Monday, 9 May 2016

मेरे और नाज़ के अफ़साने -२


 प्यार का पहला पत्थर।

खूबसूरती की पहचान का सलीका आँखों को जन्म से आता है। 

एक शरमाए - सकुचाये बदन  की आँखों न सिर्फ उसके जिस्म की नक्काशी में डूबी थी बल्कि उसने उसके खूबसूरत नाम की नक्काशी करके उसे और ज्यादा खूबसूरत बना दिया था। 

वो नहीं जनता था जिस घड़ी उसके ख्याल फरनाज को नाज़ बना रहे थे। ठीक उस घड़ी फरनाज अपने ख्यालों में उसे  पुरु की जगह पुरोहित पुकार रही थी। 

यूँ एक - दूसरे के लिए अंजान ख्यालों ने एक - दूसरे के नामो पर नक्काशी करके प्रेम के ताजमहल का पहला पत्थर रखा था। 
--सुधीर मौर्य 

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (11-05-2016) को "तेरी डिग्री कहाँ है ?" (चर्चा अंक-2339) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete