Thursday, 21 May 2015

अधूरे फ़साने की मुक़म्मल नज़्म --सुधीर मौर्य


एक  अफ़साना
जो मुक़म्मल न हो सका।
ओ रात की चांदनी
तुम कहती हो 
मै नज़्म लिखुँ उस पर।
ओ सुबह की धूप 
क्या नाचना चाहती हो तुम
उस अधूरे फ़साने की
मुक़म्मल नज़्म पर।  


--सुधीर मौर्य

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23-05-2015) को "एक चिराग मुहब्बत का" {चर्चा - 1984} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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  2. सुन्दर प्रस्तुति

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