रित होती है। वो विरेश की डेयरिंग पर अक्सर डर जाती है।
आज यूनिवर्सटी में थोड़ा हंगामा हो जाता है। ग्रीन बोर्ड पर लिखी कविता की लाइन-
दिल ने किया हमनवा एक बिरहमन बुत को-
सारी यूनिवर्सटी में चर्चा कि विषय है। चर्चा इस बात की नहीं कि कविता में शास्त्रीयता है या नहीं, चर्चा इस बात की है, ब्राह्मण की लड़की को कोई नीची जात वाला हमनवा कैसे कर सकता है। हां विरेश, नीची जाति का है।
विरेश-विरेश गौतम।
सीमा को पता चलता है, तमाम अगड़ी जात के प्रोफसरांे के ये कृत्म भाया नहीं हैै और वो लामबन्द हो रहे है। सीमा थोड़ी चिन्तित होती है।
विरेश के लिए, उसकी चिन्ता विरेश के लिए क्यों है वो नहीं समझ पाती है।
क्या लगता है आखिर विरेश उसका।
उधर, शेडयूल कास्ट के लोग भी लामबन्द हो रहे है। विरेश के फेवर में, वो विरेश को न डरने की सलाह देते है। विरेश, उन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता है। उसे लगता है उसे ये फील होता है वो सीमा को प्यार करने लगा है।
उसने तो सीमा को प्रपोज भी किया है, पर उसने अब तक उसे कोई जवाब नहीं दिया है। विरेश थोड़ा निराश होता है। ये सोचकर उसे थोड़ी तसल्ली होती है सीमा ने उसे मना भी तो नहीं किया था।

आज घर में सीमा को कुछ आंखे चुभती हुई लगती है। उनमें दो आंखे उसके पिता की है, जो यूनिवर्सटी मंे हिन्दी के प्रोफेसर हैं, दबंग, लब्ध प्रतिष्ठित कवि। उनकी दबंगई उनकी कविताओं मंे आसानी से देखी जा सकती है।
और दो आंखे उसके भाई की हैं
जो एक प्रकाशक है, वो भी दबंग। आज तक उसके प्रकाशन से किसी निम्न जाति के लेखक की कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है।
पिता, सीमा को देखकर कड़क कर अपनी पत्नी को बोलते हैं, जरा समझा दो छोकरी को, अपने पांव संभाले, वरना वो अपने पांव पर चल न सकेगी।
सीमा देखती है उसकी भाई अपनी बांहे चढ़ाता है, जिसका अर्थ वो ये लगाती है, मतलब वो पिता की कही बात का सर्मथन कर रहा है।

सीमा चुप रहती है और अपने कमरे में आ जाती है। निढ़ाल बिस्तर पर ढ़ेर हो जाती है। कुछ पलांे बाद उसे महसूस होता है उसके गाल गीले हो रहे है, हथेली ले जाकर देखती है तो कुछ बंूदे वहां आंखों के कोने से निकल कर वहां ढलक रही थी।

वो अश्रु थे, पर क्यों किसके लिए।

सीमा खुद अचम्भित है, अपनी आंखो के इस कृत्य पद;चंतद्ध। क्यों आखिर क्यों आंखो से उसकी आंसू निकल पड़े है। क्या विरेश के लिए। क्या ये सोचकर कि उसका अहित होने वाला है उसकी आंखे रो पड़ी हैं।
वो विरेश से प्रेम करने लगी है क्या, हां उस दिन वो बोल रहा था ऐ सेक्सी एक बार आई लव यू बोल दे। सीमा के मन में विरेश की बात से बहुत गुदगुदी होती है। उसके गुलाबी अधरों पर मुस्कान तैरना चाहती है पर वो रोक लेती है। उसे शांत देखकर विरेश उसके हाथ पकड़ लेता था। उसकी इस डेयंरिग पे सीमा हड़बड़ा जाती है। नजरे नीची करके बोलती है विरेश जी हाथ छोड़ दीजिए, मैं आपकी एक अच्छी मित्र हूं।
-फिर बोल दो न आई लव यू-विरेश उसके हाथ पर अपने हाथ की सख्ती बढ़ाते हुए बोलता है। सीमा को तनिक दर्द होता है, पर उसे ये दर्द बड़ा भला लगता है।
तभी सीमा की सहेली मीता वहां आ जाती है, तो विरेश उसका हाथ छोड़ देता है। मीता थोड़ी चंचलता से विरेश से कहती है, क्या यार विरेश ऐसी ही गोल्डन नाईट को सीमा का हाथ छोड़ देंगे क्या।
मीता की बात पर विरेश हंस देता है और सीमा उसको तो लाज से कान की लौ लाल हो जाती है।
सीमा सोचती है नहीं वो प्रेम नहीं करती है विरेश से और अगर करती भी है तो वो उससे कभी बोल नहीं सकती वो जानती है उसे समाज के बनाये अंधे तिलिस्म में ही जीना है।

आज यूनिवर्सटी में बड़ा बवाल हुआ है, और शाम होते-होते वो अपने कमरे में और विरेश हॉस्पिटल में होता है।
आज सुबह एम.ए. फर्स्ट ईयर हिन्दी साहित्य के क्लास के ग्रीन बोर्ड पर लिखा होता है-
‘‘दिल ने किया हमनवा एक बिरहमने बुत को तो कौम के फरजन्दो की नजरें बदल गई’’
पढ़ कर सीमा लरज जाती है। मीता बताती है उसे कल शाम कुछ लोगों ने, विरेश को डराया-धमकाया है और तुमसे बात न करने की सख्त हिदायत दी है।
विरेश क्लास रूम में आता है, सीमा के पास रूक कर बोेलता है, हैलो सेक्सी आई लव यू-
आई लव यू बोलने के समय विरेश की आवाज थोड़ा तेज हो जाती है और वो शब्द सारे क्लास में गूंज जाते हैं।
पूरा दिन सीमा, विरेश से बचने का प्रयास करती है। वो जानती है विरेश की डेयरिग को, वो जरूर उसे छेड़ेगा। ये बात अलग है विरेश का छेड़ना उसे अब बहुत भला लगता है।

सीमा देखती है आज पूरी यूनिवर्सटी में तनाव है। लोग जगह-जगह, झुन्ड बना कर बातें कर रहे है। वो इस तनाव के कारण का अंदाजा लगाती है, जरूर उसके और विरेश के बारे में बाते हो रही होंगी।
सीमा थोड़ा सहम जाती है वो आज घर जल्दी आ जाती है, उसके पिता और भाई दोनों पे समय घर पर नहीं है।
मां की दी चाय तिपाई पर पड़े-पड़े शरबत हो जाती है। सीमा इस वक्त अपने होश-ओ-हवाश में नहीं है। मीता के फोन ने उसे तोड़ कर रख दिया है। आज शाम यूनिवर्सटी के बाहर कुछ लोगों ने अचानक विरेश पर हमला कर दिया है, उसे काफी चोटे आई हैं, और उसे पास के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

उसका मन विरेश को देखने का करता है, ऐसा कर नहीं पाती है। कहीं न कहीं उसके मन में अपने पिता और भाई का डर बैठा है। वो जानती है ये कृत्य किसका है।

खाने की मेज पर आज रात उसके पिता और भाई ठहाके लगाते है, ये ठहाके सीमा के हृदय में नश्तर की तरह चुभते है, वो मां से तबियत खराब होने की बात करके खाने की मेज से उठ जाती है।
उसके कानों में पिता की आवाज सुनाई पड़ती है, अब अगर वो सीमा से मिला तो दुनिया से उठ जायेगा। सीमा झुरझुरी लेती है।
रात भर बिस्तर पर वो करवटंे लेकर बिताती है, विरेश के बारे में सोचती है। उसके दर्द के बारे में अदांजा लगाती है।
आज उसे यूनिवर्सटी अधूरी लगती है। विरेश नजर नहीं आता है, कैसे आयेगा वो तो अस्पताल में है। क्लास का ग्रीन बोर्ड आज सूना पड़ा है।
लंच टाईम में मीता उससे बोलती है, चल विरेश को देखने चलते है। सीमा मनाकर देती है। दो कारण है विरेश के पास न जाने के एक तो वो सोचती है नजर कैसे मिलायेगी विरेश से और दूसरा पिता और भाई का डर सताता है उसे।

मीता हॉस्पिटल जाती है, तो सीमा घर वापस आ जाती है। वो मीता के फोन का इन्तजार करती है, जानना चाहती है विरेश के बारे में। बार-बार मोबाईल उठा कर चेक करती है उस पर उसमंे कोई फोन कॉल नहीं है।
सारी रात सीमा आंखो में काटती है, आज सीने से तकिया लगा कर, जांघो के बीच तकिया रखकर भी नींद नहीं आती है। मीता उसे फोन नहीं करती है। सीमा सारी रात आंखो में काटती है। वो इन्तजार करती है रात ढ़लने का, सवेरा होने का। उसे जल्दी है यूनिवर्सटी जाने की, विरेश के बारे में जानने की। वो एक-दो बार मीता को फोन करती है, पर उधर से कोई जवाब नहीं मिलता है।

आज यूनिवर्सटी में रोज जैसी चहल-पहल नहीं है, कल की घटना का असर साफ दिखाई पड़ता है। आज यूनिवर्सटी में बहुत सी आंखे उसे चुभती हुई महसूस होती है। मानो कह रहीं है वही अपराधी है विरेश के इस हाल के लिए। वो मीता को खोजती है पर वो नजर नहीं आती है। सीमा का मन क्लास में नहीं लगता है।

वो लाइर्बेरी में आ जाती है, उसे किताब सबमिट करनी है। पुस्तक जमा करने से पहले वो उसे चेक करती है तो उसमें से एक कागज का पुर्जा उसे मिलता है। उसकी लिखावट को पहचानती हैं वो विरेश ने ही लिखा है।
सीमा वहीं लाइब्रेरी में बैठकर वो लिखावट पढ़ती है, वो एक छोटी सी कविता है। जिसका अर्थ ये है, नायिका, नायक को इसलिए तिरस्कृत करती है क्योंकि वो निम्न जाती का है। कविता पढ़कर सीमा की आंखे डबडबा जाती है।
शाम ढ़लते-ढ़लते और सीमा के यूनिवर्सटी से निकलने के समय पर उसे एक और खबर मिलती है।
यूनिवर्सटी के मैनेजमेन्ट काउंसिल ने निर्णय लिया है विरेश को यूनिवर्सटी से निकालने का। वजह में कहा गया कि विरेश, यूनिवर्सटी का माहौल बिगाड़ रहा है। वो पढ़ाई से ज्यादा समय लड़कियों को फ्लर्ट करने में लगाता है। इन बातों का ताकीद उसके अंकपत्र भी करते हैं। सीमा के लिए ये खबर नहीं वज्रपात है। उसको अपना दिल बैठता हुआ महसूस होता है और टांगे लरजती हुई।
उसके घर का माहौल आज शाम खुशनुमा है। पिता और भाई किसी बात पे ठहाका लगा रहे हैं। ये ठहाके सीमा के कान में पिघले शीशे की तरह उतरते हैं। वो डिनर में मुश्किल से एक चपाती खाती है, वो भी उसके हलक से नहीं उतरती है। किसी तरह से वो उसे पानी के साथ हलक से नीचे उतारती है। फिर वो पिता और भाई की नजर बचा कर अपने कमरे में आ जाती है।
आज रात भी नींद सीमा की दुश्मन बनी हुई है। सीमा सोचती है जिंदादिली की ये सजा मिली है विरेश को। जरूर इस सजा की वजह खुद सीमा है। वो विरेश के सारे खतो को ढूढंती है जो विरेश ने कोई न कोई बहाने से सीमा की किताब में रखे थे। सीमा बारी-बारी से सारे खत पढ़ती है और आखिरी खत पढ़ते-पढ़ते उसे लगता है, वो विरेश को प्यार करती है, उसी को चाहती है। वो होंठों में बोलती है-विरेश आई लव यू। यही सेनेटेन्स को कई बार दोहराती है और लजाती है और एक निर्णय लेती है।

दो महीने बीत चुके है, विरेश स्वस्थ हो गया है, पर टूट गया है, एक भाड़े के कमरे में रहता है। वो बच्चो को ट्यूशन पढ़ाने लगा है। सीमा, उसका एड्रेस मीता से हासिल कर लेती है और एक शाम विरेश के कमरे तक पहुँच जाती है। विरेश उसे अपने कमरे पर देखकर सरप्राइज हो जाता है और सीमा उसके गले में बाहें डाल कर आई लव यू बोलकर उसे और सरप्राईज कर देती है।

तमाम गिले शिकवे के बाद जब उस सुहानी शाम सीमा प्रथम अमिसार की पीड़ा झेल रही थी, उस समय उसे लग रहा था, वो अपने पिता और भाई से विरेश की पीड़ा का बदला ले रही है।

Thursday, 23 August 2012

प्रतीक्षा



मैंने हाथ रख के देखा तो सुभाष का माथा हल्का सा गर्म लग रहा था, में चाय बना कर लाया तो बहुत कहने पर उसने आधा कप चाय पी. फिर लेट गया. उसकी आँखे खुली हुई थी.
रात के ९ बज रहे थे-
अमूमन सुभाष इस समय सो जाया करता है, पर पता नहीं वो क्यों सोने की कोशिश नहीं कर रहा था.
सुभाष मेरे चाचा का लड़का है. जिसे मेरे चाचा ने क्लास ६ में अड्मिसन के लिए मेरे पास कानपूर भेज दिया था, जहाँ में बी.एस.सी. की पदाई कर रहा था. सितम्बर का महिना ख़त्म हो रहा था, मतलब स्कुल चालू हो के अमूमन २,३ महीने हो रहे थे.
वो बिस्तर पर लेटते ही सो जाता है.पर आज सो नहीं रहा है. रात के ११ बज रहे है. में पदाई ख़त्म करके सोने के इरादे से उठा.
देखा तो आँखे खुली हैं,
पूछा-नींद नहीं आ रही.
इनकार में सर हिलाया-
शरीर में दर्द है-
वापस वही प्रतिक्रिया-
मस्तक और बदन छु कर देखा, नार्मल थे.
आयु  उसकी होगी ९ या १० साल.
में भी लेट गया, सोच सुबह डाक्टर को दिखा दूंगा.
३ बज रहा होगा प्यास की वजह से मेरी आँख खुल गई, पानी पिटे ही नज़र गई-  देखा तो आँख खुली थी. पानी दिया-
२ घूंट पी लिए-
वापस लेट गया. नींद ने धर दबोचा. नंबर १ के लिए रोज़ ही ५ बजे उठता था. टायलेट से वापस आया तो उसे जागते पाया.
पूछने के जवाब में, वो चुप रहा.

स्कुल जाने के लिए तयार हो गया था, मैंने अपने को टोस्ट और चाय और उसे टोस्ट के साथ दूध दिया.
वो टाई ठीक करवाने के लिए मेरे पास आया, पूछा-स्कुल जावगे ठीक हो न- उसने हाँ में सर हिलाया.
दूध का घूंट लेते हुए बोला- भय्या घर से चावल आये थे मैंने धोके से १ मुट्ठी खा लिए.
मैंने पूछा धोके से क्या मतलब-मुझे लगा भुने होंगे.
तो की हुआ मैंने बोला-
नहीं उस दिन गावं में मम्मी संगीता दीदी से बोल रही न-
क्या बोल रही थी-
यही की कच्चे चावल खाव्गी तो लड़की होगी-
मैंने झटके से सर उठाकर उसका चेहरा देखा था.

सुधीर मौर्या 'सुधीर'