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Wednesday, 30 August 2017

Sweet Sixteen: Hindi Novel By Sudheer Maurya

Sweet Sixteen - Hindi Novel कहानी है एक बेहद गरीब और दलित लड़के कुणाल की जो स्नातक की पढ़ाई के लिए शहर आता है। कुणाल के पिता अपने क्षेत्र के हरिजन कोटे के विधायक के घर पे नौकर है इस वजह से कुणाल को बिधायक बिंदर के शहर में मिले खाली पड़े सरकारी आवास में रहने का अवसर मिल जाता है। इस तरह कुणाल भाग्य या दुर्भाग्य से कथित बड़े और रईस लोगो के बीच में पहुँच जाता है। 

एक दिन कुणाल को अपने कमरे में किसी 'स्वीट सिक्सटीन' नाम की एक अनजान लड़की का खत मिलता है जो उससे प्यार करती है। अब कुणाल उस लड़की की तलाश बिल्डिंग केम्पस की हर लड़की में करता है और इस तरह वो संजना सचान और वाटिका पांडे नाम की नाम की लड़कियों से टकराता है /संजना अपने दोस्तों में संजू और वाटिका बंटी के नाम से मशहूर है। वक़्त की गर्दिश के चलते कुणाल, संजू और बंटी दोनों से शारीरिक सम्बन्ध बना लेता है। पर वास्तव में संजू जिसके पापा आई. ए. एस. है और बंटी जिसके पापा विधायक है वो दोनों मिसेज रंजना नाम की एक औरत के आर्गनाइजेशन में है। ये आर्गनिजशन औरतो को लड़के और मर्दो को लडकिया सप्लाई करने का काम करता है। एक साजिश के तहत बंटी और संजू, कुणाल को एक औरत मिसेज अंजलि की पास भेज देती है। अब संजम असलियत से वाक़िफ़ होता है। वो मिसेज रंजना के खिलाफ आवाज़ उठाता है। जिसे संजू, कविता के माध्यम से बेकार कर देती है।
कविता कुणाल के दूर के रिश्ते की लड़की है जो शहर में रहती है और उसे पढ़ने में मदद लुबना नाम की लड़की करती है। लुबना ही असल में वो लड़की है जो कुणाल को स्वीट सिक्सटीन नाम से खत लिखती है।
धीरे - धीरे कुणाल और लुबना नज़दीक आते है और लुबना कुणाल को संघर्ष के लिए प्रेरित करती है। कुणाल ज्यो ज्यो विद्रोह करता है मिसेज रंजना की और से दबाने की कोशिश भी तेज होती है। अब रंजना के साथ संजू और बंटी के पापा भी मिल जाते है और गाँव में कुणाल के घर में आग लगाके उसकी बहन मधु का सामूहिक बलात्कार करवाते है। कुणाल गाँव से अपनी बहन को लेकर आता है और लुबना की सहयता से अंतिम संघर्ष करता है।
--सुधीर

Tuesday, 25 July 2017

अरीबा (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

  • अरीबा उपन्यास
  • लेखक - सुधीर मौर्य 
  • Publisher: Aman Prakashan, Kanpur (2017)
  • ISBN-10: 9385476963
  • ISBN-13: 978-9385476969
  • हार्ड बाउन्ड:- २५० रुपय 
  • पेपरबैक:- १२५ रुपय  
  •  Aman Prakashan104 A / 80 C, RambaghKanpur - 208012Uttar Pradesh (INDIA)
  • Contact For Office Phone No. :- 0512-2543480Mobile No. :- 09839218516Mobile No. :- 08090453647Fax No. :- 0512-2543480
  • Mail For OfficeMail ID : info@amanprakashan.comMail ID : amanprakashan0512@rediffmail.com

#अरीबा उपन्यास की एक झलक।
#दिविता:- सुंदरता की अद्भुत मिसाल। मज़हबी कट्टरपंथियों के द्वारा बलात्कार होने के बाद भी वो न सिर्फ खुद को संभालती है बल्कि अपने दलित प्रेमी रूद्र को भी सहारा देती है।
#रूद्र;- एक प्रतिभासंपन्न दलित युवक जो एक स्वर्ण लड़की दिविता से प्रेम करता है। संघर्ष की राह पे उसे शंशांक, दिविता और सहर का साथ मिलता है और वो पुलिस आफिसर बनके दंगो को विफल कर देता है।
#सहर:- उपन्यास की नायिका अरीबा की कजिन जो हर कदम अरीबा से बीस है। चाहे वो सुंदरता हो या फिर बुद्धिमानी। अपने घर की जटिल रावयतो के खिलाफ अरीबा के साथ वो भी संघर्ष करती है।
#समर:- सहर का भाई जो बचपन से अरीबा पे वासना की नज़र रखता है। मज़हबी कटटरता के चलते वो आतंकवादियों से देश और अरीबा का सौदा कर बैठता है।
#शंशांक:- उपन्यास का नायक जिसे अरीबा बेपनाह प्रेम करती है। पर वक़्त और रवायतें अरीबा और शंशांक के बीच एक अभेद दीवार खड़ा कर देती है।
#अरीबा:- अरीबा इस अफ़साने की नायिका होकर भी नायिका नहीं बन पाती। वो कदम दर कदम अपनी आज़ादी की ख्वाहिश लिए समझौते करती है और उसका हर समझौता उसे वापस गुलामी की और धकेल देता है।
उपन्यास के अंत में सहर और शंशांक एक अद्भुत रूप में अरीबा के सामने आते है। 


#अमेज़ॉन से प्राप्त करने का लिंक:- 

  • http://www.amazon.in/Areeba-Sudheer-Mourya/dp/9385476963/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1500985190&sr=8-1&keywords=areeba 


Sunday, 5 March 2017

सुधीर के वैदिककालीन उपन्यास 'पहला शूद्र' पे श्री गंगाशरण जी की समीक्षा

पुस्तक - पहला शूद्र (वैदिककालीन उपन्यास) 
लेखक - सुधीर मौर्य 
प्रकाशक - रीड पब्लिकेशन 
पृष्ठ - १५२ पेपरबैक 
ISBN-13: 978-8190866446
समीक्षक - गंगाशरण सिंह 
Sudheer Maurya जी जी ऐसे लेखक मित्र हैं जो अमूमन न मुझे पढ़ते हैं न मैं उन्हें :)कहा जा सकता है कि हमारी मित्रता के बीच हमारा लिखना पढ़ना आड़े नही आता :) सुधीर जी लोकप्रिय लेखकों की उस नयी जमात से हैं जिनका अपना एक बड़ा पाठक वर्ग है और उनके मध्य अपने सरस ( ये दूसरा वाला सरस है....रस वाला ) लेखन के चलते वो काफी मक़बूल हैं।
पिछले दिनों पहली बार उनकी जो किताब मैंने पूरा पढ़ा वो है ---- " पहला शूद्र " और इस उपन्यास ने मुझे उनसे ये कहने को बाध्य किया कि वो इस तरह का गंभीर लेखन भी किया करें ताकि मेरे जैसे तथाकथित गंभीर पाठक भी उन्हें पढ़ सकें :)
पहला शूद्र पौराणिक युग की कथा है, जिसके नायक हैं उस युग के महान वीर दिवोदास के पुत्र सुदास। अपने नाम के "सु" को सार्थक करते हुए एक ऐसे महानायक जिन्होंने अप्रतिम साहस और वीरता का परिचय देते हुए अपने समय में अजेय योद्धा की ख्याति अर्जित की।
पुराण काल जहाँ शौर्य और वीरता के अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है वहीँ दूसरी तरफ़ शासक और पुरोहित वर्ग के षड्यंत्रों के किस्से भी कम नही हैं। स्वयं के प्रभुत्व को स्थापित करने और पूज्य होने की लालसा में उस समय के पुरोहित गणों ने ऐसे ऐसे राजनीतिक षडयंत्रों को जन्म दिया जिसने तत्कालीन समाज को लम्बे लम्बे युद्धों में उलझाये रखा और अपार जन धन की हानि हुई।
दिवोदास, इंद्र, वशिष्ठ, अहिल्या, विश्वामित्र, अगस्त्य, और अन्य बहुत से छोटे बड़े पात्र मिलकर इस रचना की कथाभूमि को प्रशस्त करते हैं। कहानी के तथ्यों पर कोई टिप्पड़ी करना उचित इसलिए नही है क्योंकि उन रचनाओं से अब तक नही गुजरा हूँ जिन्हें पढ़कर सुधीर जी के मन में इस उपन्यास के बीज अंकुरित हुए। कहानी के विस्तार और प्रस्तुति में गजब का तालमेल है और इसीलिए रोचकता कहीं पर बाधित नही होती। प्रूफ़ की कुछ ग़लतियाँ हैं जो अगले संस्करण में सुधार ली जायेंगी ऐसी उम्मीद है। अपने सरस वाले स्वाभाव के अनुसार लेखक यहाँ भी चूकते नही बल्कि जहाँ भी ज़रा सा अवसर मिला रस भरपूर फैलाया है. :)
सुधीर जी, आपका प्रयास और विशेष कर कथानक के अनुरूप आपकी भाषा की प्रौढ़ता सराहनीय लगी। आशा करता हूँ कि आने वाली रचनाओं में छोटी मोटी खामियों को दुरुस्त करेंगे और आपका लेखन निरंतर प्रौढ़ हो, ये सस्नेह शुभकामना है।

पुस्तक प्राप्त करने का अमेज़ॉन लिंक :-
http://www.amazon.in/Pahla-Shudra-Sudheer-Maurya/dp/8190866443/ref=sr_1_3/254-0123650-6016747?s=books&ie=UTF8&qid=1488705078&sr=1-3 

Wednesday, 22 February 2017

Pahla Shudra


Pahla Shudra Novel By Sudheer Maurya

Pahla Shudra ... the story of the King Sudas who was a great warrior and the Hero of Aryans. He was the first Aryan who established Aryans' Empire ... but unfortunately he was trapped by his own priest who made him First Shudra.


Amazon Link:-
http://www.amazon.in/Pahla-Shudra-Sudheer-Maurya/dp/8190866443/ref=sr_1_8?s=books&ie=UTF8&qid=1487759842&sr=1-8&keywords=shudra 

Tuesday, 1 March 2016

दंगो की पृष्ठभूमि पर पनपती प्रेम कहानी है 'वर्जित' - अंजलि कुशवाहा

अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित मेरे उपन्यास 'वर्जित' पे अंजलि कुशवाहा की सटीक संक्षिप्त टिप्पणी।  - सुधीर मौर्य 

दोस्तों आज पहली बार किसी उपन्यास की समीक्षा अपनी वॉल पर डाल रही हूँ। आशा है कि मैं उपन्यास व लेखक के साथ न्याय करने में थोड़ा सा सफल रही हूँ।
'वर्जित'
लेखक- श्री सुधीर मौर्य
समीक्षा-
वर्जित, साम्प्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि पर पनपती एक प्रेम कथा। कहानी में लेखक ने मानवीय भावनाओं को बखूबी उजागर किया है। लेखक ने कुणाल ( नायक) के माध्यम से जहाँ एक ओर पुरुष वर्ग की कमजोरियों का एक सफल चित्रण दिया है वहीं दूसरी ओर कहानी की नायिका इरम हर कदम पर एक ठोस निर्णय लेती नजर आती है। कहानी का नायक कुणाल जो कि एक लेखक है, इरम नामक मुस्लिम लड़की को बहुत प्यार करता है परन्तु अवनि जो कि उसके मकान मालिक की बेटी है और कुणाल को बहुत प्यार करती है, से सम्बन्ध बना लेता है। उपन्यास की नायिका इरम एक मुस्लिम लड़की जो सैफी ( कुणाल) को बेहद प्रेम करती है और प्रेम में पूर्णतया समर्पित है ,सैफी की वास्तविकता (एक हिन्दू लड़का) जानकर एक कठोर निर्णय लेकर स्वयं को कुणाल के लिए वर्जित घोषित कर देती है।
कुणाल की निर्णय ले पाने की अक्षमता के कारण ही वह स्वयं को अवनि और इरम के बीच फँसा हुआ पाता है। अवनि भी कुणाल को प्रेम करती है और कुणाल की खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार है। कहानी में तन्जीला का प्रवेश एक नया मोड़ ले आता है। तन्जीला एक जर्नलिस्ट और इरम की कजिन है।वह एक बोल्ड एवं आजाद ख्याल की लड़की है जो अपने विचारों से कुणाल और इरम को प्रभावित करती है। कुणाल और इरम दुनिया की सारी रिवायतैं तोड़ते हुए शादी कर दूर चले जाते हैं लेकिन शहर में हो रहे दंगे उन्हें वापस ले आते हैं और कहानी का अंत दंगों के दुष्परिणाम के साथ होता है ।

--अंजलि कुशवाहा

इस उपन्यास को अमेज़ॉन के इस लिंक से मगाया जा सकता है।

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Friday, 1 January 2016

वर्जित (उपन्यास) - सुधीर मौर्य


इश्क़ हो जाना ही काफी नहीं ....
भारत में इश्क़ होता नहीं है करना पड़ता है, धर्म जाति देख कर इश्क़ कीजिये नहीं तो तमाम वर्जनाएं आपको अपनी मंज़िल तक पहुँचने से पहले जकड़ लेंगी

और कहीं एक मुस्लिम लडकी को एक हिन्दू लड़के से इश्क़ हो जाए तो क्या हो वर्जित हो जाती है हर भावना ...

पढ़ें बहुप्रतीक्षित उपन्यास "वर्जित"
आज से आनलाइन बुक स्टोर्स पर उपलब्ध

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Wednesday, 27 May 2015

अमलतास के फूल ( उपन्यास) - सुधीर मौर्य

.................यक़ीनन सब कुछ मुझे बहुत जल्दी करना था, क्यों की में जनता था की कठमुल्ला वर्ग अपनी हरकत से बाज़ नहीं आयेगा, और यहाँ निहचित रूप से राछसी तांडव करने में कोई कोर कसर बाकि नहीं रखेगा और में यह भी जनता था की इनके असुरी नाच को सिर्फ सतर्कता से ही रोका जा सकता था |
शाम होते ही मैंने माँ से चाय पिने की इच्छा जाहिर की, में चाय पि कर युसूफ के घर जाना चाहता था | माता जी चाय बना कर ले ई और में चाय पिटे हुए भी सिर्फ ६ दिसम्बर के बारे में ही सोच रहा था | चाय पि कर में घर से निकल पड़ा, पैदल टहलते हुए में युसूफ के घर की तरफ जा रहा था, तबी सामने से मैंने देखा की संदीप जीप ड्रिवे करता आ रहा है, वह भी शायद मुस्लिम महोलों की तरफ से आ रहा था, उसके बगल में एक लड़की बैठी थी, लड़की के दुधिया जिस्म पर लाल टी-शर्ट व् कलि जेंस थी , मैंने उस लड़की को यक़ीनन पहचान लिया था वह ऋतू थी उसे देख कर मेरे दिल पर तिव्र्र झटका लगा था | मुझे ऐसा लगा की मेरा ह्रदये बिठा जा रहा हो, दिल इतनी तिव्र्र गति से धडकने लगा था की मुझे लगा की वह सीने को फाड़ कर बहार निकल जायेगा, आँखों में अंशु की बुँदे झिलमिलाने लगी थी | मेरे कदम डगमगाने लगे थे, में लरजते क़दमों से युसूफ के घर की तरफ बड़ा |
तुरंत देखे गए द्रश्य को में झटका देकर जेहन से निकाल देना चाहता था, में जनता था यह सब इतना आसान नहीं है, ऋतू संदीप के साथ यक़ीनन ये अस्चर्या की बात थी |
खेर में जैसे तैसे युसूफ के घर पहुंचा, युसूफ घर पर ही था बड़ी गर्मजोशी के साथ उसने मेरा इस्तेकबाल किया | में उसके साथ बैठक में बैठ गया |
मेरा स्वागत उसकी अम्मी ने गर्म चाय और गोभी के पकोड़े से किया था | मेरे द्वारा पकोड़ों की तारीफ किये जाने पर वोह बोली थी अरे ये तोह राबिया ने बनाये है |
में अभी कुछ बोलना ही चाहता था की बैठक में राबिया ने एंट्री मरी थी | वोह युसूफ की बड़ी बहन थी, कोई दो या तीन साल बड़ी होगी | और इतनी ही वोह मुझसे बड़ी होगी, क्योंकि मेरी और युसूफ की उम्र में एक -दो महीने का अंतर था | कौन बड़ा था कौन छोटा ये पता नहीं |
कब आए सूरज और कैसे हो..? राबिया ने पूछा था | उस से उम्र में छोटा होने के कारन वोह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी | हाँ ये और बात है में उससे सीधी बात करता था | न ही उसका नाम लेता और न ही दीदी, बाज़ी, या आपा आदि सम्भोधन ही लगता था |


---oooooooo---
…………….में काफी देर वहां बैठा रहा फिर में वहां से विदा लेकर चल दिया, तन्वी मुझे बहार तक छोड़ने आई | में जब चलने लगा तोह उसने कहां-
''बहुत खुश होंगे आप ''
मैंने कहा - ''क्यूँ''
''दीदी आने वाली है ना |''
और में उत्तर में सिर्फ मुस्कुरा दिया था |
उसने कहा - ''आपने जवाब नहीं दिया |''
मैंने कहा - ''ये भी कोई पूछने वाली बात है |''
वह बोली - ''क्या मतलब''
''मतलब'' - में उसकी तरफ देखते हुए बोला - ''हद से जयादा ख़ुशी हो रही है, आखिर में ऋतू से पुरे १-२ साल बाद मिलूँगा |
बदले में उसने पलके झुका ली | मैंने कहा तन्वी में जा रहा हु माता जी राह देख रही होंगी | तन्वी अनमने मन से बोली, जा रहे है तोह में रोक कैसे सकती हूँ |
मैंने तन्वी की बात का कोई जवाब नहीं दिया, शयेद मेरे पास उसकी किसी बात का जवाब था भी नहीं, मैंने के नज़र उसके मासूम चेहरे पर डाली और फिर पलट कर चल दिया |
न जाने किस भावना से वशीभूत होकर मैंने पलट कर फिर तन्वी की तरफ देखा और मैंने पाया की वोह तोह पागलों की तहर मुझे देख रही है | पर अचानक मुझ पर द्रद्ता सवार हो गयी थी मैंने झटक कर अपने मन से तन्वी का ख़याल निकला और तिव्र्र क़दमों से अपने घर की तरफ चल दिया |
घर पहुँचते-पहुँचते मुझे शाम हो गयी, रास्ते में एक-दो लोग मिल गए जिनसे बात करने में कुछ समय लग गया था | घर पंहुंच कर कर मैंने भोजन किया और फिर बिस्तर के सुपुर्द कर दिया | पर यक़ीनन यह अभी सोने का वक़्त नहीं था, लखनऊ में तो में देर रात तक जगा करता था |
संजीवन लाल, राशी, संदीप, ऋतू, और तन्वी यह सब मेरे जेहन में बारी-बारी से दुस्तक देने लगे थे, मेरे मन की उलझन बदने लगी पर मेरे लिए ये उलझन अधिक अर्थ नहीं रखती थी क्योंकि में जनता था की इस तरह की उलझन से में कभी भी निपट सकता था | मेरे लिए उलझन का कारन था तो आने वाली तारिख ६ दिसम्बर १९९२ |
एक ताराग कारसेवकों व् रामसेवकों का धर्म के लिए जीवन उत्सर्ग कि पर्वाह न करते हुए सत्य के लिए मंदिर निर्माण की संकल्पना और दूसरी तरफ चरों तरफ कट्टरपंथी मुस्लिम बहुल छेत्र से घिरा मेरा गाँव और जिसमें से आधे से अधिक आबादी कट्टरपंथी मुसलमानों की |


-- ००००००० ----
……………..वापस बात करने का सिलसिला उसी ने सुरु किया था | कुछ बातें मेरी पदाई के बारे में और कुछ उसने मेरे घर के बारे में पूछी थी | बहार से युसूफ और कुछ और आवांजे हल्की-हल्की सुने दे रही थी, राबिया उठ कर उन्हें खिड़की से देख कर ई थी | वापस मेरे सामने बैठते हुए उसने एक आप्रत्याशित swaal पूछा था |
सूरज - वहां लखनऊ में कोई गर्ल फ्रेंड बने या नहीं | मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा था उससे आँख मिलते ही आँख झुका ली थी | मुझे थोड़ी शरारत सूझी थी |
मैंने कहा - राबिया - (यकीन करो जहाँ तक मुझे याद है जीस्त में पहली बार मैंने उसे उसके नाम से पुकारा था) ''क्या तुम्हारा कोई बॉय फ्रेंड है कानपूर में''
उसने इनकार में सर हिलाया था
''तो यहाँ गाँव में'' - मैंने वापस शरारत की थी |
उसने न कोई इशारा किया था और न ही लब से कुछ बोली थी |
में वापस पूछता इससे पहले युसूफ कमरे में आ गया था और में चुप हो गया था |
राबिया भी बात का रुख बदले हुए बोली थी इस साल तुम्हारे बी. टेक के तीन साल पुरे हो रहे है ना |
- हां राबिया में चाय का कप खली करके मेज पर रखते हुए बोला था | मेरे होंठो से 'राबिया' निकलते ही युसूफ ने मेरी तरफ देखा था | शयेद इस से पहले कभी भी उसने मेरे होंठो से अपनी बहन का नाम नहीं सुना था |
मैंने चलने के लिए युसूफ राबिया और उनकी मम्मी से इज़ाज़त मांगी थी | तभी फ़ोन की घंटी बाज़ी थी और युसूफ उसमें व्यस्त हो गया था | मुझे घर के बहार राबिया छोड़ने आई थी | और वोह मेरे साथ साथ चलने लगी थी, मैंने मना नहीं किया था |
चलते-चलते मैंने पूछा था राबिया आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया |
''कौन सी बात..?''
वोह अपने बाल सावरते हुए बोली थी बाल सवारने के टाइम उसकी कोहनी मेरे शरीर से छु गयी थी, उस वक़्त मेरे शरीर की हरारत यक़ीनन बढ गयी थी | हाँ उसने क्या फील किया था में उस दिन ये जान ना सका था |
राबिया, ''क्या तुम्हारा कोई बोर फ्रेंड है |'' अबकी बार मैंने स्पस्ट पूछा था |
शयेद हां, शयेद ना.....
ये कैसा जवाब है राबिया ?
मीन्स, में उसे अपना बॉय फ्रेंड मानती हू पर वोह खुद को मेरा बॉय फ्रेंड मानता है या नहीं में यह नहीं जानती |
में हसंते हुए बोला था, ''मतलब एकतरफा मुहब्बत |''
शायद , वोह थोडा उदास होते हुए बोली थी |
चलते-चलते गली का नुक्कड़ आ गया था और वोह वन्ही कड़ी हो गयी थी | में समझा गया था वो वहां से घर वापस जाना चाहती है |
मैंने हाथ जोड़ कर उसका अभिवादन किया था | हाँ चलते-चलते उसने पूछा था और आपकी गर्ल फ्रेंड..?
''आप जैसी ही हालत है '' में मुस्कुराया था
और वोह भी मुस्कुराते हुए वापस चल दी थी और में उसे ओझल होने तक देखता रहा था |



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............पर दो-तीन दिनों में मेरे हालात बढ से बत्तर हो गए थे | ज़िन्दगी ने फरेब देने चालू कर दिए थे | एक तरफ सांप्रदायिक दंगों की आहट से सुलगता मेरा छोटा सा क़स्बा जो क़स्बा कम गाँव अधिक था | और दूसरी तरफ मेरे बचपन की चाहत मेरी ऋतू ने मेरा दिल तोड़ दिया था | उस दिन संदीप के साथ जीप में बैठी हुई लड़की ऋतू ही थी |और उसने मेरे कोमल मन को बड़ी बेदर्दी से कुचलते हुए उसने मुझे बताया था, ''वोह मुझे नहीं बल्कि संदीप से प्यार करती थी |
मैंने जब उसे संदीप के बारे में बताने की कोशिश की थी तो उसने मुझे सख्ती से अपनी औकात में रहने की हिदायत दी थी, साथ ही ताकीद की थी,में उसे भूल जाऊ | हां उस दिन इस घटना या यूँ कहिये दुर्घटना | सच पुचो तो मेरे लिए ये दुर्घटना ही थी, हां तो में बता रहा था उस दुर्घटना वाले दिन ऋतू के साथ उसकी छोटी बहन तन्वी भी थी जो इस हादसे से कुछ चकित नज़र आ रही थी | उस वक़्त वहां संदीप आ गया था और ऋतू उसके बगल की सीट और तन्वी पीछे की सीट पर बैठ कर वहां से रुखसत हो गयी थी | हां जाते वक़्त भी ऋतू ने मुझे पलट कर नहीं देखा था | अलबत्ता तन्वी मुझे जरूर देखती रही थी | ज़िन्दगी के इस फरेब से में हेरान रह गया था | जिसे बचपन से चाहा, जिसे होश सँभालते ही जाना था, जिसने कभी मेरी दोस्ती का दम भरा था, जिसने कभी अपने खतों में अपने नाम के आगे मेरा सरनेम को लगाया था | जिसने कभी हमारे दांपत्य से होने वाले बच्चों के नाम सोचे थे, जिसने कभी मेरे लबों को अपने नमकीन लबो से तर-बतर किया था, जिसने कभी कानपूर के चिड़िया घर में मेरे पैरों को छुआ था, जिसने कभी कानपूर के गुरुदेव पैलेस में 'परदेश' फिल्म के देखने के वक़्त अपने हाथों से मेरे हाथ को अपने कधोर वक्चों पर रख लिया था, जिसने कभी रात के अँधेरे में मेरे सामने शारीरिक समर्पण किया था, जिसने कभी ................., जिसने कभी............., जिसने कभी........................



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………………आज मैंने दूध में मक्के की रोटी मीस कर खायी थी, फिर पानी पि कर उपर के कमरे में चला गया था, यहाँ मैंने छोटी सी ल्य्ब्रेरी बना राखी थी, जहाँ कई विषयों पर मैंने पुस्तके एक्कठी की थी | जैसे साहित्य, दर्शन, इतिहास और कई महापुरुषों की आत्मकथाए | आज मेरे हाथ में जो किताब ई थी सावरकर लिखित ''मोपला''
पुस्तक पड़ते पड़ते रात ढल चुकी थी, तमाम तारे आसमान में रौशनी बिखेर रहे थे, में किताब हाथ में लिए कमरे से निकाल कर खुली छत पर आ गया था और टहलते हुए उसके एक किनारे तक पहुंचा था जहाँ से सड़क नज़र अति थी |
में पलट कर कमरे की तरफ चला ही था की मुझे यु लगा की सड़क पर एक साया नुमाया हुआ है | मैंने फ़ौरन पलट कर वापस सड़क की तरफ निहारा था | चाँद भी आज आस्मां में मुकम्मल ना था सो चांदनी में इतनी तेज़ी ना थी | की में उस साये को पहचान पता, हां इतना जरूर था की वोह कोई लड़की थी | वोह सड़क के किनारे-किनारे चल रही थी, चाल में कुछ लडखडाहट थी और उसके बाल बिखरे हुए थे कपड़ों का रंग लाख नज़र गड़ाने के बाद भी समझ में नहीं आया था | धीरे- धीरे मेरी आँखों से उसकी दूरी बड़ रही थी, न जाने क्यूँ मुझे लगा की में उसको पहचानता हूँ, उसे जानता हूँ | उसकी पीठ मेरे जानिब थी अगर चेहरा मेरे सामने होता तो में यकीन से कहता हूँ इतनी कम रौशनी में भी में उसको पहचान लेता था |
धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से दूर हो रही थी और आखिर में एक बिंदु की शक्ल लेकर विलुप्त हो गयी थी, मेरी नज़रों से ओझल हो गयी थी |
में टहलते हुए वापस कमरे में आ गया था और सावरकर की लेखनी का जादू मोपला में उलझ गया था |
सुबह जब उदा तोह दिन चढ़ आया था सूरज देवता यानि सूरज मुझे अपने ताप की तपिश से गर्म करने लगे थे | मैंने सूर्य नारायण की गर्मी से आँख खोली तो पाया सिरहाने स्टूल पर लालटेन अब तक जल रही थी और मेरे सीने पर मोपला पुस्तक का बोझ था न जाने क्यूँ मुझे लगा की इस बोझ को हटाना इतना आसान नहीं है जरूरत सतत शंगार्ष की जरूरत है | मुझे इस वक़्त इस बात का अहसास न था मेरी ज़िन्दगी भी आने वाले दिनों में ऐसी ही कहानी से दो-चार होने वाली है |
अगले दिन सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ा था, माँ को इतना बोल कर में जल्दी आ जाऊंगा निकल पड़ा था में गाँव की आवारगी पर | घर से निकल कर ज्यूँ ही में सड़क पर आया था मेरे दिमाग में छनाका हुआ था रात की वोह लड़की कौन थी जिसका साया मैंने रात चाँद की रौशनी में देखा था | कौन थी वोह..? और इतनी रात को वो क्यूँ सड़क पर थी जबकि उस वक़्त कोई पंची भी मौजूद न थे अपने उपर मुझे कुछ गुस्सा आया था आखिर क्यूँ मैंने उस वक़्त घडी देख कर एक्जेक्ट समय का पता नहीं लगाया था |
में खुद भी न जान सका था की मेरे कदम खुद-ब-खुद वहां कैसे पहुँच गए थे ये ऋतू का घर था और घर के दरवाज्व पर कड़ी ऋतू नहीं तन्वी थी वोह कुछ संजीदा थी मुझे देख कर भी वोह कुछ संजीदा ही रही, अमुमन ऐसा नहीं होता था, बचपन से मुझे जब भी देखती थी चहक पड़ती थी, आज उसने मुझे घर आने को भी नहीं कहा था, ख़ामोशी को उसने ही तोडा था, बहुत ही धीमी आवाज़ में बोली थी जबकि में जनता था की वो काफी तेज़ आवाज़ में बात करती थी, जिसकी वजह से उसने कई बार अपनी मम्मी पापा से दन्त भी खायी थी
सूरज- ''कल रात बहुत भारी थी'' उसने इतना ही बोला था और मैंने दर से एक पल के लिए अपनी आँखे बंद कर ली थी कंही वोह रात की लड़की ऋतू तो नहीं थी |
अगले छण वो बोली थी - '' कल संदीप ने ऋतू का सब कुछ लूट लिया अपने दोस्त अफरोज के साथ मिल कर''
क्या बोल रही हो तन्वी, क्या हुआ है ऋतू के साथ..?
तन्वी ने काफी विस्तार से बताई थी कल रात की घटना जिन्हें में दिल सख्त करके सुनता रहा था | मेरे दिल ने हज़ार आंसूं रोये थे पर मेरी आँखें मेरे से भी ज्यादा कड़ोर हो गयी थी और उन्होंने एक भी आंसू नहीं उगला था ऋतू से लाख मिलने का मन होने के बाद भी मैंने तन्वी को यह नहीं बोला था की में ऋतू से मिलना चाहता था |
तन्वी को इतना बोल कर की वो ऋतू का ध्यान रखे तेज़ क़दमों से निकल गया था बिना एक बार भी पलट कर ये देखे बिना तन्वी का हाल क्या है |



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........अपने बालों को सहलाते उन नर्म हाथों को पकड़ कर मैंने उनमें वही पमप्लेट पकड़ा दिया था जो आज दोपहर मकतब के सामने अल्हड हवाओं ने मेरे हवाले kiya था अँधेरा गहरा हो चूका था सो राबिया कोशिश के बाद भी पद न सकी |सो मैंने उसे मंदिर से दिया लेन को कहा पर वो गयी न थी उसकी दुविधा को में समझ गया था तभी मैंने उससे कहा था, राबिया स्थान किसी भी धर्म का हो कभी भी पवित्र ह्रदये के लोगों से अपवित्र नहीं होता वो हमेशा इअसे लोगों के इंतज़ार में रहता है मेरी बात सुन कर वो आगे बड़ी थी उसका पैर मंदिर की दहलीज़ को लाघने वाला ही था की वोह अचानक ठहर गयी थी मैंने देखा था उसने झुक कर हथेली से दहलीज़ को छु कर अपमे माथे से लगा लिया था जब वोह मंदिर से दिया लेकर वापस आ रही थी तो न जाने मुझे क्यूँ लगा की उस दिए की रौशनी बाद चुकी है शायेद ऐसा दो रोशनियाँ मिलने से हुआ होगा | एक मंदिर के पवित्र दिए की रौशनी और दूसरी राबिया के पवित्र ह्रदये से फूटती रौशनी |
राबिया ने दिया मेरे हाथ में पकड़ा कर उस पमप्लेट को पड़ा था बहुत ही मधिम आवाज़ में | जिसे सुन कर मेरे रोये खड़े हो गया था मैंने देखा था राबिया का बदन भी लरज रहा था यह एक ऐसा पत्रक था जो मुस्लिम युवको को गैर मुस्लिम युवतियों को अपने छद्म प्रेम में फ़साने की प्रेरणा दे रहा था, इसके लिए बकायेदा उन युवको के लिए पुरूस्कार की घोषण थी जो ऐसा कर पाएंगा | उस पमप्लेट में इस कार्य को बेहद पाक और जेहाद का एक रूप बताया गया था
ये कैसा जेहाद..? मैंने राबिया की तरफ देखते हुए बोला था जो मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दे
राबिया चुप रही थी शायेद इस लिए की उसके पास इसका कोई जवाब था ही नहीं |
मैंने अंदाजा लगाया था स्थिति की भयानकता का में समझ गया था ऋतू इसी जेहाद जा शिकार हुई थी



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.............और यु बहुत देर तक हम साथ-साथ बैठे रहे इधेर-उधेर की बातें होती रही | मैंने महसूस किया की संजीवन लाल में इस समय खिशी की लहर दौड़ रही है पर में उसके लिए ह्रद्ये से चिंतित था, हां यह बात मैंने उस पर प्रकट नहीं होने दी थी फिर हम वहां से उठ कर चले आये थे रस्ते में टहलते-टहलते में अपने घर पहुंचा, संजीवन लाल का घर रस्ते में ही पड़ता था वह ख़ुशी मन से अपने घर चला गया था और जाते जाये यह कह गया था की शाम को मुझ से मिलने आयेगा
संजीवन लाल मेरे बचपन का दोस्त, निहचित रूप से आज भयंकर परेशानी में फंसने जा रहा था वह पागल जिसे पानी ख़ुशी समझ रहा था नहीं जनता था यह ख़ुशी उसके लिए मुसीबतों का सेलाब लेन वाली है मेरे संजीवन लाल से अपार स्नेह था, इस लिए उसके प्रति मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था
परम अय्याश ठाकुर संदीप सिंह की ख़ूबसूरत बहन राशी जो एक-आध साल पहले ही स्नातक होकर शहर से गाँव आई थी और संजीवन लाल जो ठाकुर संदीप सिंह के यहाँ एक घरेलु नौकर था वोह आज सुबह ही मुझे अपने और राशी के प्रेम सम्बंदों के बारे में ख़ुशी से बता रहा था, पर यक़ीनन में इससे खुश कम ही हुआ था मेरे खुश होने का कारन कुछ और नहीं था वरन में संजीवन लाल के लिए चिंतित था क्यूँ की में अच्छी तरह से संदीप के बारे में जानता था वह निहयेत ही क्रूर और बदमाश तरह का व्यक्ति था सच पुछो तो मुझे संजीवन लाल की जान की फ़िक्र होने लगी थी
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........उसी रात में अपनी महेंद्र डी.आई. जीप से कानपूर की तरफ चाल पड़ा था मकसद था राशी को अफरोज के इरादों से सावधान करना, में जनता था की राशी से मैंने आज तक मैंने कभी बात भी नहीं की थी | कानपूर रवाना होने से पहले में राबिया के घर गया था उसे बताने की में कानपूर जा रहा हूँ | उस वक़्त युसूफ घर न था चच्ची भी कंही गयी थी | हाँ राबिया के अब्बू को दो-तीन साल पहले ही जन्नतनशी हो चुके थे राबिया उस वक़्त घर पर अकेली थी |
जब मैंने उस वक़्त उस से कहा की में कानपूर जा रहा हूँ उसने मेरा हाथ पकड कर पलंग पर बिठा लिया था और खुद मेरे बगल में बैठ गयी थी मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर वो बोली थी |
सूरज- ऋतू के साथ जो हुआ बहुत बुरा हुआ
में कुछ बोला न था
वोह उसी तरह मेरे हाथ को पकडे हुए बोली थी आप तोह उसे चाहते थे बहुत दुःख हुआ होगा ना
मैंने हां में सर हिलाया था और कहा था,मेरी चाहत एक तरफ़ा थी राबिया |
मैंने महसूस किया था उस वक़्त उसके हाथों की पकड़ मेरे हाथों पर थोडा सख्त हो गयी थी
कानपूर क्यूँ जा रहे हो, उसने वापस सवाल किया था
उत्तर में मैंने पूरी तफ्शील बयाँ कर दी थी, जिसे वो शांति से सुनती रही थी | फिर बोली में अल्लाह से दुआ मागुंगी वो तुम्हे कामयाब करे | 


उपन्यास 'अमलतास के फूल' से 
- सुधीर मौर्य

Tuesday, 20 May 2014

माई लास्ट अफेयर - Sudheer Maurya

उपन्यास की नायिका में मुझे फरनाज का अक्स दिखाई देता और मैं उपन्यास में लिखे वर्णन के आधार पर फरनाज को अपनी प्रेमिका मान अपने ख्वाबों में रात बिस्तर पर उसकी बजती चूड़ियों की आवाज सुता रहता। मैंने ख्वाबों में ख्यालों में अब तक हर रात उसके सय्याल गुलाबी होठों को चूमा था। उसके बदन की उभारों और घाटियों की सैर की थी।
 
ये इन उपन्यासों का और टीवी पर देखी गई फिल्मों का ही असर रहा होगा जो उस दिन मैंने उस मन्दिर के आगे बेबाक उसके हाथ को पकड़कर उसे `आई लव यू' बोल दिया।
मेरी बात सुनकर उसने अपनी बोझल पलकें झुका लीं और हया से बोली कुणाल मैं भी तुमसे मुहब्बत करती हूँ। उसका हाथ अब तक मेरे हाथ में था।
उसके इन शब्दों ने मुझे दुनिया भर की खुशी दे डाली। उस दिन हम तमाम दिन साथ रहे प्यार की बातों के साथ। सुम्बुल भी साथ भी पर वो शायद हमारे इकरारे मुहब्बत को समझ गई थी इसलिये उसके कदम हमारे कदमों से तमाम दिन थोड़ा पीछे ही रहे।
फिर शाम हम अलग हुए, समर विकेशन के बाद मिलने के वादे के साथ हाँ अगर आज की तरह कहीं अचानक मुलाकाते रोज होती रहे।
``ये मेरे पहले अफेयर की शुरुआत थी।''

Saturday, 19 October 2013

देवल देवी: एक संघर्षगाथा (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारी, चाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल रानी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्म, संस्कृति, कला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्म, संस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को न भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को न पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और न अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्ति- खुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यत: मुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछा, पापी, नरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दर, दृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलत: एक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसन" रख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाह" की उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही था) को मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुन: दक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तों, राजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास न किया। वस्तुत: खुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयास, तलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया।
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी - दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 ई. की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलत: मैं हिन्दू का पुत्र हूं, मेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त है, इसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्ताना" कहलाने वाली देवल देवी जो मूलत: एक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती है, अब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, क्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया, परन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुत: इस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं में, जो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थे, स्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागा, जो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 ई. में) विजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ।

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
 प्रकाशक - साहित्य संचय     B-1050, Gali No. 14/15, Pahla Pusta,
Soniya Vihar, New Delhi- 110 094
Contact No: 9871418244, 9136175560
email: sahityasanchay@gmail.com

Tuesday, 15 October 2013

उपन्यास 'देवल देवी' लिखने की प्रेरणा 'रिंकल' के संघर्ष से मिली - सुधीर मौर्य

पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में २४ फ़रवरी २०१२ को एक ह्रदयविदारक घटना घटी। इकिसिवीं शताब्दी में जब सारा विश्व सभ्य होने का दंभ भर रहा था उस समय सिंध के मीरपुर मेथेलो से एक अल्पवयस्क और उक्त देश की अल्पसंख्यक लड़की का जबरन अपहरण करके उसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। उस लड़की को जबरन बलत्कृत करके उस देश के बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्ति से निकाह के लिए बाध्य किया गया। उस लड़की का नाम रिंकल है। वो लड़की और उसके अभिवावक छोटी अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायलय तक की गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज़ को जबरन दबा दिया गया। वो लड़की रिंकल कुमारी आज भी अपने अपहरणकरताओ की कैद में है और दासी सा जीवन जीने को बाध्य है। ऐसा भी नहीं कि उसकी रिहाई के लिए आवाज़ बुलंद नहीं हुई। बहुत से लोगो ने उसकी रिहाई के लिए संघर्ष किया। अमेरिका से सुनील दिक्षित, पकिस्तान की वेंगस और मारवी,भारत से राकेश लखानी और खुद मैने अपने लेखों और और अन्य गतविधियों से रिंकल कुमारी के जबरन अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर संघर्ष किया पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात रहा। पिछले कुछ दिनों में अकेले पाकिस्तान में ही जबरन धर्म परिवर्तन के कई केस सामने आये हैं। फिर सारे विश्व में ऐसे कितनी घटनाएं होती होंगी जो प्रकाश में नाइ आ पाती। ऐसी घटनाओ से हमारा देश भारत भी अछुता नहीं है। जब आधुनिक सभ्य्काल में योनि शोषण के लिए लड़कियों का अपहरण किया जा रहा है और हम शोसल नेटवर्किंग साईट से लेस होकर भी रोक नहीं पा रहें हैं तो सोचिये मध्यकाल में कितनी लड़कियों को जबरन सेक्स स्लेव बनया गया होगा। युद्ध में जीती गई संभ्रांत परिवार की लड़कियों के साथ और कठोर व्यवहार किया गया। देवलदेवी भी इसका शिकार हुई पर भाग्य से उसने अपना प्रतिशोध ले लिया। पर उन हजारो - हजार का क्या जो योनि दासी बनकर सारी उमर रोती - सिसकती रही।
रिंकल कुमारी के आपह्रण और न्याय के लिए दिखाए गए उनके अदम्य साहस ने मुझे उपन्यास 'देवल देवी, लिखने की प्रेरणा दी। मेरी ये कृति समर्पित है बहादुर लड़की 'रिंकल कुमारी' को। --सुधीर मौर्य

Friday, 6 September 2013

अमलतास के फूल (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

अमलतास के फूल (उपन्यास) के  कुछ अंश --सुधीर मौर्य -                                                                                                                                                                                                                                              .=======================================                                                                                                                                                  
                              .............यक़ीनन सब कुछ मुझे बहुत जल्दी करना था, क्यों की में जनता था की कठमुल्ला वर्ग अपनी हरकत से बाज़ नहीं आयेगा, और यहाँ निहचित रूप से राछसी तांडव करने में कोई कोर कसर बाकि नहीं रखेगा और में यह भी जनता था की इनके असुरी नाच को सिर्फ सतर्कता से ही रोका जा सकता था |
शाम होते ही मैंने माँ से चाय पिने की इच्छा जाहिर की, में चाय पि कर युसूफ के घर जाना चाहता था | माता जी चाय बना कर ले ई और में चाय पिटे हुए भी सिर्फ ६ दिसम्बर के बारे में ही सोच रहा था | चाय पि कर में घर से निकल पड़ा, पैदल टहलते हुए में युसूफ के घर की तरफ जा रहा था, तबी सामने से मैंने देखा की संदीप जीप ड्रिवे करता आ रहा है, वह भी शायद मुस्लिम महोलों की तरफ से आ रहा था, उसके बगल में एक लड़की बैठी थी, लड़की के दुधिया जिस्म पर लाल टी-शर्ट व् कलि जेंस थी , मैंने उस लड़की को यक़ीनन पहचान लिया था वह ऋतू थी उसे देख कर मेरे दिल पर तिव्र्र झटका लगा था | मुझे ऐसा लगा की मेरा ह्रदये बिठा जा रहा हो, दिल इतनी तिव्र्र गति से धडकने लगा था की मुझे लगा की वह सीने को फाड़ कर बहार निकल जायेगा, आँखों में अंशु की बुँदे झिलमिलाने लगी थी | मेरे कदम डगमगाने लगे थे, में लरजते क़दमों से युसूफ के घर की तरफ बड़ा |
तुरंत देखे गए द्रश्य को में झटका देकर जेहन से निकाल देना चाहता था, में जनता था यह सब इतना आसान नहीं है, ऋतू संदीप के साथ यक़ीनन ये अस्चर्या की बात थी |
खेर में जैसे तैसे युसूफ के घर पहुंचा, युसूफ घर पर ही था बड़ी गर्मजोशी के साथ उसने मेरा इस्तेकबाल किया | में उसके साथ बैठक में बैठ गया |
मेरा स्वागत उसकी अम्मी ने गर्म चाय और गोभी के पकोड़े से किया था | मेरे द्वारा पकोड़ों की तारीफ किये जाने पर वोह बोली थी अरे ये तोह राबिया ने बनाये है |
में अभी कुछ बोलना ही चाहता था की बैठक में राबिया ने एंट्री मरी थी | वोह युसूफ की बड़ी बहन थी, कोई दो या तीन साल बड़ी होगी | और इतनी ही वोह मुझसे बड़ी होगी, क्योंकि मेरी और युसूफ की उम्र में एक -दो महीने का अंतर था | कौन बड़ा था कौन छोटा ये पता नहीं |
कब आए सूरज और कैसे हो..? राबिया ने पूछा था | उस से उम्र में छोटा होने के कारन वोह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी | हाँ ये और बात है में उससे सीधी बात करता था | न ही उसका नाम लेता और न ही दीदी, बाज़ी, या आपा आदि सम्भोधन ही लगता था |
                                             
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…………….में काफी देर वहां बैठा रहा फिर में वहां से विदा लेकर चल दिया, तन्वी मुझे बहार तक छोड़ने आई | में जब चलने लगा तोह उसने कहां-
''बहुत खुश होंगे आप ''
मैंने कहा - ''क्यूँ''
''दीदी आने वाली है ना |''
और में उत्तर में सिर्फ मुस्कुरा दिया था |
उसने कहा - ''आपने जवाब नहीं दिया |''
मैंने कहा - ''ये भी कोई पूछने वाली बात है |''
वह बोली - ''क्या मतलब''
''मतलब'' - में उसकी तरफ देखते हुए बोला - ''हद से जयादा ख़ुशी हो रही है, आखिर में ऋतू से पुरे १-२ साल बाद मिलूँगा |
बदले में उसने पलके झुका ली | मैंने कहा तन्वी में जा रहा हु माता जी राह देख रही होंगी | तन्वी अनमने मन से बोली, जा रहे है तोह में रोक कैसे सकती हूँ |
मैंने तन्वी की बात का कोई जवाब नहीं दिया, शयेद मेरे पास उसकी किसी बात का जवाब था भी नहीं, मैंने के नज़र उसके मासूम चेहरे पर डाली और फिर पलट कर चल दिया |
न जाने किस भावना से वशीभूत होकर मैंने पलट कर फिर तन्वी की तरफ देखा और मैंने पाया की वोह तोह पागलों की तहर मुझे देख रही है | पर अचानक मुझ पर द्रद्ता सवार हो गयी थी मैंने झटक कर अपने मन से तन्वी का ख़याल निकला और तिव्र्र क़दमों से अपने घर की तरफ चल दिया |
घर पहुँचते-पहुँचते मुझे शाम हो गयी, रास्ते में एक-दो लोग मिल गए जिनसे बात करने में कुछ समय लग गया था | घर पंहुंच कर कर मैंने भोजन किया और फिर बिस्तर के सुपुर्द कर दिया | पर यक़ीनन यह अभी सोने का वक़्त नहीं था, लखनऊ में तो में देर रात तक जगा करता था |
संजीवन लाल, राशी, संदीप, ऋतू, और तन्वी यह सब मेरे जेहन में बारी-बारी से दुस्तक देने लगे थे, मेरे मन की उलझन बदने लगी पर मेरे लिए ये उलझन अधिक अर्थ नहीं रखती थी क्योंकि में जनता था की इस तरह की उलझन से में कभी भी निपट सकता था | मेरे लिए उलझन का कारन था तो आने वाली तारिख ६ दिसम्बर १९९२ |
एक ताराग कारसेवकों व् रामसेवकों का धर्म के लिए जीवन उत्सर्ग कि पर्वाह न करते हुए सत्य के लिए मंदिर निर्माण की संकल्पना और दूसरी तरफ चरों तरफ कट्टरपंथी मुस्लिम बहुल छेत्र  से घिरा मेरा गाँव और जिसमें से आधे से अधिक आबादी कट्टरपंथी मुसलमानों की |
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……………..वापस बात करने का सिलसिला उसी ने सुरु किया था | कुछ बातें मेरी पदाई के बारे में और कुछ उसने मेरे घर के बारे में पूछी थी | बहार से युसूफ और कुछ और आवांजे हल्की-हल्की सुने दे रही थी, राबिया उठ कर उन्हें खिड़की से देख कर ई थी | वापस मेरे सामने बैठते हुए उसने एक आप्रत्याशित swaal पूछा था |
सूरज - वहां लखनऊ में कोई गर्ल फ्रेंड  बने या नहीं | मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा था उससे आँख मिलते ही आँख झुका ली थी | मुझे थोड़ी शरारत सूझी थी |
मैंने कहा - राबिया - (यकीन करो जहाँ तक मुझे याद है जीस्त में पहली बार मैंने उसे उसके नाम से पुकारा था) ''क्या तुम्हारा कोई बॉय फ्रेंड है कानपूर में''
उसने इनकार में सर हिलाया था
''तो यहाँ गाँव में'' - मैंने वापस शरारत की थी |
उसने न कोई इशारा किया था और न ही लब से कुछ बोली थी |
में वापस पूछता इससे पहले युसूफ कमरे में आ गया था और में चुप हो गया था |
राबिया भी बात का रुख बदले हुए बोली थी इस साल तुम्हारे बी. टेक के तीन साल पुरे हो रहे है ना |
- हां  राबिया में चाय का कप खली करके मेज पर रखते हुए बोला था | मेरे होंठो से 'राबिया' निकलते ही युसूफ ने मेरी तरफ देखा था | शयेद इस से पहले कभी भी उसने मेरे होंठो से अपनी बहन का नाम नहीं सुना था |
मैंने चलने के लिए युसूफ राबिया और उनकी मम्मी से इज़ाज़त मांगी थी | तभी फ़ोन की घंटी बाज़ी थी और युसूफ उसमें व्यस्त हो गया था | मुझे घर के बहार राबिया छोड़ने आई थी | और वोह मेरे साथ साथ चलने लगी थी, मैंने मना नहीं किया था |
चलते-चलते मैंने पूछा था राबिया आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया |
''कौन सी बात..?''
वोह अपने बाल सावरते हुए बोली थी बाल सवारने के टाइम उसकी कोहनी मेरे शरीर से छु गयी थी, उस वक़्त मेरे शरीर की हरारत यक़ीनन बढ गयी थी | हाँ उसने क्या फील किया था में उस दिन ये जान ना सका था |
राबिया, ''क्या तुम्हारा कोई बोर फ्रेंड है |'' अबकी बार मैंने स्पस्ट पूछा था |
शयेद हां, शयेद ना.....
ये कैसा जवाब है राबिया ?
मीन्स, में उसे अपना बॉय फ्रेंड मानती हू पर वोह खुद को मेरा बॉय फ्रेंड मानता है या नहीं में यह नहीं जानती |
में हसंते हुए बोला था, ''मतलब एकतरफा मुहब्बत |''
शायद , वोह थोडा उदास होते हुए बोली थी |
चलते-चलते गली का नुक्कड़ आ गया था और वोह वन्ही कड़ी हो गयी थी | में समझा गया था वो वहां से घर वापस जाना चाहती है |
मैंने हाथ जोड़ कर उसका अभिवादन किया था | हाँ चलते-चलते उसने पूछा था और आपकी गर्ल फ्रेंड..?
''आप जैसी ही हालत है '' में मुस्कुराया था
और वोह भी मुस्कुराते हुए वापस चल दी थी और में उसे ओझल होने तक देखता रहा था |

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............पर दो-तीन दिनों में मेरे हालात बढ से बत्तर हो गए थे | ज़िन्दगी ने फरेब देने चालू कर दिए थे | एक तरफ सांप्रदायिक दंगों की आहट से सुलगता मेरा छोटा सा क़स्बा जो क़स्बा कम गाँव अधिक था | और दूसरी तरफ मेरे बचपन की चाहत मेरी ऋतू ने मेरा दिल तोड़ दिया था | उस दिन संदीप के साथ जीप में बैठी हुई लड़की ऋतू ही थी |और उसने मेरे कोमल मन को बड़ी बेदर्दी से कुचलते हुए उसने मुझे बताया था, ''वोह मुझे नहीं बल्कि संदीप से प्यार करती थी |
मैंने जब उसे संदीप के बारे में बताने की कोशिश की थी तो उसने मुझे सख्ती से अपनी औकात में रहने की हिदायत दी थी, साथ ही ताकीद की थी,में उसे भूल जाऊ | हां उस दिन इस घटना या यूँ कहिये दुर्घटना | सच पुचो तो मेरे लिए ये दुर्घटना ही थी, हां तो में बता रहा था उस दुर्घटना वाले दिन ऋतू के साथ उसकी छोटी बहन तन्वी भी थी जो इस हादसे से कुछ चकित नज़र आ रही थी | उस वक़्त वहां संदीप आ गया था और ऋतू उसके बगल की सीट और तन्वी पीछे की सीट पर बैठ कर वहां से रुखसत हो गयी थी | हां जाते वक़्त भी ऋतू ने मुझे पलट कर नहीं देखा था | अलबत्ता तन्वी मुझे जरूर देखती रही थी | ज़िन्दगी के इस फरेब से में हेरान रह गया था | जिसे बचपन से चाहा, जिसे होश सँभालते ही जाना था, जिसने कभी मेरी दोस्ती का दम भरा था, जिसने कभी अपने खतों में अपने नाम के आगे मेरा सरनेम को लगाया था | जिसने कभी हमारे दांपत्य से होने वाले बच्चों के नाम सोचे थे, जिसने कभी मेरे लबों को अपने नमकीन लबो से तर-बतर किया था, जिसने कभी कानपूर के चिड़िया घर में मेरे पैरों को छुआ था, जिसने कभी कानपूर के गुरुदेव पैलेस में 'परदेश' फिल्म के देखने के वक़्त अपने हाथों से मेरे हाथ को अपने कधोर वक्चों पर रख लिया था, जिसने कभी रात के अँधेरे में मेरे सामने शारीरिक समर्पण किया था, जिसने कभी ................., जिसने कभी............., जिसने कभी........................

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………………आज मैंने दूध में मक्के की रोटी मीस कर खायी थी, फिर पानी पि कर उपर के कमरे में चला गया था, यहाँ मैंने छोटी सी ल्य्ब्रेरी बना राखी थी, जहाँ कई विषयों  पर मैंने पुस्तके एक्कठी की थी | जैसे साहित्य, दर्शन, इतिहास और कई महापुरुषों की आत्मकथाए | आज मेरे हाथ में जो किताब ई थी सावरकर लिखित ''मोपला''
पुस्तक पड़ते पड़ते रात ढल चुकी थी, तमाम तारे आसमान में रौशनी बिखेर रहे थे, में किताब हाथ में लिए कमरे से निकाल कर खुली छत पर आ गया था और टहलते हुए उसके एक किनारे तक पहुंचा था जहाँ से सड़क नज़र अति थी |
में पलट कर कमरे की तरफ चला ही था की मुझे यु लगा की सड़क पर एक साया नुमाया हुआ है | मैंने फ़ौरन पलट कर वापस सड़क की तरफ निहारा था | चाँद भी आज आस्मां में मुकम्मल ना था सो चांदनी में इतनी तेज़ी ना थी | की में उस साये को पहचान पता, हां इतना जरूर था की वोह कोई लड़की थी | वोह सड़क के किनारे-किनारे चल रही थी, चाल में कुछ लडखडाहट थी और उसके बाल बिखरे हुए थे कपड़ों का रंग लाख नज़र गड़ाने के बाद भी समझ में नहीं आया था | धीरे- धीरे मेरी आँखों से उसकी दूरी बड़ रही थी, न जाने क्यूँ मुझे लगा की में उसको पहचानता हूँ, उसे जानता हूँ | उसकी पीठ मेरे जानिब थी अगर चेहरा मेरे सामने होता तो में यकीन से कहता हूँ इतनी कम रौशनी में भी में उसको पहचान लेता था |
धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से दूर हो रही थी और आखिर में एक बिंदु की शक्ल लेकर विलुप्त हो गयी थी, मेरी नज़रों से ओझल हो गयी थी |
में टहलते हुए वापस कमरे में आ गया था और सावरकर की लेखनी का जादू मोपला में उलझ गया था |
सुबह जब उदा तोह दिन चढ़ आया था सूरज देवता यानि सूरज मुझे अपने ताप की तपिश से गर्म करने लगे थे | मैंने सूर्य नारायण की गर्मी से आँख खोली तो पाया सिरहाने स्टूल पर लालटेन अब तक जल रही थी और मेरे सीने पर मोपला पुस्तक का बोझ था न जाने क्यूँ मुझे लगा की इस बोझ को हटाना इतना आसान नहीं है जरूरत सतत शंगार्ष की जरूरत है |  मुझे इस वक़्त इस बात का अहसास न था मेरी ज़िन्दगी भी आने वाले दिनों में ऐसी ही कहानी से दो-चार होने वाली है |
अगले दिन सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ा था, माँ को इतना बोल कर में जल्दी आ जाऊंगा निकल पड़ा था में गाँव की आवारगी पर | घर से निकल कर ज्यूँ ही में सड़क पर आया था मेरे दिमाग में छनाका हुआ था रात की वोह लड़की कौन थी जिसका साया मैंने रात चाँद की रौशनी में देखा था | कौन थी वोह..? और इतनी रात को वो क्यूँ सड़क पर थी जबकि उस वक़्त कोई पंची भी मौजूद न थे अपने उपर मुझे कुछ गुस्सा आया था आखिर क्यूँ मैंने उस वक़्त घडी देख कर एक्जेक्ट समय का पता नहीं लगाया था |
में खुद भी न जान सका था की मेरे कदम खुद-ब-खुद वहां कैसे पहुँच गए थे ये ऋतू का घर था और घर के दरवाज्व पर कड़ी ऋतू नहीं तन्वी थी वोह कुछ संजीदा थी मुझे देख कर भी वोह कुछ संजीदा ही रही, अमुमन ऐसा नहीं होता था, बचपन से मुझे जब भी देखती थी चहक पड़ती थी, आज उसने मुझे घर आने को भी नहीं कहा था, ख़ामोशी को उसने ही तोडा था, बहुत ही धीमी आवाज़ में बोली थी जबकि में जनता था की वो काफी तेज़ आवाज़ में बात करती थी, जिसकी वजह से उसने कई बार अपनी मम्मी पापा से दन्त भी खायी थी
सूरज- ''कल रात बहुत भारी थी'' उसने इतना ही बोला था और मैंने दर से एक पल के लिए अपनी आँखे बंद कर ली थी कंही वोह रात की लड़की ऋतू तो नहीं थी |
अगले छण वो बोली थी - '' कल संदीप ने ऋतू का सब कुछ लूट लिया अपने दोस्त अफरोज के साथ मिल कर''
क्या बोल रही हो तन्वी, क्या हुआ है ऋतू के साथ..?
तन्वी ने काफी विस्तार से बताई थी कल रात की घटना जिन्हें में दिल सख्त करके सुनता रहा था | मेरे दिल ने हज़ार आंसूं रोये थे पर मेरी आँखें मेरे से भी ज्यादा कड़ोर हो गयी थी और उन्होंने एक भी आंसू नहीं उगला था ऋतू से लाख मिलने का मन होने के बाद भी मैंने तन्वी को यह नहीं बोला था की में ऋतू से मिलना चाहता था |
तन्वी को इतना बोल कर की वो ऋतू का ध्यान रखे तेज़ क़दमों से निकल गया था बिना एक बार भी पलट कर ये देखे बिना तन्वी का हाल क्या है |

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........अपने बालों को सहलाते उन नर्म हाथों को पकड़ कर मैंने उनमें वही पमप्लेट पकड़ा दिया था जो आज दोपहर मकतब के सामने अल्हड हवाओं ने मेरे हवाले kiya था अँधेरा गहरा हो चूका था सो राबिया कोशिश के बाद भी पद न सकी |सो मैंने उसे मंदिर से दिया लेन को कहा पर वो गयी न थी उसकी दुविधा को में समझ गया था तभी मैंने उससे कहा था, राबिया स्थान किसी भी धर्म का हो कभी भी पवित्र ह्रदये के लोगों से अपवित्र नहीं होता वो हमेशा इअसे लोगों के इंतज़ार में रहता है मेरी बात सुन कर वो आगे बड़ी थी उसका पैर मंदिर की दहलीज़ को लाघने वाला ही था की वोह अचानक ठहर गयी थी मैंने देखा था उसने झुक कर हथेली से दहलीज़ को छु कर अपमे माथे से लगा लिया था जब वोह मंदिर से दिया लेकर वापस आ रही थी तो न जाने मुझे क्यूँ लगा की उस दिए की रौशनी बाद चुकी है शायेद ऐसा दो रोशनियाँ मिलने से हुआ होगा | एक मंदिर के पवित्र दिए की रौशनी और दूसरी राबिया के पवित्र ह्रदये से फूटती रौशनी |
राबिया ने दिया मेरे हाथ में पकड़ा कर उस पमप्लेट को पड़ा था बहुत ही मधिम आवाज़ में | जिसे सुन कर मेरे रोये खड़े हो गया था मैंने देखा था राबिया का बदन भी लरज रहा था यह एक ऐसा पत्रक था जो मुस्लिम युवको को गैर मुस्लिम युवतियों को अपने छद्म प्रेम में फ़साने की प्रेरणा दे रहा था, इसके लिए बकायेदा उन युवको के लिए पुरूस्कार की घोषण थी जो ऐसा कर पाएंगा | उस पमप्लेट में इस कार्य को बेहद पाक और जेहाद का एक रूप बताया गया था
ये कैसा जेहाद..? मैंने राबिया की तरफ देखते हुए बोला था जो मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दे
राबिया चुप रही थी शायेद इस लिए की उसके पास इसका कोई जवाब था ही नहीं |
मैंने अंदाजा लगाया था स्थिति की भयानकता का में समझ गया था ऋतू इसी जेहाद जा शिकार हुई थी

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.............और यु बहुत देर तक हम साथ-साथ बैठे रहे इधेर-उधेर की बातें होती रही | मैंने महसूस किया की संजीवन लाल में इस समय खिशी की लहर दौड़ रही है पर में उसके लिए ह्रद्ये से चिंतित था, हां यह बात मैंने उस पर प्रकट नहीं होने दी थी फिर हम वहां से उठ कर चले आये थे रस्ते में टहलते-टहलते में अपने घर पहुंचा, संजीवन लाल का घर रस्ते में ही पड़ता था वह ख़ुशी मन से अपने घर चला गया था और जाते जाये यह कह गया था की शाम को मुझ से मिलने आयेगा
संजीवन लाल मेरे बचपन का दोस्त, निहचित रूप से आज भयंकर परेशानी में फंसने जा रहा था वह पागल जिसे पानी ख़ुशी समझ रहा था नहीं जनता था यह ख़ुशी उसके लिए मुसीबतों का सेलाब लेन वाली है मेरे संजीवन लाल से अपार स्नेह था, इस लिए उसके प्रति मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था
परम अय्याश ठाकुर संदीप सिंह की ख़ूबसूरत बहन राशी जो एक-आध साल पहले ही स्नातक होकर शहर से गाँव आई थी और संजीवन लाल जो ठाकुर संदीप सिंह के यहाँ एक घरेलु नौकर था वोह आज सुबह ही मुझे अपने और राशी के प्रेम सम्बंदों के बारे में ख़ुशी से बता रहा था, पर यक़ीनन में इससे खुश कम ही हुआ था मेरे खुश होने का कारन कुछ और नहीं था वरन में संजीवन लाल के लिए चिंतित था क्यूँ की में अच्छी तरह से संदीप के बारे में जानता था वह निहयेत ही क्रूर और बदमाश तरह का व्यक्ति था सच पुछो तो  मुझे संजीवन लाल की जान की फ़िक्र होने लगी थी
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 ........उसी रात में अपनी महेंद्र डी.आई. जीप से कानपूर की तरफ चाल पड़ा था मकसद था राशी को अफरोज के इरादों से सावधान करना, में जनता था की राशी से मैंने आज तक मैंने कभी बात भी नहीं की थी | कानपूर रवाना होने से पहले में राबिया के घर गया था उसे बताने की में कानपूर जा रहा हूँ | उस वक़्त युसूफ घर न था चच्ची भी कंही गयी थी | हाँ राबिया के अब्बू को दो-तीन साल पहले ही जन्नतनशी हो चुके थे राबिया उस वक़्त घर पर अकेली थी |
जब मैंने उस वक़्त उस से कहा की में कानपूर जा रहा हूँ उसने मेरा हाथ पकड कर पलंग पर बिठा लिया था और खुद मेरे बगल में बैठ गयी थी मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर वो बोली थी |
सूरज- ऋतू के साथ जो हुआ बहुत बुरा हुआ
में कुछ बोला न था
वोह उसी तरह मेरे हाथ को पकडे हुए बोली थी आप तोह उसे चाहते थे बहुत दुःख हुआ होगा ना
मैंने हां में सर हिलाया था और कहा था,मेरी चाहत एक तरफ़ा थी राबिया |
मैंने महसूस किया था उस वक़्त उसके हाथों की पकड़ मेरे हाथों पर थोडा सख्त हो गयी थी
कानपूर क्यूँ जा रहे हो, उसने वापस सवाल किया था
उत्तर में मैंने पूरी तफ्शील बयाँ कर दी थी, जिसे वो शांति से सुनती रही थी | फिर बोली में अल्लाह से दुआ मागुंगी वो तुम्हे कामयाब करे |
                                                  सुधीर मौर्य ----गंज जलालाबाद , उन्नाव - 209869 

Monday, 26 August 2013

एक गली कानपुर की (उपन्यास) - सुधीर मौर्य

        मुक्कमल ख़ामोशी रही थी। कुछ देर शांत बैठे रहने के बाद संदीप उठा अपने हाथो से  उसने बच्चे के चेहरे से कपडा हटाया, सिर्फ  कुछ पल निहारा था उसे और फिर  के कमरे से वो बहार चला गया।                                      कुदरत, श्रृष्टि सबसे बड़े शाहकार  हैं उसने अजूबे को  दिया था। में जो पल्लवी के साथ जिस्मानी तौर पर कभी  सोया था। जिसने कभी उसे सम्पूर्ण   देखा था उससे पैदा हुए बच्चे की शक्ल मेरी थी।                                                                                                                               -क्या यही आत्मा का प्यार था।                                                               -इश्क रूहों का।                                                                                       -मिलन  के  मन के हिलोरों का।                                                                                      
                                                                                                              उपन्यास 'एक गली कानपुर की ' का अंश                                                                                                                                                                                                                                                                   सुधीर मौर्य