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Saturday, 15 February 2014

'देवलदेवी: एक संघर्षगाथा

दोस्तों मेरा ऐतहासिक उपन्यास 'देवलदेवी: एक संघर्षगाथा' दिल्ली पुस्तक मेला में साहित्य संचय प्रकाशन के हाल न . 18 स्टैंड - S 1/15पर उपलब्ध है। आप उपन्यास के लिए इन न . 9871418244 / 9136175560 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

Saturday, 19 October 2013

देवल देवी: एक संघर्षगाथा (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारी, चाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल रानी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्म, संस्कृति, कला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्म, संस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को न भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को न पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और न अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्ति- खुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यत: मुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछा, पापी, नरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दर, दृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलत: एक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसन" रख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाह" की उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही था) को मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुन: दक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तों, राजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास न किया। वस्तुत: खुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयास, तलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया।
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी - दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 ई. की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलत: मैं हिन्दू का पुत्र हूं, मेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त है, इसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्ताना" कहलाने वाली देवल देवी जो मूलत: एक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती है, अब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, क्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया, परन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुत: इस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं में, जो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थे, स्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागा, जो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 ई. में) विजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ।

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
 प्रकाशक - साहित्य संचय     B-1050, Gali No. 14/15, Pahla Pusta,
Soniya Vihar, New Delhi- 110 094
Contact No: 9871418244, 9136175560
email: sahityasanchay@gmail.com

Tuesday, 15 October 2013

उपन्यास 'देवल देवी' लिखने की प्रेरणा 'रिंकल' के संघर्ष से मिली - सुधीर मौर्य

पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में २४ फ़रवरी २०१२ को एक ह्रदयविदारक घटना घटी। इकिसिवीं शताब्दी में जब सारा विश्व सभ्य होने का दंभ भर रहा था उस समय सिंध के मीरपुर मेथेलो से एक अल्पवयस्क और उक्त देश की अल्पसंख्यक लड़की का जबरन अपहरण करके उसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। उस लड़की को जबरन बलत्कृत करके उस देश के बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्ति से निकाह के लिए बाध्य किया गया। उस लड़की का नाम रिंकल है। वो लड़की और उसके अभिवावक छोटी अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायलय तक की गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज़ को जबरन दबा दिया गया। वो लड़की रिंकल कुमारी आज भी अपने अपहरणकरताओ की कैद में है और दासी सा जीवन जीने को बाध्य है। ऐसा भी नहीं कि उसकी रिहाई के लिए आवाज़ बुलंद नहीं हुई। बहुत से लोगो ने उसकी रिहाई के लिए संघर्ष किया। अमेरिका से सुनील दिक्षित, पकिस्तान की वेंगस और मारवी,भारत से राकेश लखानी और खुद मैने अपने लेखों और और अन्य गतविधियों से रिंकल कुमारी के जबरन अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर संघर्ष किया पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात रहा। पिछले कुछ दिनों में अकेले पाकिस्तान में ही जबरन धर्म परिवर्तन के कई केस सामने आये हैं। फिर सारे विश्व में ऐसे कितनी घटनाएं होती होंगी जो प्रकाश में नाइ आ पाती। ऐसी घटनाओ से हमारा देश भारत भी अछुता नहीं है। जब आधुनिक सभ्य्काल में योनि शोषण के लिए लड़कियों का अपहरण किया जा रहा है और हम शोसल नेटवर्किंग साईट से लेस होकर भी रोक नहीं पा रहें हैं तो सोचिये मध्यकाल में कितनी लड़कियों को जबरन सेक्स स्लेव बनया गया होगा। युद्ध में जीती गई संभ्रांत परिवार की लड़कियों के साथ और कठोर व्यवहार किया गया। देवलदेवी भी इसका शिकार हुई पर भाग्य से उसने अपना प्रतिशोध ले लिया। पर उन हजारो - हजार का क्या जो योनि दासी बनकर सारी उमर रोती - सिसकती रही।
रिंकल कुमारी के आपह्रण और न्याय के लिए दिखाए गए उनके अदम्य साहस ने मुझे उपन्यास 'देवल देवी, लिखने की प्रेरणा दी। मेरी ये कृति समर्पित है बहादुर लड़की 'रिंकल कुमारी' को। --सुधीर मौर्य

Friday, 25 January 2013

समाज और स्त्रियों का जबरन अपहरण..


Sudheer Maurya 'Sudheer'
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संसार का निर्माण होते ही शायद स्त्रियों को पुरषों का गुलाम समझा जाने लगा।एक ही स्थान से, एक ही प्रक्रिया से पैदा होने के बावजूद उन्हें कभी भी पुरषों के समकक्ष स्थान  प्राप्त न हो सका।    

भारतीय संस्क्रीत में स्त्रियों को माँ , बहन और बेटी के रूप में पूजनीय माना गया है। पर  पत्नी के रूप उसे कभी भी पुरषों ने अपने बराबर नही स्वीकारा। पुरषों में बहुपत्नी रखने का चलन रहा और उनकी कई पत्निया के साथ - साथ कई - कई रखेले भी होती थी। सामन्ती पुरष पराई स्त्रियों का हरण करके उनका बलात्कार करते और फिर उन्हें अपने रनिवास योनि सुख की प्राप्ति के लिए रख लेते। भारत में मुस्लिम आकर्मण के साथ ही स्त्रियों और लडकियों के अपहरण और उन्हें रखेल बनाने के आंकड़े में बहुत तेजी से इजाफा हुआ।

स्त्र्यियो को पुब्लिक प्लेस पर भी काफी समय पहले से अपमानित किया जाता रहा है। द्रौपदी इसका ज्वलंत उदहारण है। ये बात अलग है वो अपने एक मित्र कृष्ण की मदद से बच  गई। वरना पुब्लिक प्लेस पर अपने परिवार के तमाम लोगो की मौजूदगी में ही उसका सामूहिक बलात्कार होना तय था। हा ये बात अलग है की बाद में द्रौपदी के परिवार वालो ने उसके अपमान का बदला कुरुक्षेत्र की ज़मीन को लाल करके लिया।

लगभग द्रौपदी के काल में ही, उससे कुछ वर्ष पहले ही अम्बा नाम की एक राजकुमारी का भी अपहरण करके उसे अपमानित किया गया। उसका बलात्कार तो नहीं हुआ पर जबरन अपहरण की पीड़ा वो सारी उम्र झेलती रही। इस जबरन अपहरण की वजह से उसका पुरुष मित्र उसे छोर कर चला गया।    

इन सब घटनाओं से पहले सीता के अपहरण की घटना तो सबको ज्ञात ही है। उन्हें भी इस जबरन अपहरण का दंश सारी उम्र झेलना पडा और वो कभी भी सुखी जीवन न जी सकी।

जेसा की ऊपर मेने लिखा की भारत में मुस्लिम आकर्मण के साथ ही लडकियों के अपहरण में बड़ी तेजी आई। मुस्लिम लोगो को दुसरे की स्त्रियों और क्वारी लडकियों को अपनी पत्नी या रखेल बनाने में एक विशेष सुख हासिल होता था। अल्लुद्दीन ने गुजरात की रानी कमला देवी और वह की राजकुमारी देवल देवी को जबरन अपने हरम में रखा। और उन्हें योनि दासी के रूप में भोगा। ये बात अलग है की राजकुमारी देवल देवी ने कुछ समय बाद ही अपने इस अपमान का बदला अल्लुद्दीन के सरे परिवार को ख़त्म करके ले लिया। चित्तोड़ की रानी पद्मनी को अलाउद्दीन के हाथो अपहरण होने से बचने के लिए आत्महत्या करनी पड़ी।

 अकबर ने अपने और अपने शहजादों के लिए हिन्दू पत्निया संधि में प्राप्त की पर कभी भी अपने घर की किसी लड़की की शादी उसने किसी हिन्दू राजकुमार से नहीं की। ये बात अलग है की कुछ समय बाद इस मुगुल खानदान की शहजादियो की अस्मत, अफगान आक्र्मंकारियो और अंग्रेजो ने तार - तार कर दी। 

आज हम कहने को सभ्य समाज में जी रहे है पर पिछले साल पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में हुए एक हिन्दू लड़की रिंकल कुमारी के जबरन अपहरण ने हमे हिला के रख  दिया। रिंकल चीख -  चीख के अपने माँ - बाप के सतह जाने की गुहार लगाती रही पर उसकी आवाज़ को जबरन दबा दिया गया। वो आज भी एक योनि दासी का दंस झेल रही है। और न्याय की प्रतीक्षा कर रही है। पर क्या पुरुष प्रधान संसार में ये मुमकिन है। और फिर उस जगह जहाँ शिक्षा के लिए आवाज़  उठाने के लिए मलाला युसुफजई को सरफिरे गोली मार देते है।

लडकियों के जबरन अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन, जबरन विवाह और भोग की वस्तु से बचाने के लिए एक विश्व्यापी सार्थक पहल की जरुरत है। ये पहल कोन  करेगा ? शायद हम लोग। पर जल्दी। कही बहुत देर न हो जाये।

सुधीर 'मौर्य सुधीर'
गंज जलालाबाद उन्नाव 
209869         

   


Sunday, 6 January 2013

हिन्दू सामग्री देवल देवी...



Sudheer Maurya 'Sudheer'
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सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारी, चाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल देवी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्म, संस्कृति, कला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्म, संस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को न भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को न पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और न अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्ति- खुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यत: मुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछा, पापी, नरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दर, दृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलत: एक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसन" रख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाह" की उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही था) को मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुन: दक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तों, राजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास न किया। वस्तुत: खुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयास, तलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया।
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी - दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 ई. की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलत: मैं हिन्दू का पुत्र हूं, मेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त है, इसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्ताना" कहलाने वाली देवल देवी जो मूलत: एक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती है, अब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, क्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया, परन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुत: इस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं में, जो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थे, स्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागा, जो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 ई. में) विजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ। 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९