Thursday, 7 May 2015

जलन और मुहब्बत - सुधीर मौर्य

देख लेता था मैं,
तुम्हारे चेहरे पे
जलन के निशान 
क्लास में मेरे
प्रथम आने के एनअउंस पे
देखते थे मुझे तुम,
तिरछी निगाहो से
जब हमारी टीम
जीत लेती थी
क्रिकेट का कोई मैच
मेरी बॉलिंग या बैटिंग के बूते

इरशाद !
तुम्हारी ये जलन
मुझे कभी जला नहीं पाई
क्योंकि मेरे सर पे
अब्र की मानिंद
बिखेरती`थी
अपनी  ज़ुल्फ़ें  - नाज़

तुम्हारी जलन को
तुम्हारी बड़ी बहन की
मुहब्बत ने  अपने दुपट्टे से
बेअसर कर दिया

मज़हब की आड़ में
तुम्हारी जलन जीत गई होगी
 पर नाज़ ने
मुझे हारने नहीं दिया
जुदाई की रात किया हुआ
वादा उसने पूरा किया
मेरी बीवी न सही
मेरे बेटे की
माँ तो है वो।

--सुधीर मौर्य  

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-05-2015) को "चहकी कोयल बाग में" {चर्चा अंक - 1970} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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    1. बहुत आभार सर जी।

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  2. दिल को छू हर एक पंक्ति....

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