Showing posts with label फरेब. Show all posts
Showing posts with label फरेब. Show all posts

Thursday, 12 February 2015

प्रेम, ख़ुशी और स्वार्थ - सुधीर मौर्य



मैं ठुकरा सकता था 

तुम्हारा प्रेम 
ठीक वैसे ही 
जैसे कभी अर्जुन ने 
ठुकराया था 
उर्वशी का प्रेम


ओ लड़की। 

पर तूने प्रेम कहाँ किया था 
तूने तो बनाया था 
मुझे 
आलम्बन अपने स्वार्थ का

कहो कैसे ठुकराता मै तुझे ?

जबकि तू प्रेम नहीं 
 चाहती थी ख़ुशी अपनी। 



           --सुधीर मौर्य


Thursday, 4 December 2014

अक्षर अक्षर याद - सुधीर मौर्य

उसने कहा था
एक दिन
कैसे रखोगे तुम याद मुझको
मेरे गैर होने के बाद

मै लिखता हूँ
अपनी नज़्मों में
उसका ही नाम
खामोश लफ्ज़ो में
और मेरी नज़्में
सबूत है इसका
मैं याद करता हूँ उसे
अक्षर अक्षर।
--सुधीर मौर्य


Thursday, 13 November 2014

गलती, भगवान और इंसान - सुधीर मौर्य

कर देता है वो,
हँस कर माफ़
उसकी सौ के बाद की भी गलतियां

आखिर वो
सादा दिल इंसान है
कोई भगवान नहीं।
--सुधीर मौर्य

Sunday, 26 October 2014

डॉली : गुड़िया एक फरेब की - ४

नाबालिग आयु मे
कर बैठी थी वो प्यार
अंतरंग पलो मे
अपने प्रियतम को दे कर
यूरोप और अमेरिका के उदाहरण
ठहराती थी जायज सेक्स सम्बन्ध
एक दिन बोली वो अचानक
तय हो गई है उसकी शादी
उसकी जाति के
एक धनवान लडके से

अपने प्रेमी के मनुहार पे
उसका हाथ झटक कर बोली
कैसे टाले वो घर वालो का कहना
आखिर वो है
एक भारतीय लडकी.
...
सुधीर मौर्य

Sunday, 19 October 2014

डॉली: गुड़िया एक फरेब की - 3

अपनी बाहों के सहारे
झूल कर मेरे गले से
एक दिन कहा था उसने
वे करती टूट कर
प्यार मुझसे

और देखो
लहुलुहान हूं मै
उसके टूटे हुए प्यार की
किरचों से आज.
...
सुधीर

Friday, 17 October 2014

डाली: गुड़िआ एक फरेब की - 2

हर किरदार तय है
तेरी कहानी मे
तेरे लिये
खडे है कतार मे
तेरे सारे प्रेमी
हर किसी के पास 
तेरी कहानी का
कोई न कोई हिस्सा है
इस कतार मे खडा है
सबसे पीछे
तेरा वो प्रेमी 
जिसे लूटा था 
तुमने कभी अंधेरी रात मे
अपना कौमार्य बेच के.
--सुधीर

Tuesday, 14 October 2014

डाली: गुड़िआ एक फरेब की...

न तूं पूरी न मै पूरा

आधी रात का प्यार अधूरा
मॉग कहीं सिन्दूर कहीं
सजती सुहागसेज कहीं
कभी दोस्ती वैर कभी
पति कहीं कौमार्य कही
मन मे कपट आंख मे आंसू
कितने घायल कितने बिस्मिल
तूफान कही कहीं पे साहिल
तूझे मुबारक झूठ तुम्हारा
बस इतना था साथ हमारा.
--सुधीर

Sunday, 25 May 2014

अधूरे फ़साने की मुक़म्मल नज़्म - सुधीर मौर्य


एक  अफ़साना 
जो मुक़म्मल न हो सका। 
ओ रात की चांदनी 
तुम कहती हो मै नज़्म लिखुँ उस पर। 
ओ सुबह की धुप 
क्या नाचना चाहती हो तुम 
 उस अधूरे फ़साने की 
मुक़म्मल नज़्म पर।   

--सुधीर मौर्य 

Tuesday, 20 May 2014

माई लास्ट अफेयर - Sudheer Maurya

उपन्यास की नायिका में मुझे फरनाज का अक्स दिखाई देता और मैं उपन्यास में लिखे वर्णन के आधार पर फरनाज को अपनी प्रेमिका मान अपने ख्वाबों में रात बिस्तर पर उसकी बजती चूड़ियों की आवाज सुता रहता। मैंने ख्वाबों में ख्यालों में अब तक हर रात उसके सय्याल गुलाबी होठों को चूमा था। उसके बदन की उभारों और घाटियों की सैर की थी।
 
ये इन उपन्यासों का और टीवी पर देखी गई फिल्मों का ही असर रहा होगा जो उस दिन मैंने उस मन्दिर के आगे बेबाक उसके हाथ को पकड़कर उसे `आई लव यू' बोल दिया।
मेरी बात सुनकर उसने अपनी बोझल पलकें झुका लीं और हया से बोली कुणाल मैं भी तुमसे मुहब्बत करती हूँ। उसका हाथ अब तक मेरे हाथ में था।
उसके इन शब्दों ने मुझे दुनिया भर की खुशी दे डाली। उस दिन हम तमाम दिन साथ रहे प्यार की बातों के साथ। सुम्बुल भी साथ भी पर वो शायद हमारे इकरारे मुहब्बत को समझ गई थी इसलिये उसके कदम हमारे कदमों से तमाम दिन थोड़ा पीछे ही रहे।
फिर शाम हम अलग हुए, समर विकेशन के बाद मिलने के वादे के साथ हाँ अगर आज की तरह कहीं अचानक मुलाकाते रोज होती रहे।
``ये मेरे पहले अफेयर की शुरुआत थी।''

Saturday, 16 November 2013

बस इतना सा फर्क था तेरी मेरी मुहब्बत में - सुधीर मौर्य

अभी तक महफूज़ हैं रखे
फाइलों में वो मेरी सब
मेरे हर एक ख़त का 
दिया हुआ जवाब तेरा...

महकती डायरी मेरी 
अब तलक अलमारी में रखी
जिसके पन्नों में रखा था
दिया हुआ गुलाब तेरा...

मेरे आँखों के आगे ही
तेरे सुर्ख पहिरन थे
अभी तक याद है मुझको
दूर जाना शिताब तेरा...

सबब ठुकराने का मुझको
तलाशा हर जगह मैंने
खुश्की में, दरिया में,
बातिल में, हकीक़त  में.

महावर की जगह तुने
सुनहरी पायलें मांगी
कहाँ हासिल तुझे होता
ये सब मेरी मुहब्बत में.

मैंने अपना तुझे माना
तुने सपना मुझे समझा
बस इतना सा फर्क था
तेरी मेरी मुहब्बत में....
From My Poem Collection 'ho na ho' 
सुधीर मौर्य 'सुधीर'
 गंज जलालाबाद, उन्नाव (U.P.)
209869

096699787634