Friday, 18 March 2016

मेरे ज़माने की लड़कियां - सुधीर मौर्य



अब वो नहीं गाती  
वो अपमानजनक लोकगीत 
जिनमे उन्हें दी जाती है गालियाँ 
अब वो गाती है 
सुर और ताल में अपने मन की भाषा 
और करती है खुद से वादा 
अपने भीतर न आने देने के लिए कोई हीनभावना 
अब वो पहनती है 
अपनी मर्ज़ी के लिबास अपनी मर्ज़ी से 
कभी साड़ी, कभी जींस और कभी स्कर्ट 
अब वो नहीं जाती 
बड़े घरो में चाकरी को 
जहाँ उनका होता रहता था शोषण 
अब वो जाती है 
स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी और दफ्तर 
अब वो नहीं झुकातीं अपनी गर्दन 
न ही नीची होती है उनकी आँखे 
ये मेरे ज़माने की वो 
प्रगतशील लड़कियां है 
जो हर पल बनना चाहती है 
दलित लड़कियों की जगह सिर्फ लड़कियां। 
--सुधीर मौर्य   

12 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-03-2016) को "दुखी तू भी दुखी मैं भी" (चर्चा अंक - 2286) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति ...

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    1. बहुत आभार कविता जी।

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    1. धन्यवाद सुमन जी।

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  4. " गागर में सागर".... अति सुन्दर अभिव्यक्ति।

    http://safaltasutra.com/

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  5. वाह, बहुत प्रभावशाली रचना

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