Monday, 20 April 2015

तर्के – तअल्लुक - सुधीर मौर्य


देख
मैने साफ कर दी है
आसमान की धुन्ध
जिसमे तैरती थी
साये की शक्ल मे
हमारे प्रेम की तस्वीर
देख
मैने कर दी ही समर्पित
मंदिर को वो बांसुरी
जिससे फूटती थी खुद खुद
अपनी मित्रता की स्वरांजलि
देख
मैने डाल दी है हवन मे
वो डायरी 
जिसके पृष्ठों ने
स्वय्ं लिखे थे 
हमारे प्यार के अफसाने


देख लडकी !
मैने कर दिया है ऐलान
तुमसे तर्के - तअल्लुक का
तुझे मुहब्बत के
नाकाबिल मान के
कि कहीं तुझसे हरजाई भी
प्यार किया करते हैं.

-- सुधीर  मौर्य

10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (23-04-2015) को "विश्व पृथ्वी दिवस" (चर्चा अंक-1954) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. वाह ... लजवाब नज़्म ...

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  5. बहुत खूबसूरत एहसास्1

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    1. बहुत बहुत आभार।

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