Sunday, 6 January 2013

हिन्दू सामग्री देवल देवी...



Sudheer Maurya 'Sudheer'
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सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारीचाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल देवी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरिवारंगलद्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्मसंस्कृतिकला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्मसंस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को  भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को  पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और  अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्तिखुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यतमुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछापापीनरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दरदृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलतएक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसनरख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाहकी उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही थाको मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुनदक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तोंराजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास  किया। वस्तुतखुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयासतलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलतमैं हिन्दू का पुत्र हूंमेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त हैइसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्तानाकहलाने वाली देवल देवी जो मूलतएक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती हैअब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहाक्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गयापरन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुतइस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं मेंजो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थेस्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागाजो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 मेंविजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ। 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९

Friday, 4 January 2013

ओ ! लखनऊ की अलहड़ लड़की...



सुधीर मौर्य 'सुधीर'
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पहली बारिश
उड़-उड़ कें बौछारें 
सुखी ज़मीन को
सरशार करती..
स्कूल से आती
बिन छाते के - वो
लपक-लपक के
दुकानों के टीन के शेड में
अपने बदन को
इन अल्हड बौछारों से बचाती
कुछ भीगी-कुछ बाकि
अरे ओ !
लखनऊ की अल्हड लड़की
ये बारिश तो 
जीवन का रंग है
भीग-इसमें खुल के भीग
तभी तो 
रंग चडेगा तुझपे
पहली प्रीत का
जिसके ख्वाब 
बुनती है तूं
अपनी छत पे
खड़े होकर
मेरी छत कीओर
देख कर...

Sudheer Maurya 'Sudheer'
Ganj Jalalabad, Unnao
209869

Thursday, 3 January 2013

पाकिस्तान में हिंदू को नहीं करने दिया गया पिता का अंतिम संस्कार


पाकिस्तान में हिंदू को नहीं करने दिया गया पिता का अंतिम संस्कार
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के लोगों के साथ हो रहे अत्याचार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों यहां एक हिंदू को अपने मृतक पिता का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया।
भारत के तीर्थस्थलों की यात्रा पर आए पाकिस्तान के 100 से अधिक हिंदुओं ने वहां अपनी दुर्दशा बयान की है। इस वक्त ये लोग राजस्थान में हैं और अब पाकिस्तान वापस नहीं लौटना चाहते। बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट का हवाला देते हुए यहां के अखबारों ने यह खबर प्रकाशित की है। इसके मुताबिक 171 हिंदू गत रविवार को थार एक्सप्रेस से जोधपुर की यात्रा पर पहुंचे। भले ही हिंदू वहां धार्मिक स्थलों की यात्रा पर गए हैं, लेकिन उनके नेता का कहना है कि वे वापस नहीं लौटेंगे।
हिंदुओं के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था सेमनाथ लोक संगठन ने भारत सरकार ने इन तीर्थयात्रियों को शरणार्थियों का दर्जा दिए जाने की मांग की है। संगठन के कार्यकर्ताओं ने हिंदुओं का जोधपुर रेलवे स्टेशन पर स्वागत किया। इस संगठन के प्रवक्ता ने बताया कि 32 महिलाओं और बच्चों सहित 171 हिंदू सिंध के हैदराबाद और सांघड़ से हैं। ये सभी भील जनजाति से ताल्लुक रखते हैं।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की दयनीय स्थिति के बारे में एक तीर्थयात्री ने बताया कि हाल ही में उनके पिता की मौत के बाद स्थानीय मुस्लिम लोगों ने उन्हें अंतिम क्रियाकर्म की रस्में नहीं करने दी। उन्होंने बताया, 'इस्लामी चरमपंथ के बढ़ते प्रभाव के कारण हम सिंध में काफी असुरक्षित महसूस करते हैं। हम अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि यह दो देशों के बीच का मामला है।'

सुधीर मौर्य 'सुधीर'