Showing posts with label सुधीर मौर्य की पुस्तके. Show all posts
Showing posts with label सुधीर मौर्य की पुस्तके. Show all posts

Sunday, 15 December 2019

मणिकपाला महासम्मत (आदिकालीन उपन्यास) - सुधीर मौर्य

किसी महान पुरुष से ही जाति या वंश की परम्परा चलती है। कभी कभी जब जाति की किसी पीढी मे कोई अन्य महान व्यक्ति जन्म ले लेता हे तो फ़िर उस वंश की आगे की पीढ़ियां उसके नाम से जानी जाती है।
शाक्यों का वो महान वंश जिसमे गौतम बुद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक महान और चित्तौड़ नगर का निर्माण करने वाले महराज चित्रांगद मौर्य आदि कई महान ऐतिहासिक महापुरुषों ने जन्म लिया उस महान शाक्य वंश के मूल पुरुष महासम्मत है। महासम्मत का अर्थ है, वो व्यक्ति जिसे सर्वसम्मति से राजा चुना जाए। महासम्मत का व्यक्तित्व सूर्य की भांति देदीप्यमान था इसलिए कई ग्रन्थ शाक्य वंश को सूर्यवंश भी कहते है।
बचपन के दिनों में जब मैं इतिहास के प्रति सजग हो रहा था तो मै महावस्तु अवदान, महावंश और सुमंगल विलासिनी जैसे बौद्ध ग्रंथो के संपर्क में आया। ये सभी ग्रंथ महासम्मत को जम्बूद्वीप का पहला राजा मानते है और उनकी वंशावली प्रस्तुत करते है।
बौद्ध ग्रंथ महावंश के अनुसार महासम्मत के पश्चात क्रमश: रोज, वररोज, कल्याणक (प्रथम और द्वुतीय), उपोषथ, मान्धाता आदि से ओक्काक के राजा बनने तक का वर्णन है। इतिहास साक्षी है कि यही ओक्काक जिन्हे कुछ ग्रंथ भ्रमवश इच्छवाकु कहते है उन्ही के वंश में ग्यारहवे महासम्मत काल में गौतम बुद्ध ने जन्म लिया।
बौद्ध ग्रंथ इन महासम्मत के पराक्रम एवं इनके काल में घटित घटनाओ का वर्णन करते हुए उनके पुत्र एवं पत्नी की चर्चा करते है। रोज महासम्मत के पुत्र थे और विष्णु की भगिनी मणिकपाला इनकी पत्नी।
बौद्ध ग्रंथ अब तक हुए २८ बुद्धो के बारे में बताते है। इनमे गौतम बुद्ध, कस्सप बुद्ध, कोनगमन बुद्ध और ककुसंध बुध ये चार प्रमुख है। ककुसंध बुद्ध का काल आठवे महासम्मत के वंशकाल से संबंधित है। मैने इसी काल, ककुसंध बुद्ध और महासम्मत को केंद्र में रख कर इस आदिकालीन उपन्यास को लिखने का प्रयास किया।
उपन्यास कैसा बन पड़ा, मैं अपने प्रयास में कितना सफल रहा ये तो आप सब सम्मानित लोग ही बतायेगे।
महासम्मत और बुद्ध को शीश नवाते हुए आपका
सुधीर मौर्य, मुंबई

Tuesday, 9 January 2018

आनिहलवाड की राजकुमारी देवलदेवी पर आधारित उपन्यास।

मेरी स्वर्गीय मित्र निधि जैन ने मेरे उपन्यास देवलदेवी पर ये समीक्षा लिखी थी। अब जबकि इस उपन्यास का दूसरा संस्करण आया है तो मुझे निधि की कमी बहुत खल रही है।
देवलदेवी की प्रीबुकिंग अमेज़न पर शुरू है।
फेसबुक और whatsapp पर जुड़ने के बाद से मेरा मोबाइल हाथों से छोड़ना अत्यंत दुष्कर हुआ है। घर के काम करते हुए भी बीच बीच में मोबाइल उठा कर देख ही लेती हूँ। 
ऐसे में किताबें पढ़ना मेरे लिए चुनौती है। कुछ 15 दिन पहले 4 किताबें खरीदीं थीं जिनमे से अब तक बस खलील जिब्रान की ही एक कहानी पढ़ी।
ऑनलाइन बुक्स के जरिये मैंने दिसम्बर में प्रेमा,श्रीकांत दो उपन्यास और कई सारी कहानियाँ पढ़ीं..तभी दो बुक्स खरीदीं थीं गोदान और प्रेमाश्रम..गोदान तो तो दिलचस्प लगी..खत्म होने के बाद भी यही लगता रहा कि अभी और होता तो पढ़ा जाता। पर यहाँ दो महीने से प्रेमाश्रम खत्म करने की सोच रही हूँ पर नही हो पाता। वैसे भी इतनी मोटी मोटी किताबें और उपन्यास देखकर ही हाथ पाँव फूल जाते हैं मेरे 
ऐसे में एक लेखक महोदय मुझे इनबॉक्स में अपने एक उपन्यास की पीडीएफ फ़ाइल देते हैं  और बोलते हैं पढ़कर प्रतिक्रिया दीजियेगा  मन में तो आया कि कुछ बक दूँ.. पर घर आये मेहमान की इज्जत भी करनी चाहिए तो उनको बोल दिया 'जी जरूर'..फिर सोचा देखूं तो क्या है इसमें..पीडीएफ खोली #देवलदेवी दो तीन पेज नीचे आई 'उफ़ ये तो इतिहास से सम्बंधित था..'नो वे,किसी कीमत पर नही पढूंगी' सोच लिया था.. एक फ्रेंड Vivek को भी भेज दिया कि शायद ये पढ़कर प्रतिक्रिया देगा तो वो ही लिख दूंगी  ..
खैर शाम को fb पर कोई ख़ास नोटिफिकेशन नही थे तो सोचा थोडा नावेल देख ही लिया जाए.. आंय..ये क्या.. शुरू हुआ तो खत्म करने तक सांस भी न ली.. छोटा था रुचिकर था.. भाषा सुंदर.. कथानक ऐतिहासिक.. नायिका में ठोस नायिका वाले गुण.. जिसमे स्वधर्मपालन की जिजीविषा बचपन से ही दिखती है। मुझे बहुत पसंद आया यह उपन्यास इसलिए खत्म करने के बाद तुरंत लिख रही हूँ।
लेखक समीर ओह्ह सॉरी Sudheer Maurya को बहुत बहुत बधाई.. पहली बार किसी लेखक को मुझसे एक उपन्यास वो भी एक सिटींग में खत्म करवाने के लिए भी बधाई

Wednesday, 29 November 2017

देवलदेवी (ऐतहासिक उपन्यास) दूसरा संस्करण।

Redgrab books की नई किताब - देवलदेवी
इस उपन्यास की नायिका अन्हिलवाड़ की राजकुमारी देवलदेवी है, पर इसका कथानक खुसरोशाह के बिना पूरा नहीं हो सकता। देवलदेवी और खुसरोशाह भारतीय इतिहास के वो रोशन सितारे हैं जिन्हें हमेशा बादलों या कुहासे के पीछे रहना पड़ा। खुसरोशाह अन्हिलवाड का वो युवा था जिसने अपने पराक्रम से खिल़जी वंश को समूल उखाड़ फेंका और आन्हिलवाड़ विध्वंस का प्रतिशोध लिया।
देवलदेवी, जिसकी देह बार-बार विडम्बना की शिकार हुई, सुअवसर की प्रतीक्षा में यह विषपान करती रही, और उन्हें वो सुअवसर उपलब्ध करवाया महान सम्राट श्री धर्मदेव (नसरुद्दीन खुसरोशाह) ने।
देवलदेवी का शौर्य किसी तरह पद्मनी, दुर्गावती और लक्ष्मीबाई से कम नहीं है; और न ही खुसरोशाह का राणा प्रताप और शिवाजी से, परन्तु इतिहास ने इन महान विभूतियों को भुला दिया।
यह उपन्यास महान खुसरोशाह और देवलदेवी की स्मृतियों को पुन: स्थापित करने का सफल प्रयास है। आशा है कि इतिहास इन महान विभूतियों के साथ न्याय करेगा।
15 दिसंबर से प्री बुकिंग शुरू ....
लेखक:- सुधीर मौर्य  

Wednesday, 30 August 2017

Sweet Sixteen: Hindi Novel By Sudheer Maurya

Sweet Sixteen - Hindi Novel कहानी है एक बेहद गरीब और दलित लड़के कुणाल की जो स्नातक की पढ़ाई के लिए शहर आता है। कुणाल के पिता अपने क्षेत्र के हरिजन कोटे के विधायक के घर पे नौकर है इस वजह से कुणाल को बिधायक बिंदर के शहर में मिले खाली पड़े सरकारी आवास में रहने का अवसर मिल जाता है। इस तरह कुणाल भाग्य या दुर्भाग्य से कथित बड़े और रईस लोगो के बीच में पहुँच जाता है। 

एक दिन कुणाल को अपने कमरे में किसी 'स्वीट सिक्सटीन' नाम की एक अनजान लड़की का खत मिलता है जो उससे प्यार करती है। अब कुणाल उस लड़की की तलाश बिल्डिंग केम्पस की हर लड़की में करता है और इस तरह वो संजना सचान और वाटिका पांडे नाम की नाम की लड़कियों से टकराता है /संजना अपने दोस्तों में संजू और वाटिका बंटी के नाम से मशहूर है। वक़्त की गर्दिश के चलते कुणाल, संजू और बंटी दोनों से शारीरिक सम्बन्ध बना लेता है। पर वास्तव में संजू जिसके पापा आई. ए. एस. है और बंटी जिसके पापा विधायक है वो दोनों मिसेज रंजना नाम की एक औरत के आर्गनाइजेशन में है। ये आर्गनिजशन औरतो को लड़के और मर्दो को लडकिया सप्लाई करने का काम करता है। एक साजिश के तहत बंटी और संजू, कुणाल को एक औरत मिसेज अंजलि की पास भेज देती है। अब संजम असलियत से वाक़िफ़ होता है। वो मिसेज रंजना के खिलाफ आवाज़ उठाता है। जिसे संजू, कविता के माध्यम से बेकार कर देती है।
कविता कुणाल के दूर के रिश्ते की लड़की है जो शहर में रहती है और उसे पढ़ने में मदद लुबना नाम की लड़की करती है। लुबना ही असल में वो लड़की है जो कुणाल को स्वीट सिक्सटीन नाम से खत लिखती है।
धीरे - धीरे कुणाल और लुबना नज़दीक आते है और लुबना कुणाल को संघर्ष के लिए प्रेरित करती है। कुणाल ज्यो ज्यो विद्रोह करता है मिसेज रंजना की और से दबाने की कोशिश भी तेज होती है। अब रंजना के साथ संजू और बंटी के पापा भी मिल जाते है और गाँव में कुणाल के घर में आग लगाके उसकी बहन मधु का सामूहिक बलात्कार करवाते है। कुणाल गाँव से अपनी बहन को लेकर आता है और लुबना की सहयता से अंतिम संघर्ष करता है।
--सुधीर

Tuesday, 25 July 2017

अरीबा (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

  • अरीबा उपन्यास
  • लेखक - सुधीर मौर्य 
  • Publisher: Aman Prakashan, Kanpur (2017)
  • ISBN-10: 9385476963
  • ISBN-13: 978-9385476969
  • हार्ड बाउन्ड:- २५० रुपय 
  • पेपरबैक:- १२५ रुपय  
  •  Aman Prakashan104 A / 80 C, RambaghKanpur - 208012Uttar Pradesh (INDIA)
  • Contact For Office Phone No. :- 0512-2543480Mobile No. :- 09839218516Mobile No. :- 08090453647Fax No. :- 0512-2543480
  • Mail For OfficeMail ID : info@amanprakashan.comMail ID : amanprakashan0512@rediffmail.com

#अरीबा उपन्यास की एक झलक।
#दिविता:- सुंदरता की अद्भुत मिसाल। मज़हबी कट्टरपंथियों के द्वारा बलात्कार होने के बाद भी वो न सिर्फ खुद को संभालती है बल्कि अपने दलित प्रेमी रूद्र को भी सहारा देती है।
#रूद्र;- एक प्रतिभासंपन्न दलित युवक जो एक स्वर्ण लड़की दिविता से प्रेम करता है। संघर्ष की राह पे उसे शंशांक, दिविता और सहर का साथ मिलता है और वो पुलिस आफिसर बनके दंगो को विफल कर देता है।
#सहर:- उपन्यास की नायिका अरीबा की कजिन जो हर कदम अरीबा से बीस है। चाहे वो सुंदरता हो या फिर बुद्धिमानी। अपने घर की जटिल रावयतो के खिलाफ अरीबा के साथ वो भी संघर्ष करती है।
#समर:- सहर का भाई जो बचपन से अरीबा पे वासना की नज़र रखता है। मज़हबी कटटरता के चलते वो आतंकवादियों से देश और अरीबा का सौदा कर बैठता है।
#शंशांक:- उपन्यास का नायक जिसे अरीबा बेपनाह प्रेम करती है। पर वक़्त और रवायतें अरीबा और शंशांक के बीच एक अभेद दीवार खड़ा कर देती है।
#अरीबा:- अरीबा इस अफ़साने की नायिका होकर भी नायिका नहीं बन पाती। वो कदम दर कदम अपनी आज़ादी की ख्वाहिश लिए समझौते करती है और उसका हर समझौता उसे वापस गुलामी की और धकेल देता है।
उपन्यास के अंत में सहर और शंशांक एक अद्भुत रूप में अरीबा के सामने आते है। 


#अमेज़ॉन से प्राप्त करने का लिंक:- 

  • http://www.amazon.in/Areeba-Sudheer-Mourya/dp/9385476963/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1500985190&sr=8-1&keywords=areeba 


Sunday, 30 April 2017

पौराणिक उपन्यास पहला शूद्र पे श्री रामप्रसाद राजभर जी की संछिप्त समीक्षा।

उपन्यास पहला शूद्र के साथ रामप्रसाद राजभर जी 
पहला शूद्र
सप्त-सैंधव की षड्यंत्र गाथा
लेखक सुधीर मौर्या जी की सद्य: प्रकाशित कृति है !इतिहास को जितने युगो या विभागो में बांटा गया है उसमें सबकी अलग-अलग अभिरूची होती है पर इतिहास आकर्षित करता है!सप्त- सैंधव यानि सात नदियों वाला स्थान यानि पंजाब जो उनदिनों बहुत बड़ा था!इतना बड़ा कि जहां दो-दो सभ्यता अपने उत्कर्ष के बाद भूमिगत हो गयीं!
सुधीर जी ने रिगवैदिक काल की कथा को विस्तार दिया है!यहकाल ईसापूर्व तकरीबन बारह सौ साल पहिले का राहुल सांकृत्यायन ने निर्धारित किया है!पूरी पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् सबसे पहिले मन में उन मुनियों के प्रति रोष उत्पन्न होता है जिन्हे मात्र हम मुनि मानकर आदरणीय समझा करते थे !वे वा्तव में महाषड्यंत्रकारी थे!
आज गोमांस को लेकर हो-हल्ला है पर तब लोग गोमांस भक्षी थे और सोमरस अर्थात् भांग का सेवन किया करते थे!
पहला शूद्र सुदास नामक प्रतापी व न्यायी राजा की वह कहानी है जिसे जमाना भूल गया है!सुदास के पिता दिवोदास व राजा दसरथ समकालीन थे!
मूलनिवासी पणियों और किरातों को बलात् जीतकर भूमि के साथ दूधारू पशुओ का अपहरण कर आर्यों की गाथा है जो युद्धकौशल के साथ षड़यंत्र में भी अव्वल थे!
शायद सुदास के साथ ही वैदिककाल समाप्त हुआ होगा क्योंकि उसके पश्चात जाति-व्यवस्था का जिक्र किया है सुधीरजी ने!
कुछ शब्दों के कोष्टक में अर्थ दे दिये जाते और किताब को अध्याय में विभक्त कर दिया जाता तो और उत्तम होता!
पर पुस्तक पठनीय है !रिग्वैदिक काल की कथा आज के समय में यदि पढ़ ली जाय तो समझिये की लेखक ने अच्छा व सार्थक लिखा है!
मैं बस इतना ही कहूंगा"
बहुत-बहुत बधाई बंधु सुधीर मौर्या जी को!
रामप्रसाद

Sunday, 2 April 2017

पौराणिक उपन्यास 'पहला शूद्र' पे भगवंत अनोमल की समीक्षा।

 पौराणिक उपन्यास 'पहला शूद्र' लेखक - सुधीर मौर्य 
बहुत कम लोग होते है जो साहित्यिक राजनीति से कोशो दूर, पुरष्कार लालसा से मीलो दूर और बिना किसी ढोल नगाड़ा के साहित्य सेवा में नौकरी करते हुए इतने मन से समर्पित रहते है। ऐसे ही है अपने Sudheer Maurya जी। नौकरी करते हुए उनकी अब तक दस से अधिक किताबे प्रकाशित हो चुकी है। यह अपने आप में ही बहुत बड़ी बात है। वैसे तो उनकी हर वर्ष कोई न कोई किताब प्रकाशित हो जाती है परंतु इस बार वह बड़े ख़ास अंदाज में आये है। उनकी पुस्तक Pahla Shudra - पहला शूद्र प्रकाशित हुई है। आज के दौर में युवा लेखक अधिकतर प्रेम कहानियां ही लिखने में लगे पड़े है। परंतु यह पुस्तक इस मायने में अलग एवं महत्त्वपूर्ण है कि यह एक ऐतिहासिक उपंन्यास है। ऐतिहासिक उपंन्यास लिखने वाले लेखक हिंदी में इस वक्त कम ही है। संदीप नय्यर जी का ऐतहासिक उपंन्यास मुझे याद आता है 'समरसिद्धा', जो आज से दो वर्ष पूर्व पेंगुइन हिंदी ने छापा था। इस बीच एक दो उपंन्यास और आए हो तो मुझे जानकारी नहीं है।
पौराणिक उपन्यास 'पहला शूद्र' लेखक - सुधीर मौर्य 
वैसे तो इस बात से कतई इंकार नहीं है कि इस पुस्तक की विषय वस्तु बिलकुल अलग है। इसमें इन्द्र, भरद्वाज, वशिष्ठ और अगस्त्य जैसे मुनियो के द्वारा सप्त सैंधव की षड्यंत्र गाथा है। जैसा कि हम सभी को पता है कि सुधीर मौर्य जी के पास शब्दो का असीम भण्डार है, जो बहुत कम युवा लेखको के पास है । उनकी पिछली किताबो में उर्दू शब्दो का काफी प्रयोग होता था परंतु इस बार इस पुस्तक के अनुसार उन्होंने उस वक्त के शब्दो को प्रयोग किया है। जिसे पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम दूरदर्शन पर श्री कृष्णा, रामायण या फिर ओम नमः शिवाय जैसे सीरियल देख रहे हो। जैसे शराब की जगह पर सोम शब्द का उपयोग किया गया है। इस वाक्य में ही आप इस पुस्तक की भाषा का आंकलन कर लेंगे। -

" हाँ देव, ये सोम नहीं, सूरा है। इसके पान से रति विलास का आनंद बढ़ जाता है। और आज की रात तो आप देवी शची ले साथ व्यतीत करने वाले है। " शाश्वती ने नहुष को बंकिम नेत्रो से देखकर कहा।

पुस्तक शुरुआत से अंत की तरफ सीधी बढ़ती जाती है। इसके साथ ही उन्होंने ब्राम्हण वाद का मुनियो द्वारा बनाये गए षणयंत्र का भी उल्लेख किया है-
'ये स्मरण रहे, हमें वही परिपाटी स्थापित करनी है जिसमे हम मुनि सर्वश्रेष्ठ बने रहे। देवो से भी श्रेष्ठ। किसी भी परिस्थिति में हमें अपनी श्रेष्ठता बनाये रखनी है। राजदुहिता आहिल्या का मुनि गौतम से विवाह हमारी इस परंपरा का आरम्भ है। भले ही हम मुनि और राजन्य आर्य हो, किन्तु हम मुनि ब्राह्मण, राजन्य क्षत्रियो से कहीं श्रेष्ठ है और इसलिए उनकी दुहिताओ पर हमारा अधिकार स्वयमेव सिद्ध हो जाता है। अहिल्या का गौतम से विवाह कराकर हमने उसी अधिकार का प्रयोग किया है।
पुस्तक आपको पढ़ने के लिए बांधे रखती है, आगे क्या होगा यह जान्ने के लिए आप पुस्तक बेताबी से पढ़ते रहते है। परंतु इस चक्कर में कहीं कहीं पर ऐसा हुआ है जैसे लग रहा हो सीरियल का रिकैप दिखाया जा रहा हो , लगभग उस रफ़्तार में भाग रही हो। इसका उदाहरण -
वहां से लौटकर इन्द्र अपने एक सेवक तक्ष के पास जाकर बोला, 'तक्ष तुम अपने कुलिश से बंदी विश्वरूप त्रिषिरा का सर काट दो।
" जो आज्ञा पुरून्दर" कहकर तक्ष ने बंदीगृह में जाकर कुलिश के प्रहारों से सोते हुए त्रिषिरा विश्वरूप का सिर काट दिया और फिर आकर उसने अपने इस कृत्य की सूचना इन्द्र को दी, तो प्रसन्न होकर इंद्रा ने पान के लिए उसे सोमरस लाने को कहा।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि यह पुस्तक कहीं से भी उनकी पिछली किताबो से मेल नहीं खाती। अगर आपने अब तक सुधीर जी कोई अन्य पुस्तक पढ़कर राय बना ली है तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि इसे पढ़ते वक्त आपको लगेगा ही नहीं कि अपने इस लेखक की पिछली पुस्तक पढ़ी हुई है। अगर आप ऐतिहासिक उपंन्यास के शौक़ीन है तो एक बार इसे ट्राय कर सकते है।
सुधीर मौर्या जी को इस पुस्तक की अलग विषय वस्तु, इस पुस्तक की भाषा शैली के साथ न्याय करने के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। उम्मीद है, आगे हमें और भी बेहतरीन पुस्तके पढ़ने को मिलेंगी।
इस उपंन्यास को Read PubIication ने प्रकाशित किया है।
नोट :- मैं कोई आलोचक नहीं हूँ, इसे पुस्तक पढ़ने के पश्चात् एक पाठक की त्वरित प्रतिक्रिया समझी जाए।
-- भगवंत अनोमल

Wednesday, 22 February 2017

Pahla Shudra


Pahla Shudra Novel By Sudheer Maurya

Pahla Shudra ... the story of the King Sudas who was a great warrior and the Hero of Aryans. He was the first Aryan who established Aryans' Empire ... but unfortunately he was trapped by his own priest who made him First Shudra.


Amazon Link:-
http://www.amazon.in/Pahla-Shudra-Sudheer-Maurya/dp/8190866443/ref=sr_1_8?s=books&ie=UTF8&qid=1487759842&sr=1-8&keywords=shudra 

Monday, 14 November 2016

पहला शुद्र (ऋग्वैदिक कालीन उपन्यास) - सुधीर मौर्य

इस धरती पर कुछ वीर ऐसे भी हुए जिन्हें इतिहास ने कभी याद रखना नहीं चाहा। और वे गुमनाम ही रहे।


दाशराज युद्ध का महानायक और दिवोदास पुत्र सुदास जिसने अनार्यों से भीषण संघर्ष के बाद सप्तसैंधव को आर्यवर्त का नाम दिया, जमदग्नि पुत्र परुशराम  से कहीं अधिक पराक्रमी और कोशल नरेश  राम से कहीं अधिक यशश्वी था। परन्तु समय का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि वह एक महान योद्धा होकर भी अपने सबसे करीबी और विश्वासपात्रों के षड्यंत्र के आगे टिक न सका। ...और उस षड्यंत्र ने उसे आर्यों के एक महान प्रतापी राजा से बना दिया - पहला शूद्र। 
--सुधीर मौर्य 

Sunday, 13 November 2016

पहला शुद्र (ऋगुवैदिककालीन उपन्यास) - सुधीर मौर्य

इंद्र को दिए जाने वाले हवि को प्रतिबंधित करने वाले वीर का जन्म अभी होना था। कुरुक्षेत्र में योद्धाओं का शक्ति परिक्षण में अभी सदियों का समय था। लंका पे अभी सेतु नहीं बंधा था और मेघवृत्र का वध हुए अभी कुछ ही काल बीता था। 
अनार्यो का पूर्ण न सही आंशिक दमन हो चूका था और इसके साथ ही आर्यो में कृषि, गाय और वनों के लेकर आपसी कलह आरम्भ हो गई थी। इस आपसी कलह को विश्वामित्र और वशिष्ट की पुरोहित बनने की अभिलाषा ने एक युद्ध में बदल दिया। 'दाशराज्ञ युद्ध।' इस युद्ध का महानायक था दिवोदास पुत्र सुदास। जो बाद में वशिष्ठ के कारन पतन को प्राप्त हुआ। 
सुदास, जो आर्यवर्त में राम से अधिक यश का अधिकारी था। 
--सुधीर मौर्य

Thursday, 1 September 2016

ऐंजल ज़िया (कहानी संग्रह) - सुधीर मौर्य


कसबे में एक हरे रंग के बाशिंदे में साथ उसकी उठक - बैठक थी।  कहते है जब दिल में डर हो तो उसकी लकीरे चेहरे पर नुमाया हो जाती है।  उसकी भी हुई।  और उन डर की लकीरों पर उस हरे रंग के बाशिंदे अब्दुल की भी नज़र पड़ी।
उस दिन अब्दुल जब उसके साथ बैठा चाय पी रहा था उसके चेहरे पे उभरी डर की लकीरों पे नज़र चुभाते हुए अब्दुल बोला - 'क्यों बे विजय तेरे चेहरे पे हर वक़्त हवाइयां क्यों उड़ती रहती है। '
अब अब्दुल ने विजय को 'बे' कोई प्यार - मुहब्बत में तो नहीं बोला था।  सच तो ये था कसबे में हरे रंग वाले बहुसंख्यक थे।  सो अल्पसंख्यक गेरुए रंग वालो को  'अबे - तबे' सुनने की आदत हो गई थी।  कभी - कभी इससे भी ज्यादा।   भौंस  .... , मादर  .... , आदि - आदि।
अब विजय का अब्दुल के साथ उठना - बैठने था सो अब्दुल उसे अबे - तबे से ज्यादा नहीं बोलता था।  इतना लिहाज़ तो लाज़िमी था।  हाँ विजय, अब्दुल को अबे - तबे बोले ऐसा कोई हक़ उसे हांसिल नहीं था।  
विजय, अब्दुल के अबे - तबे के सम्बोधन पर न पहले कभी उलझा था न आज उलझा।  बस चाय सुड़कते हुए अपने डर का पर्दा सरकाता रहा।
पूरा पर्दा सरकने के बाद अब्दुल ने अपने दाये हाथ की तर्जनी से अपनी दाढ़ी खुजाई, फिर अचानक हो हो करके हंस पड़ा। वो  हँस रहा  था और विजय उसे यूँ हँसता देख खुद को अहमक समझ रहा था।  अब्दुल को वो अहमक समझे ऐसा हक़ भी उसे हांसिल नहीं था।  वो  गेरुए रंग का जो था। गेरुया रंग कसबे में अल्पसंख्यक जो था।  
अचानक अपनी हँसी रोक कर अब्दुल ने एक चपत विजय के जांघ पर मारी और फिर बोला 'ये क्या मनघडंत बवाल पाल रखा है मिया तुमने अपने दिल में।  ये लव सव जिहाद कुछ नहीं होता है।  अरे तुम्हारी लड़की को प्यार - स्यार हुआ है, उस लड़के से।  और तुम तो जानते हो मियां जब प्यार होता है तो लड़कियों का रंग निखरता है।  सो खुश रहो मियां और वक़्त पे बाँध दो अपनी लड़की को उस अफ़रोज़ के साथ निकाह के फंदे में।'
--कहानी संग्रह 'ऐंजल ज़िया' में संग्रहीत कहानी 'लव ज़िहाद और आईने का सच' का अंश।
--ये कहानी संग्रह अमेज़ॉन पे सिर्फ 125 रूपये में उपलब्ध है।  
http://www.amazon.in/Enjal-Ziya-Sudheer-Maurya/dp/938602716X/ref=sr_1_3?s=books&ie=UTF8&qid=1472739763&sr=1-3

Sunday, 1 May 2016

Pakistan'S Troubled Minorites by Veengas

Great Work By Veengas.


New Book....
Pakistan's Troubled Minorities 
Author - Veengas, karanchi, pakistan
Editor - Sudheer Maurya, Kanpur, India
Price - Rs. 150 
ISBN - 978-93-86027-11-5

Tuesday, 1 March 2016

दंगो की पृष्ठभूमि पर पनपती प्रेम कहानी है 'वर्जित' - अंजलि कुशवाहा

अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित मेरे उपन्यास 'वर्जित' पे अंजलि कुशवाहा की सटीक संक्षिप्त टिप्पणी।  - सुधीर मौर्य 

दोस्तों आज पहली बार किसी उपन्यास की समीक्षा अपनी वॉल पर डाल रही हूँ। आशा है कि मैं उपन्यास व लेखक के साथ न्याय करने में थोड़ा सा सफल रही हूँ।
'वर्जित'
लेखक- श्री सुधीर मौर्य
समीक्षा-
वर्जित, साम्प्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि पर पनपती एक प्रेम कथा। कहानी में लेखक ने मानवीय भावनाओं को बखूबी उजागर किया है। लेखक ने कुणाल ( नायक) के माध्यम से जहाँ एक ओर पुरुष वर्ग की कमजोरियों का एक सफल चित्रण दिया है वहीं दूसरी ओर कहानी की नायिका इरम हर कदम पर एक ठोस निर्णय लेती नजर आती है। कहानी का नायक कुणाल जो कि एक लेखक है, इरम नामक मुस्लिम लड़की को बहुत प्यार करता है परन्तु अवनि जो कि उसके मकान मालिक की बेटी है और कुणाल को बहुत प्यार करती है, से सम्बन्ध बना लेता है। उपन्यास की नायिका इरम एक मुस्लिम लड़की जो सैफी ( कुणाल) को बेहद प्रेम करती है और प्रेम में पूर्णतया समर्पित है ,सैफी की वास्तविकता (एक हिन्दू लड़का) जानकर एक कठोर निर्णय लेकर स्वयं को कुणाल के लिए वर्जित घोषित कर देती है।
कुणाल की निर्णय ले पाने की अक्षमता के कारण ही वह स्वयं को अवनि और इरम के बीच फँसा हुआ पाता है। अवनि भी कुणाल को प्रेम करती है और कुणाल की खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार है। कहानी में तन्जीला का प्रवेश एक नया मोड़ ले आता है। तन्जीला एक जर्नलिस्ट और इरम की कजिन है।वह एक बोल्ड एवं आजाद ख्याल की लड़की है जो अपने विचारों से कुणाल और इरम को प्रभावित करती है। कुणाल और इरम दुनिया की सारी रिवायतैं तोड़ते हुए शादी कर दूर चले जाते हैं लेकिन शहर में हो रहे दंगे उन्हें वापस ले आते हैं और कहानी का अंत दंगों के दुष्परिणाम के साथ होता है ।

--अंजलि कुशवाहा

इस उपन्यास को अमेज़ॉन के इस लिंक से मगाया जा सकता है।

http://www.amazon.in/varjit-sudheer-maurya/dp/938396975X/ref=sr_1_2?s=books&ie=UTF8&qid=1456904188&sr=1-2&keywords=sudheer+maurya

Friday, 1 January 2016

वर्जित (उपन्यास) - सुधीर मौर्य


इश्क़ हो जाना ही काफी नहीं ....
भारत में इश्क़ होता नहीं है करना पड़ता है, धर्म जाति देख कर इश्क़ कीजिये नहीं तो तमाम वर्जनाएं आपको अपनी मंज़िल तक पहुँचने से पहले जकड़ लेंगी

और कहीं एक मुस्लिम लडकी को एक हिन्दू लड़के से इश्क़ हो जाए तो क्या हो वर्जित हो जाती है हर भावना ...

पढ़ें बहुप्रतीक्षित उपन्यास "वर्जित"
आज से आनलाइन बुक स्टोर्स पर उपलब्ध

http://www.redgrab.com/index.php?route=product/product&path=61&product_id=148

http://www.amazon.in/varjit-sudheer-maurya/dp/938396975X/ref=aag_m_pw_dp?ie=UTF8&m=AIXDGKSX35YWF

http://www.flipkart.com/varjit/p/itmedaavck8rnk8h?pid=9789383969753&ref=L%3A2462977352410811404&srno=p_53&query=anjuman+prakashan&otracker=from-search

http://www.shimply.com/books/varjit-9789383969753-p36747937

https://www.bookdhara.com/product/varjit/

http://thekitabwala.com/index.php/product/varjit/

Wednesday, 27 May 2015

अमलतास के फूल ( उपन्यास) - सुधीर मौर्य

.................यक़ीनन सब कुछ मुझे बहुत जल्दी करना था, क्यों की में जनता था की कठमुल्ला वर्ग अपनी हरकत से बाज़ नहीं आयेगा, और यहाँ निहचित रूप से राछसी तांडव करने में कोई कोर कसर बाकि नहीं रखेगा और में यह भी जनता था की इनके असुरी नाच को सिर्फ सतर्कता से ही रोका जा सकता था |
शाम होते ही मैंने माँ से चाय पिने की इच्छा जाहिर की, में चाय पि कर युसूफ के घर जाना चाहता था | माता जी चाय बना कर ले ई और में चाय पिटे हुए भी सिर्फ ६ दिसम्बर के बारे में ही सोच रहा था | चाय पि कर में घर से निकल पड़ा, पैदल टहलते हुए में युसूफ के घर की तरफ जा रहा था, तबी सामने से मैंने देखा की संदीप जीप ड्रिवे करता आ रहा है, वह भी शायद मुस्लिम महोलों की तरफ से आ रहा था, उसके बगल में एक लड़की बैठी थी, लड़की के दुधिया जिस्म पर लाल टी-शर्ट व् कलि जेंस थी , मैंने उस लड़की को यक़ीनन पहचान लिया था वह ऋतू थी उसे देख कर मेरे दिल पर तिव्र्र झटका लगा था | मुझे ऐसा लगा की मेरा ह्रदये बिठा जा रहा हो, दिल इतनी तिव्र्र गति से धडकने लगा था की मुझे लगा की वह सीने को फाड़ कर बहार निकल जायेगा, आँखों में अंशु की बुँदे झिलमिलाने लगी थी | मेरे कदम डगमगाने लगे थे, में लरजते क़दमों से युसूफ के घर की तरफ बड़ा |
तुरंत देखे गए द्रश्य को में झटका देकर जेहन से निकाल देना चाहता था, में जनता था यह सब इतना आसान नहीं है, ऋतू संदीप के साथ यक़ीनन ये अस्चर्या की बात थी |
खेर में जैसे तैसे युसूफ के घर पहुंचा, युसूफ घर पर ही था बड़ी गर्मजोशी के साथ उसने मेरा इस्तेकबाल किया | में उसके साथ बैठक में बैठ गया |
मेरा स्वागत उसकी अम्मी ने गर्म चाय और गोभी के पकोड़े से किया था | मेरे द्वारा पकोड़ों की तारीफ किये जाने पर वोह बोली थी अरे ये तोह राबिया ने बनाये है |
में अभी कुछ बोलना ही चाहता था की बैठक में राबिया ने एंट्री मरी थी | वोह युसूफ की बड़ी बहन थी, कोई दो या तीन साल बड़ी होगी | और इतनी ही वोह मुझसे बड़ी होगी, क्योंकि मेरी और युसूफ की उम्र में एक -दो महीने का अंतर था | कौन बड़ा था कौन छोटा ये पता नहीं |
कब आए सूरज और कैसे हो..? राबिया ने पूछा था | उस से उम्र में छोटा होने के कारन वोह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी | हाँ ये और बात है में उससे सीधी बात करता था | न ही उसका नाम लेता और न ही दीदी, बाज़ी, या आपा आदि सम्भोधन ही लगता था |


---oooooooo---
…………….में काफी देर वहां बैठा रहा फिर में वहां से विदा लेकर चल दिया, तन्वी मुझे बहार तक छोड़ने आई | में जब चलने लगा तोह उसने कहां-
''बहुत खुश होंगे आप ''
मैंने कहा - ''क्यूँ''
''दीदी आने वाली है ना |''
और में उत्तर में सिर्फ मुस्कुरा दिया था |
उसने कहा - ''आपने जवाब नहीं दिया |''
मैंने कहा - ''ये भी कोई पूछने वाली बात है |''
वह बोली - ''क्या मतलब''
''मतलब'' - में उसकी तरफ देखते हुए बोला - ''हद से जयादा ख़ुशी हो रही है, आखिर में ऋतू से पुरे १-२ साल बाद मिलूँगा |
बदले में उसने पलके झुका ली | मैंने कहा तन्वी में जा रहा हु माता जी राह देख रही होंगी | तन्वी अनमने मन से बोली, जा रहे है तोह में रोक कैसे सकती हूँ |
मैंने तन्वी की बात का कोई जवाब नहीं दिया, शयेद मेरे पास उसकी किसी बात का जवाब था भी नहीं, मैंने के नज़र उसके मासूम चेहरे पर डाली और फिर पलट कर चल दिया |
न जाने किस भावना से वशीभूत होकर मैंने पलट कर फिर तन्वी की तरफ देखा और मैंने पाया की वोह तोह पागलों की तहर मुझे देख रही है | पर अचानक मुझ पर द्रद्ता सवार हो गयी थी मैंने झटक कर अपने मन से तन्वी का ख़याल निकला और तिव्र्र क़दमों से अपने घर की तरफ चल दिया |
घर पहुँचते-पहुँचते मुझे शाम हो गयी, रास्ते में एक-दो लोग मिल गए जिनसे बात करने में कुछ समय लग गया था | घर पंहुंच कर कर मैंने भोजन किया और फिर बिस्तर के सुपुर्द कर दिया | पर यक़ीनन यह अभी सोने का वक़्त नहीं था, लखनऊ में तो में देर रात तक जगा करता था |
संजीवन लाल, राशी, संदीप, ऋतू, और तन्वी यह सब मेरे जेहन में बारी-बारी से दुस्तक देने लगे थे, मेरे मन की उलझन बदने लगी पर मेरे लिए ये उलझन अधिक अर्थ नहीं रखती थी क्योंकि में जनता था की इस तरह की उलझन से में कभी भी निपट सकता था | मेरे लिए उलझन का कारन था तो आने वाली तारिख ६ दिसम्बर १९९२ |
एक ताराग कारसेवकों व् रामसेवकों का धर्म के लिए जीवन उत्सर्ग कि पर्वाह न करते हुए सत्य के लिए मंदिर निर्माण की संकल्पना और दूसरी तरफ चरों तरफ कट्टरपंथी मुस्लिम बहुल छेत्र से घिरा मेरा गाँव और जिसमें से आधे से अधिक आबादी कट्टरपंथी मुसलमानों की |


-- ००००००० ----
……………..वापस बात करने का सिलसिला उसी ने सुरु किया था | कुछ बातें मेरी पदाई के बारे में और कुछ उसने मेरे घर के बारे में पूछी थी | बहार से युसूफ और कुछ और आवांजे हल्की-हल्की सुने दे रही थी, राबिया उठ कर उन्हें खिड़की से देख कर ई थी | वापस मेरे सामने बैठते हुए उसने एक आप्रत्याशित swaal पूछा था |
सूरज - वहां लखनऊ में कोई गर्ल फ्रेंड बने या नहीं | मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा था उससे आँख मिलते ही आँख झुका ली थी | मुझे थोड़ी शरारत सूझी थी |
मैंने कहा - राबिया - (यकीन करो जहाँ तक मुझे याद है जीस्त में पहली बार मैंने उसे उसके नाम से पुकारा था) ''क्या तुम्हारा कोई बॉय फ्रेंड है कानपूर में''
उसने इनकार में सर हिलाया था
''तो यहाँ गाँव में'' - मैंने वापस शरारत की थी |
उसने न कोई इशारा किया था और न ही लब से कुछ बोली थी |
में वापस पूछता इससे पहले युसूफ कमरे में आ गया था और में चुप हो गया था |
राबिया भी बात का रुख बदले हुए बोली थी इस साल तुम्हारे बी. टेक के तीन साल पुरे हो रहे है ना |
- हां राबिया में चाय का कप खली करके मेज पर रखते हुए बोला था | मेरे होंठो से 'राबिया' निकलते ही युसूफ ने मेरी तरफ देखा था | शयेद इस से पहले कभी भी उसने मेरे होंठो से अपनी बहन का नाम नहीं सुना था |
मैंने चलने के लिए युसूफ राबिया और उनकी मम्मी से इज़ाज़त मांगी थी | तभी फ़ोन की घंटी बाज़ी थी और युसूफ उसमें व्यस्त हो गया था | मुझे घर के बहार राबिया छोड़ने आई थी | और वोह मेरे साथ साथ चलने लगी थी, मैंने मना नहीं किया था |
चलते-चलते मैंने पूछा था राबिया आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया |
''कौन सी बात..?''
वोह अपने बाल सावरते हुए बोली थी बाल सवारने के टाइम उसकी कोहनी मेरे शरीर से छु गयी थी, उस वक़्त मेरे शरीर की हरारत यक़ीनन बढ गयी थी | हाँ उसने क्या फील किया था में उस दिन ये जान ना सका था |
राबिया, ''क्या तुम्हारा कोई बोर फ्रेंड है |'' अबकी बार मैंने स्पस्ट पूछा था |
शयेद हां, शयेद ना.....
ये कैसा जवाब है राबिया ?
मीन्स, में उसे अपना बॉय फ्रेंड मानती हू पर वोह खुद को मेरा बॉय फ्रेंड मानता है या नहीं में यह नहीं जानती |
में हसंते हुए बोला था, ''मतलब एकतरफा मुहब्बत |''
शायद , वोह थोडा उदास होते हुए बोली थी |
चलते-चलते गली का नुक्कड़ आ गया था और वोह वन्ही कड़ी हो गयी थी | में समझा गया था वो वहां से घर वापस जाना चाहती है |
मैंने हाथ जोड़ कर उसका अभिवादन किया था | हाँ चलते-चलते उसने पूछा था और आपकी गर्ल फ्रेंड..?
''आप जैसी ही हालत है '' में मुस्कुराया था
और वोह भी मुस्कुराते हुए वापस चल दी थी और में उसे ओझल होने तक देखता रहा था |



----0000000----
............पर दो-तीन दिनों में मेरे हालात बढ से बत्तर हो गए थे | ज़िन्दगी ने फरेब देने चालू कर दिए थे | एक तरफ सांप्रदायिक दंगों की आहट से सुलगता मेरा छोटा सा क़स्बा जो क़स्बा कम गाँव अधिक था | और दूसरी तरफ मेरे बचपन की चाहत मेरी ऋतू ने मेरा दिल तोड़ दिया था | उस दिन संदीप के साथ जीप में बैठी हुई लड़की ऋतू ही थी |और उसने मेरे कोमल मन को बड़ी बेदर्दी से कुचलते हुए उसने मुझे बताया था, ''वोह मुझे नहीं बल्कि संदीप से प्यार करती थी |
मैंने जब उसे संदीप के बारे में बताने की कोशिश की थी तो उसने मुझे सख्ती से अपनी औकात में रहने की हिदायत दी थी, साथ ही ताकीद की थी,में उसे भूल जाऊ | हां उस दिन इस घटना या यूँ कहिये दुर्घटना | सच पुचो तो मेरे लिए ये दुर्घटना ही थी, हां तो में बता रहा था उस दुर्घटना वाले दिन ऋतू के साथ उसकी छोटी बहन तन्वी भी थी जो इस हादसे से कुछ चकित नज़र आ रही थी | उस वक़्त वहां संदीप आ गया था और ऋतू उसके बगल की सीट और तन्वी पीछे की सीट पर बैठ कर वहां से रुखसत हो गयी थी | हां जाते वक़्त भी ऋतू ने मुझे पलट कर नहीं देखा था | अलबत्ता तन्वी मुझे जरूर देखती रही थी | ज़िन्दगी के इस फरेब से में हेरान रह गया था | जिसे बचपन से चाहा, जिसे होश सँभालते ही जाना था, जिसने कभी मेरी दोस्ती का दम भरा था, जिसने कभी अपने खतों में अपने नाम के आगे मेरा सरनेम को लगाया था | जिसने कभी हमारे दांपत्य से होने वाले बच्चों के नाम सोचे थे, जिसने कभी मेरे लबों को अपने नमकीन लबो से तर-बतर किया था, जिसने कभी कानपूर के चिड़िया घर में मेरे पैरों को छुआ था, जिसने कभी कानपूर के गुरुदेव पैलेस में 'परदेश' फिल्म के देखने के वक़्त अपने हाथों से मेरे हाथ को अपने कधोर वक्चों पर रख लिया था, जिसने कभी रात के अँधेरे में मेरे सामने शारीरिक समर्पण किया था, जिसने कभी ................., जिसने कभी............., जिसने कभी........................



-----००००००००------
………………आज मैंने दूध में मक्के की रोटी मीस कर खायी थी, फिर पानी पि कर उपर के कमरे में चला गया था, यहाँ मैंने छोटी सी ल्य्ब्रेरी बना राखी थी, जहाँ कई विषयों पर मैंने पुस्तके एक्कठी की थी | जैसे साहित्य, दर्शन, इतिहास और कई महापुरुषों की आत्मकथाए | आज मेरे हाथ में जो किताब ई थी सावरकर लिखित ''मोपला''
पुस्तक पड़ते पड़ते रात ढल चुकी थी, तमाम तारे आसमान में रौशनी बिखेर रहे थे, में किताब हाथ में लिए कमरे से निकाल कर खुली छत पर आ गया था और टहलते हुए उसके एक किनारे तक पहुंचा था जहाँ से सड़क नज़र अति थी |
में पलट कर कमरे की तरफ चला ही था की मुझे यु लगा की सड़क पर एक साया नुमाया हुआ है | मैंने फ़ौरन पलट कर वापस सड़क की तरफ निहारा था | चाँद भी आज आस्मां में मुकम्मल ना था सो चांदनी में इतनी तेज़ी ना थी | की में उस साये को पहचान पता, हां इतना जरूर था की वोह कोई लड़की थी | वोह सड़क के किनारे-किनारे चल रही थी, चाल में कुछ लडखडाहट थी और उसके बाल बिखरे हुए थे कपड़ों का रंग लाख नज़र गड़ाने के बाद भी समझ में नहीं आया था | धीरे- धीरे मेरी आँखों से उसकी दूरी बड़ रही थी, न जाने क्यूँ मुझे लगा की में उसको पहचानता हूँ, उसे जानता हूँ | उसकी पीठ मेरे जानिब थी अगर चेहरा मेरे सामने होता तो में यकीन से कहता हूँ इतनी कम रौशनी में भी में उसको पहचान लेता था |
धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से दूर हो रही थी और आखिर में एक बिंदु की शक्ल लेकर विलुप्त हो गयी थी, मेरी नज़रों से ओझल हो गयी थी |
में टहलते हुए वापस कमरे में आ गया था और सावरकर की लेखनी का जादू मोपला में उलझ गया था |
सुबह जब उदा तोह दिन चढ़ आया था सूरज देवता यानि सूरज मुझे अपने ताप की तपिश से गर्म करने लगे थे | मैंने सूर्य नारायण की गर्मी से आँख खोली तो पाया सिरहाने स्टूल पर लालटेन अब तक जल रही थी और मेरे सीने पर मोपला पुस्तक का बोझ था न जाने क्यूँ मुझे लगा की इस बोझ को हटाना इतना आसान नहीं है जरूरत सतत शंगार्ष की जरूरत है | मुझे इस वक़्त इस बात का अहसास न था मेरी ज़िन्दगी भी आने वाले दिनों में ऐसी ही कहानी से दो-चार होने वाली है |
अगले दिन सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ा था, माँ को इतना बोल कर में जल्दी आ जाऊंगा निकल पड़ा था में गाँव की आवारगी पर | घर से निकल कर ज्यूँ ही में सड़क पर आया था मेरे दिमाग में छनाका हुआ था रात की वोह लड़की कौन थी जिसका साया मैंने रात चाँद की रौशनी में देखा था | कौन थी वोह..? और इतनी रात को वो क्यूँ सड़क पर थी जबकि उस वक़्त कोई पंची भी मौजूद न थे अपने उपर मुझे कुछ गुस्सा आया था आखिर क्यूँ मैंने उस वक़्त घडी देख कर एक्जेक्ट समय का पता नहीं लगाया था |
में खुद भी न जान सका था की मेरे कदम खुद-ब-खुद वहां कैसे पहुँच गए थे ये ऋतू का घर था और घर के दरवाज्व पर कड़ी ऋतू नहीं तन्वी थी वोह कुछ संजीदा थी मुझे देख कर भी वोह कुछ संजीदा ही रही, अमुमन ऐसा नहीं होता था, बचपन से मुझे जब भी देखती थी चहक पड़ती थी, आज उसने मुझे घर आने को भी नहीं कहा था, ख़ामोशी को उसने ही तोडा था, बहुत ही धीमी आवाज़ में बोली थी जबकि में जनता था की वो काफी तेज़ आवाज़ में बात करती थी, जिसकी वजह से उसने कई बार अपनी मम्मी पापा से दन्त भी खायी थी
सूरज- ''कल रात बहुत भारी थी'' उसने इतना ही बोला था और मैंने दर से एक पल के लिए अपनी आँखे बंद कर ली थी कंही वोह रात की लड़की ऋतू तो नहीं थी |
अगले छण वो बोली थी - '' कल संदीप ने ऋतू का सब कुछ लूट लिया अपने दोस्त अफरोज के साथ मिल कर''
क्या बोल रही हो तन्वी, क्या हुआ है ऋतू के साथ..?
तन्वी ने काफी विस्तार से बताई थी कल रात की घटना जिन्हें में दिल सख्त करके सुनता रहा था | मेरे दिल ने हज़ार आंसूं रोये थे पर मेरी आँखें मेरे से भी ज्यादा कड़ोर हो गयी थी और उन्होंने एक भी आंसू नहीं उगला था ऋतू से लाख मिलने का मन होने के बाद भी मैंने तन्वी को यह नहीं बोला था की में ऋतू से मिलना चाहता था |
तन्वी को इतना बोल कर की वो ऋतू का ध्यान रखे तेज़ क़दमों से निकल गया था बिना एक बार भी पलट कर ये देखे बिना तन्वी का हाल क्या है |



----000000----

........अपने बालों को सहलाते उन नर्म हाथों को पकड़ कर मैंने उनमें वही पमप्लेट पकड़ा दिया था जो आज दोपहर मकतब के सामने अल्हड हवाओं ने मेरे हवाले kiya था अँधेरा गहरा हो चूका था सो राबिया कोशिश के बाद भी पद न सकी |सो मैंने उसे मंदिर से दिया लेन को कहा पर वो गयी न थी उसकी दुविधा को में समझ गया था तभी मैंने उससे कहा था, राबिया स्थान किसी भी धर्म का हो कभी भी पवित्र ह्रदये के लोगों से अपवित्र नहीं होता वो हमेशा इअसे लोगों के इंतज़ार में रहता है मेरी बात सुन कर वो आगे बड़ी थी उसका पैर मंदिर की दहलीज़ को लाघने वाला ही था की वोह अचानक ठहर गयी थी मैंने देखा था उसने झुक कर हथेली से दहलीज़ को छु कर अपमे माथे से लगा लिया था जब वोह मंदिर से दिया लेकर वापस आ रही थी तो न जाने मुझे क्यूँ लगा की उस दिए की रौशनी बाद चुकी है शायेद ऐसा दो रोशनियाँ मिलने से हुआ होगा | एक मंदिर के पवित्र दिए की रौशनी और दूसरी राबिया के पवित्र ह्रदये से फूटती रौशनी |
राबिया ने दिया मेरे हाथ में पकड़ा कर उस पमप्लेट को पड़ा था बहुत ही मधिम आवाज़ में | जिसे सुन कर मेरे रोये खड़े हो गया था मैंने देखा था राबिया का बदन भी लरज रहा था यह एक ऐसा पत्रक था जो मुस्लिम युवको को गैर मुस्लिम युवतियों को अपने छद्म प्रेम में फ़साने की प्रेरणा दे रहा था, इसके लिए बकायेदा उन युवको के लिए पुरूस्कार की घोषण थी जो ऐसा कर पाएंगा | उस पमप्लेट में इस कार्य को बेहद पाक और जेहाद का एक रूप बताया गया था
ये कैसा जेहाद..? मैंने राबिया की तरफ देखते हुए बोला था जो मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दे
राबिया चुप रही थी शायेद इस लिए की उसके पास इसका कोई जवाब था ही नहीं |
मैंने अंदाजा लगाया था स्थिति की भयानकता का में समझ गया था ऋतू इसी जेहाद जा शिकार हुई थी



-------00000000-------
.............और यु बहुत देर तक हम साथ-साथ बैठे रहे इधेर-उधेर की बातें होती रही | मैंने महसूस किया की संजीवन लाल में इस समय खिशी की लहर दौड़ रही है पर में उसके लिए ह्रद्ये से चिंतित था, हां यह बात मैंने उस पर प्रकट नहीं होने दी थी फिर हम वहां से उठ कर चले आये थे रस्ते में टहलते-टहलते में अपने घर पहुंचा, संजीवन लाल का घर रस्ते में ही पड़ता था वह ख़ुशी मन से अपने घर चला गया था और जाते जाये यह कह गया था की शाम को मुझ से मिलने आयेगा
संजीवन लाल मेरे बचपन का दोस्त, निहचित रूप से आज भयंकर परेशानी में फंसने जा रहा था वह पागल जिसे पानी ख़ुशी समझ रहा था नहीं जनता था यह ख़ुशी उसके लिए मुसीबतों का सेलाब लेन वाली है मेरे संजीवन लाल से अपार स्नेह था, इस लिए उसके प्रति मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था
परम अय्याश ठाकुर संदीप सिंह की ख़ूबसूरत बहन राशी जो एक-आध साल पहले ही स्नातक होकर शहर से गाँव आई थी और संजीवन लाल जो ठाकुर संदीप सिंह के यहाँ एक घरेलु नौकर था वोह आज सुबह ही मुझे अपने और राशी के प्रेम सम्बंदों के बारे में ख़ुशी से बता रहा था, पर यक़ीनन में इससे खुश कम ही हुआ था मेरे खुश होने का कारन कुछ और नहीं था वरन में संजीवन लाल के लिए चिंतित था क्यूँ की में अच्छी तरह से संदीप के बारे में जानता था वह निहयेत ही क्रूर और बदमाश तरह का व्यक्ति था सच पुछो तो मुझे संजीवन लाल की जान की फ़िक्र होने लगी थी
----000000----




........उसी रात में अपनी महेंद्र डी.आई. जीप से कानपूर की तरफ चाल पड़ा था मकसद था राशी को अफरोज के इरादों से सावधान करना, में जनता था की राशी से मैंने आज तक मैंने कभी बात भी नहीं की थी | कानपूर रवाना होने से पहले में राबिया के घर गया था उसे बताने की में कानपूर जा रहा हूँ | उस वक़्त युसूफ घर न था चच्ची भी कंही गयी थी | हाँ राबिया के अब्बू को दो-तीन साल पहले ही जन्नतनशी हो चुके थे राबिया उस वक़्त घर पर अकेली थी |
जब मैंने उस वक़्त उस से कहा की में कानपूर जा रहा हूँ उसने मेरा हाथ पकड कर पलंग पर बिठा लिया था और खुद मेरे बगल में बैठ गयी थी मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर वो बोली थी |
सूरज- ऋतू के साथ जो हुआ बहुत बुरा हुआ
में कुछ बोला न था
वोह उसी तरह मेरे हाथ को पकडे हुए बोली थी आप तोह उसे चाहते थे बहुत दुःख हुआ होगा ना
मैंने हां में सर हिलाया था और कहा था,मेरी चाहत एक तरफ़ा थी राबिया |
मैंने महसूस किया था उस वक़्त उसके हाथों की पकड़ मेरे हाथों पर थोडा सख्त हो गयी थी
कानपूर क्यूँ जा रहे हो, उसने वापस सवाल किया था
उत्तर में मैंने पूरी तफ्शील बयाँ कर दी थी, जिसे वो शांति से सुनती रही थी | फिर बोली में अल्लाह से दुआ मागुंगी वो तुम्हे कामयाब करे | 


उपन्यास 'अमलतास के फूल' से 
- सुधीर मौर्य

Wednesday, 12 November 2014

स्त्री की स्त्री दुश्मन- सुधीर मौर्य

सच कहें तो स्त्री विमर्श खोखलेपन से गुज़र रहा है। ऐसा खोखलापन जिसे खुद स्त्री ने निर्मित किया है। इस खोखलेपन में वो खुद सहर्ष रहने को तयार है कभी किस्मत, कभी समाज तो कभी पुरुष को दोष देकर।
स्त्रियों ने जिस तीव्रता से उच्च शिक्षा ग्रहण की उस तीव्रता से वो खुद को पुरुष के समान मानने की मानसिकता विकसित नहीं कर पाई। स्त्रियों ने काम करने और शिक्षा ग्रहण करने के लिए घर से बाहर अपने पैर निकाले पुरषों के कंधे से कन्धा मिलाकर काम किया, शिक्षा ग्रहण की। कई अवसरों पर वे पुरषो से इक्कीस साबित हुई। पर न जाने क्यों वे अब तक अपने ऊपर पुरषों का वर्चस्व स्वीकार करती रही हैं।
शिक्षा और जॉब करने के दौरान लड़कियों के कई अच्छे पुरुष मित्र (बॉय फ्रेंड नहीं) बन जाते रहे उनमे से कई तो उनके साथ उनके अच्छे बुरे वक्त में अच्छे मित्र की तरह खड़े रहे। जब भी जरुरत पड़ी वे पुरुष, लड़की के अच्छे सहायक साबित हुए। कई अवसरों पे तो पारिवारिक और अन्य सम्बन्धियों से भी अधिक।
न जाने क्यों लड़की भय में जीती है। ऐसा भय जिसे उसे ठोकर मारनी चाहिए। आखिर क्यों वो लड़की अपने उस सर्वाधिक सहायक मित्र को उससे नहीं मिलवा पाती जिससे उसकी शादी होने जा रही है। फिर ये शादी चाहे उसके घर वालो ने फिक्स की हो या खुद उसने। आखिर क्यों वो उस पुरुष का वर्चस्व स्वीकार करती है जिसकी वो पत्नी बनने वाली है। स्त्री का यही समर्पण उसे पुरुष के समक्ष कमज़ोर बनता है और पुरुष उस पर अपना अधिकार समझ लेता है।
स्त्री आखिर क्यों ख़म ठोककर अपने अच्छे मित्र का अपने होने वाले पति से परिचय नहीं करवाती। वह विवाह के पूर्व उस पुरुष को यह नहीं बताती की अच्छे मित्र बनाने के लिए लड़की भी स्वतंत्र है जैसे पुरुष बनाते रहते हैं।
किस बात का भय स्त्रियां अपने मन में पालती हैं
–पति के शक करने का।
–विवाह सम्बन्ध प्रभावित होने का।
–यदि उसका होने वाला पति उसके अच्छे मित्रों के होने पर शक करता है, उसे शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है तो इसका अर्थ है वह सामंतवादी पुरुष है और एक सभ्य शुशिक्षित लड़की से शादी करने के योग्य नहीं।
लडकिया जब तक शादी होने वाले पुरुष के समक्ष स्वयंम के लड़की होने की वजह से समर्पण करना नहीं छोड़, पुरुष अपने पति होने का अवैध अधिकार इस्तेमाल करता रहेगा। और लड़की उच्च शिक्षित होने के बाउजूद पारवारिक जीवन में पुरुष के मुकाबले दोयम दर्ज़े की रहेगी।
स्त्री को खुद ही विचार करना होगा क्या वह पुरुष उसका पति बनने के लायक है जो स्त्री अच्छे सहायक मित्र होने की वजह से कुंठित हो। स्त्रियों को बेहिचक अपनी आदते और अपने सम्बन्ध उस पुरुष के सामने उजागर करने चाहिए जिससे उसका विवाह होने वाला है। सब जानकर यदि पुरुष उस स्त्री से विवाह करता है सही सही अर्थों में तभी वो पुरुष विवाह करने के योग्य है।
स्त्री को खुद का दुश्मन बनना छोड़ना पड़ेगा और पुरुषों के सामने ख़म ठोक कर खड़ा होना पड़ेगा तभी स्त्री और पुरुष बराबर कहलायेंगे और इसके लिए अब बहादुरी दिखने की बारी सिर्फ स्त्री की है।
 –सुधीर मौर्य
sudheermaurya1979@rediffmail.com

Thursday, 10 July 2014

लायक (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

प्रस्तुत संग्रह से प्रकाशित मेरी एक लघुकथा।
दबंग नेता के दबंग लड़के की बात जब बहुत दिनों तक लड़की ने न मानी तो वो उसे जबरन अपने फार्म हाउस पर उठा लाया।
तमाम चिरौरी, एवम लड़की के लाख हाथ पैर जोड़ने के बाद भी दबंग लड़के ने उसका बेरहमी से रैप करते हुए कहा - यही सब मै प्यार से मांग रहा था पर तू न मानी।अब आज के बाद तू किसी के लायक नहीं रहेगी।
बलात्कार के बाद दबंग लड़का चैन से सो गया वो अब तक नग्न था। कराहते हुए लड़की उठी पास में ही टेबल पर फल की टोकरी और छुरी थी।
लड़की ने पूरी ताकत से छुरी का वार दबंग लड़के के गुप्तांग पर किया, मांस का एक लोथड़ा छिटक कर दूर जा गिर। लड़का दर्द से तड़प का उठ बैठा।
लड़की मुस्कराते हुए बोली, मै तो फिर भी किसी के साथ सो सकती हूँ पर तू किसी के साथ सोने के ''लायक'' नहीं रहा।
--सुधीर मौर्य